'यह तो नारीत्व का अपमान है': 'सिलेंडर नहीं उठा पाएगी महिला' कहकर नौकरी छीनने पर इंडियन ऑयल को सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार
देश की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनियों में शुमार इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) को लैंगिक पूर्वाग्रह (Gender Bias) के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने केवल 'महिला होने' और 'सिलेंडर न उठा पाने' की दलील देकर एक योग्य महिला को नौकरी से वंचित करने पर कड़ा ऐतराज जताया और इसे सीधे तौर पर 'नारीत्व का अपमान' करार दिया।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने तीन दशक से अधिक समय से न्याय की आस में भटक रही हरियाणा की बुजुर्ग महिला याचिकाकर्ता को राहत देते हुए इंडियन ऑयल को एकमुश्त 12 लाख रुपये का हर्जाना (मुआवजा) चुकाने का ऐतिहासिक आदेश दिया है।
'क्या घरों में महिलाएं गैस सिलेंडर नहीं उठातीं?' — सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जब इंडियन ऑयल के वकील ने दलील दी कि यह पद एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में हेल्पर/खलासी का था, जहां शारीरिक श्रम करना पड़ता है और भारी सिलेंडर उठाने होते हैं, इसलिए महिला को इस पद के लिए उपयुक्त नहीं माना गया, तो पीठ बुरी तरह भड़क उठी:
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जजों का सख्त सवाल: जस्टिस अरविंद कुमार ने सवाल दागते हुए कहा, "क्या आप सोचते हैं कि महिलाएं एलपीजी सिलेंडर नहीं उठा सकतीं? सुबह से शाम तक, जब पुरुष घर पर नहीं होते, तो घर में सिलेंडर उठाना और उसे चूल्हे से कनेक्ट करना महिलाएं ही करती हैं। आपने सिर्फ इसलिए उनकी नियुक्ति रद्द कर दी क्योंकि वह एक महिला हैं? यह नारीत्व का खुला अपमान है।"
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सरकारी उपक्रम के दोहरे चरित्र पर सवाल: बेंच ने कहा कि भारत में हम हर दिन महिलाओं को सम्मान देने और उन्हें 'देवी' मानने की बात करते हैं। ऐसे में केंद्र सरकार के एक प्रतिष्ठित सार्वजनिक उपक्रम (PSU) द्वारा लैंगिक आधार पर ऐसा भेदभाव किया जाना बिल्कुल अस्वीकार्य और शर्मनाक है।
क्या है 38 साल पुराना पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद साल 1988 का है, जब हरियाणा के करनाल जिले के गुढ़ा गांव की रहने वाली अनुसूचित जाति की महिला सुमित्रा ने इंडियन ऑयल के एलपीजी बॉटलिंग प्लांट में रीफिलिंग हेल्पर/खलासी पद के लिए आवेदन किया था।
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तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर की अध्यक्षता वाली चयन समिति द्वारा अनुशंसित 49 उम्मीदवारों में सुमित्रा का नाम भी शामिल था।
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वह निर्धारित शैक्षणिक व अन्य योग्यताएं पूरी करती थीं, लेकिन जब 43 चयनित अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी किए गए, तो उसमें से सुमित्रा का नाम गायब था।
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बाद में यह साफ हुआ कि कंपनी प्रबंधन ने यह मान लिया था कि एक महिला होने के नाते वह प्लांट में भारी सिलेंडरों को लोड-अनलोड करने और विषम समय (Night Shifts) में काम करने के योग्य नहीं हैं।
1988 से 2026: तीन अदालतों से होकर गुजरा इंसाफ का पहिया
सुमित्रा ने अपने साथ हुए इस अन्याय को चुपचाप स्वीकार करने के बजाय कानूनी लड़ाई लड़ने की ठानी:
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ट्रायल कोर्ट (1990): निचली अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और माना कि उनके साथ केवल महिला होने के आधार पर भेदभाव हुआ है। कोर्ट ने आईओसीएल को आदेश दिया कि उन्हें मजदूर के अलावा किसी अन्य उपयुक्त पद पर नियुक्त किया जाए।
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हाईकोर्ट में अपील: इंडियन ऑयल ने इस फैसले को चुनौती दी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अक्टूबर 2025 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर निचली अदालत का फैसला पलट दिया।
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सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुमित्रा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
नौकरी की उम्र बीती, इसलिए 12 लाख का एकमुश्त मुआवजा
शीर्ष अदालत में जब मामले की अंतिम सुनवाई हुई, तो इंडियन ऑयल के वकील ने मामले को मध्यस्थता (Mediation) में भेजने का अनुरोध किया, लेकिन बेंच ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।
अदालत ने दर्ज किया कि 38 साल तक चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान याचिकाकर्ता सुमित्रा अब 63 वर्ष की हो चुकी हैं और सेवानिवृत्ति (Superannuation) की आयु पार कर चुकी हैं। चूंकि अब उन्हें नौकरी पर बहाल करना व्यावहारिक नहीं था, इसलिए अदालत ने दशकों तक झेले गए अन्याय, मानसिक प्रताड़ना और अधिकारों से वंचित रखने के एवज में इंडियन ऑयल को ₹12,00,000 (बारह लाख रुपये) का एकमुश्त मुआवजा देने का अंतिम फैसला सुनाया।
कार्यस्थलों पर लैंगिक समानता के लिए नजीर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक महिला की जीत नहीं है, बल्कि देश के तमाम सार्वजनिक और निजी उपक्रमों के लिए एक कड़ा संदेश है। भर्ती प्रक्रियाओं में 'शारीरिक क्षमता' या 'काम के घंटों' का बहाना बनाकर महिलाओं को बाहर करने की पितृसत्तात्मक मानसिकता को अदालत ने पूरी तरह खारिज कर दिया है।