दो जहरीले इंजेक्शन के बाद भी नहीं थमीं सांसें, खर्राटे लेने लगी महिला कैदी; अंतिम पलों में टल गई मौत की सजा
अपराध और न्याय की दुनिया में मौत की सजा (कैपिटल पनिशमेंट) को अंतिम और सबसे कठोर सजा माना जाता है। अमूमन जब किसी मुजरिम को फांसी के फंदे पर लटकाया जाता है या लीथल इंजेक्शन (जहरीला इंजेक्शन) दिया जाता है, तो कुछ ही मिनटों के भीतर शरीर की जैविक क्रियाएं पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं। लेकिन जेल प्रशासन और कानून के इतिहास में कभी-कभार ऐसे दुर्लभ और हैरतअंगेज मामले भी दर्ज होते हैं जो विज्ञान और इंसानी समझ को हैरत में डाल देते हैं। ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सुर्खियों में आया है, जहां एक महिला कैदी को कोर्ट के आदेशानुसार मौत की नींद सुलाने के लिए एक के बाद एक दो शक्तिशाली जहरीले इंजेक्शन लगाए गए। इसके बावजूद न केवल उसकी धड़कनें चलती रहीं, बल्कि वह गहरी नींद में जाकर तेज खर्राटे लेने लगी। इस अप्रत्याशित और विचित्र स्थिति को देखकर डॉक्टरों और जेल अधिकारियों के होश उड़ गए और अंततः अंतिम पलों में उसकी मौत की सजा रोकनी पड़ी।
एग्जीक्यूशन चैंबर में सन्नाटा: जब तय प्रक्रिया के तहत लगाए गए दो जहरीले इंजेक्शन
मौत की सजा के लिए निर्धारित तिथि और समय पर महिला कैदी को एग्जीक्यूशन चैंबर के मेडिकल बेड पर ले जाया गया। वहां मौजूद डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की टीम ने तय प्रोटोकॉल के तहत नस (IV लाइन) में जानलेवा रसायनों का पहला डोज इंजेक्ट किया। आमतौर पर इस प्रक्रिया में पहले बेहोशी की दवा, फिर मांसपेशियों को निष्क्रिय करने वाला केमिकल और अंत में दिल की धड़कन रोकने वाला घातक रसायन शरीर में डाला जाता है। पहला डोज पूरा होने के बाद भी जब मॉनिटर पर महिला की सांसें और पल्स सामान्य रूप से चलती दिखीं, तो तय मानकों के तहत कुछ समय रुककर दूसरा हाई-डोज जहरीला इंजेक्शन दिया गया। नियमों के मुताबिक इस दूसरी खुराक के बाद किसी भी इंसान का बचना चिकित्सकीय रूप से लगभग असंभव माना जाता है।
सन्न रह गए डॉक्टर और अधिकारी: थमने के बजाय तेज खर्राटे लेने लगी महिला
जेल वॉर्डन, अभियोजन पक्ष और मेडिकल टीम के सदस्य यह मानकर खड़े थे कि कुछ ही पलों में महिला कैदी को मृत घोषित कर दिया जाएगा। लेकिन तभी चैंबर के भीतर जो घटा, उसने हर किसी के रोंगटे खड़े कर दिए। महिला के शरीर में मौत के कोई लक्षण उभरने के बजाय उसकी सांसें और गहरी हो गईं और वह बिल्कुल निश्चिंत होकर तेज आवाज में खर्राटे लेने लगी। मॉनिटर पर उसकी दिल की धड़कनें स्थिर बनी रहीं और दिमाग के सिग्नल्स भी सक्रिय दिखाई दे रहे थे। जहर की दोहरी खुराक मिलने के बाद भी शरीर का इस तरह रिएक्ट करना वहां मौजूद वरिष्ठ डॉक्टरों के लिए किसी अजूबे से कम नहीं था।
'क्रूर और असामान्य सजा' का खतरा: आनन-फानन में टालना पड़ा फैसला
जब काफी देर बीत जाने के बाद भी इंजेक्शन का जानलेवा असर नहीं हुआ, तो जेल प्रशासन के सामने कानूनी और मानवाधिकार का एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो गया। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों और जेल नियमावली के तहत किसी भी कैदी को प्रक्रियागत खामियों के चलते अत्यधिक शारीरिक यातना या 'क्रूर व असामान्य दंड' (Cruel and Unusual Punishment) की स्थिति में नहीं धकेला जा सकता। लगातार इंजेक्शन देने से नसों के फटने, असहनीय दर्द और कानूनी पेचीदगियों का खतरा बढ़ रहा था। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए जेल प्रशासन ने तुरंत उच्च अधिकारियों और संबंधित अदालत से आपातकालीन संपर्क साधा। कानूनी सलाह और चिकित्सीय रिपोर्ट के आधार पर तात्कालिक रूप से एग्जीक्यूशन प्रक्रिया को रोकने और सजा को टालने का आधिकारिक आदेश जारी कर दिया गया।
मेडिकल साइंस और कानूनी गलियारों में बहस: आखिर कैसे बेअसर हो गया जानलेवा रसायन?
घटना के बाद महिला कैदी को तुरंत इंटेंसिव केयर यूनिट में शिफ्ट किया गया, जहां उसकी हालत स्थिर बताई गई। वहीं दूसरी तरफ, इस असामान्य घटना ने दुनिया भर के मेडिकल और फॉरेंसिक विशेषज्ञों के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। डॉक्टरों का एक वर्ग मान रहा है कि महिला के शरीर में किसी खास दवा या केमिकल के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधक क्षमता (ड्रग टॉलरेंस) हो सकती है, जिसके कारण जहरीले केमिकल्स दिल तक उस तीव्रता से नहीं पहुंच सके जिस तरह सामान्य मामलों में पहुंचते हैं। वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि नस में कैनुला ठीक से न बैठने या दवा की गुणवत्ता और खुराक के मिश्रण में आई किसी तकनीकी खामी की वजह से ऐसा हुआ हो सकता है। फिलहाल इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच शुरू कर दी गई है और महिला की सजा पर नए सिरे से कानूनी राय ली जा रही है।