कभी 30,000 लड़ाकों वाला हूती गुट आज कैसे बना 3.5 लाख का सैन्य नेटवर्क? जानिए अंदरूनी भर्ती

कभी 30,000 लड़ाकों वाला हूती गुट आज कैसे बना 3.5 लाख का सैन्य नेटवर्क? जानिए अंदरूनी भर्ती

पश्चिम एशिया में सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल जैसी सैन्य महाशक्तियों को लगातार चुनौती दे रहा यमन का हूती विद्रोही संगठन (अंसारुल्लाह) आज रक्षा विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ा अध्ययन का विषय बन चुका है। आधुनिक ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइलें और लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय जहाजों की नाकेबंदी करने वाले इस गुट की मारक क्षमता जितनी चौंकाने वाली है, उससे कहीं अधिक हैरान कर देने वाली बात इसकी मैनपावर (सैनिक शक्ति) में हुआ अप्रत्याशित विस्तार है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय सामरिक थिंक टैंक्स के ताजा आकलनों के अनुसार, साल 2015 में जब सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन में सैन्य हस्तक्षेप शुरू किया था, तब हूतियों के पास बमुश्किल 30,000 लड़ाके थे। लेकिन आज यह संख्या बढ़कर 3.5 लाख (3,50,000) तक पहुंच चुकी है। यह सवाल हर किसी के जेहन में कौंध रहा है कि बमबारी और एक दशक लंबे गृहयुद्ध के बीच इस विद्रोही संगठन के पास इतनी भारी तादाद में लड़ाके कहां से और कैसे आए?

राजधानी सना पर नियंत्रण और 70% आबादी पर प्रशासनिक दबदबा

हूतियों की संख्या में आए इस विशाल उछाल की सबसे पहली और बुनियादी वजह उनका भौगोलिक और प्रशासनिक नियंत्रण है। साल 2014-15 में जब हूतियों ने यमन की आधिकारिक राजधानी सना और उत्तर-पश्चिमी यमन के उपजाऊ व घनी आबादी वाले इलाकों पर कब्जा किया, तो यमन की कुल आबादी का लगभग दो-तिहाई (करीब 70 प्रतिशत) हिस्सा उनके सीधे नियंत्रण में आ गया।

सत्ता और सरकारी मशीनरी पर कब्जा होते ही हूतियों को मंत्रालयों, शैक्षणिक संस्थानों, मस्जिदों, स्थानीय रेडियो-टेलीविजन और टैक्स व्यवस्था पर एकाधिकार मिल गया। इस प्रशासनिक पहुंच ने उन्हें हर शहर, कस्बे और गांव के युवाओं तक सीधी पहुंच प्रदान की। हूतियों ने इस स्थानीय व्यवस्था को एक विशाल भर्ती तंत्र (Recruitment Machinery) में बदल दिया, जहां सरकारी राशन, नौकरियां और सामाजिक सुरक्षा सीधे तौर पर संगठन के प्रति निष्ठा और सैन्य सेवा से जोड़ दी गई।

'विदेशी आक्रमण' का नैरेटिव: सऊदी हमलों ने बढ़ाई घरेलू सहानुभूति

2015 से जब सऊदी अरब और यूएई के गठबंधन ने यमन पर भारी हवाई हमले शुरू किए, तो हूतियों ने इसे चतुर कूटनीति के तहत एक सुनहरे मौके में तब्दील कर दिया। हूतियों ने इस पूरे संघर्ष को "यमन की संप्रभुता पर विदेशी आक्रमण" और "देश की रक्षा के लिए पवित्र प्रतिरोध" के रूप में प्रचारित किया।

सऊदी बमबारी में जब आम नागरिक, स्कूल और अस्पताल क्षतिग्रस्त हुए, तो यमनी समाज के भीतर बाहरी ताकतों के खिलाफ गहरा आक्रोश पनपा। हूतियों ने इस राष्ट्रवादी और प्रतिरोधी भावना को भुनाते हुए कबायली युवाओं को यह विश्वास दिलाया कि वे हूती आंदोलन के लिए नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी और सम्मान की रक्षा के लिए हथियार उठा रहे हैं। हवाई हमलों का दबाव उन्हें खत्म करने के बजाय नए रंगरूट जुटाने का सबसे बड़ा औजार बन गया।

गाजा युद्ध और 'अल-अक्सा फ्लड' भर्ती अभियान का भावनात्मक दांव

हूतियों की संख्या 2022 में करीब 2.2 लाख आंकी गई थी, लेकिन पिछले दो वर्षों में इसमें आया 1.3 लाख का अचानक उछाल सीधे तौर पर फिलिस्तीन संकट से जुड़ा हुआ है। अक्टूबर 2023 में जब इजरायल और हमास के बीच युद्ध शुरू हुआ, तो हूतियों ने खुद को मुस्लिम जगत में गाजा के सबसे आक्रामक और निडर पैरोकार के तौर पर पेश किया।

हूती नेतृत्व ने पूरे उत्तरी यमन में "अल-अक्सा फ्लड" (Al-Aqsa Flood) के नाम से बड़े पैमाने पर विशेष लामबंदी और भर्ती अभियान चलाया। मस्जिदों, विश्वविद्यालयों और कबायली पंचायतों में यह संदेश दिया गया कि यमन के लड़ाके इजरायल और उसके पश्चिमी समर्थकों के खिलाफ फिलिस्तीनी भाइयों की रक्षा के लिए तैयार हो रहे हैं। इस धार्मिक और भावनात्मक अपील का असर यह हुआ कि हजारों की संख्या में ऐसे युवा भी हूतियों के ट्रेनिंग कैंप्स में दौड़ पड़े, जिनका पहले हूती विचारधारा से कोई सीधा वास्ता नहीं था।

कबायली गठजोड़, समर कैंप्स और जबरन भर्ती के गंभीर आरोप

सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि '3.5 लाख' का यह आंकड़ा केवल फुल-टाइम नियमित सैनिकों का नहीं है, बल्कि इसमें एक्टिव लड़ाके, लोकल रिजर्व, कबायली लड़ाके और प्रशिक्षित स्वयंसेवक शामिल हैं। यह विस्तार केवल स्वैच्छिक भर्ती से नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे एक सुनियोजित और सख्त दबाव तंत्र भी काम कर रहा है:

  • कबायली प्रमुखों पर दबाव: हूतियों ने उत्तरी यमन के प्रभावशाली शेखों और कबायली सरदारों के साथ समझौते किए, जिसके तहत हर कबीले को तय संख्या में लड़ाके मोर्चे पर भेजना अनिवार्य किया गया।

  • स्कूलों और समर कैंप्स में विचाररोपण: संयुक्त राष्ट्र की कई रिपोर्टों में यह खुलासा हुआ है कि हूतियों ने ग्रीष्मकालीन शिविरों (Summer Camps) और स्कूलों के पाठ्यक्रमों को बदलकर किशोरों को जिहादी प्रशिक्षण और हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी।

  • प्रवासियों और गरीबों की विवशता: यमन में अत्यधिक गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी के चलते युवाओं के लिए सशस्त्र गुट से जुड़ना आजीविका और भोजन का एकमात्र साधन बन गया। वहीं कई मानवाधिकार रिपोर्टों में इथियोपियाई शरणार्थियों और नाबालिगों की जबरन भर्ती के साक्ष्य भी दर्ज किए गए हैं।

ईरान का हथियार तंत्र और विरोधी खेमे का आपसी बिखराव

हूतियों के इस विशाल मानव बल को आधुनिक सेना में तब्दील करने का काम ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और लेबनान के हिजबुल्लाह ने किया। जहां ईरान ने उन्नत मिसाइलें, नौसैनिक ड्रोन, खुफिया जानकारी और सैन्य तकनीक मुहैया कराई, वहीं लड़ाकों को आधुनिक गुरिल्ला और नौसैनिक युद्ध की ट्रेनिंग दी।

दूसरी तरफ, हूतियों के विरोधी मोर्चे (सऊदी समर्थित यमनी सरकार, दक्षिणी अलगाववादी गुट STC और स्थानीय मिलिशिया) के बीच आपसी फूट, अविश्वास और अलग-अलग राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने हूतियों का काम और आसान कर दिया। विरोधी गुटों के इस बिखराव का फायदा उठाकर हूतियों ने अपने आंतरिक मोर्चों को सुरक्षित रखा और अपनी पूरी ताकत को लामबंद करने में सफल रहे। इसी सामरिक चक्रव्यूह के चलते आज 30 हजार वाला यह विद्रोही संगठन 3.5 लाख के अभेद्य सशस्त्र नेटवर्क में तब्दील होकर महाशक्तियों के सामने डटकर खड़ा है।