नोएल टाटा को लगा बड़ा झटका: टाटा संस बोर्ड ने खारिज की ट्रस्ट्स की आपत्ति, एन चंद्रशेखरन 5 साल के लिए फिर बने चेयरमैन

नोएल टाटा को लगा बड़ा झटका: टाटा संस बोर्ड ने खारिज की ट्रस्ट्स की आपत्ति, एन चंद्रशेखरन 5 साल के लिए फिर बने चेयरमैन

देश के सबसे प्रतिष्ठित और 150 साल से अधिक पुराने औद्योगिक घराने 'टाटा समूह' (Tata Group) के शीर्ष नेतृत्व को लेकर चल रहा विवाद अब खुलकर सतह पर आ गया है। टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस (Tata Sons) के बोर्ड ने टाटा ट्रस्ट्स (Tata Trusts) के चेयरमैन नोएल टाटा की कड़ी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए मौजूदा कार्यकारी चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन (N Chandrasekaran) को अगले 5 साल के नए कार्यकाल के लिए मंजूरी दे दी है।

करीब चार घंटे तक चली मैराथन बोर्ड बैठक में नोएल टाटा के विरोध के बावजूद बोर्ड ने बहुमत (4-1 के मत) से चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के प्रस्ताव पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी। इसे टाटा ट्रस्ट्स के प्रमुख नोएल टाटा के लिए एक बड़े रणनीतिक झटके के तौर पर देखा जा रहा है।

4-1 से पास हुआ प्रस्ताव: ट्रस्टी निदेशकों के बीच बंटे वोट

टाटा संस की बोर्ड बैठक में यह फैसला उस वक्त हुआ जब चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल फरवरी 2027 में खत्म होने जा रहा था। बैठक में हुए घटनाक्रम के प्रमुख बिंदु:

  • प्रस्ताव के खिलाफ एकमात्र वोट: टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन और टाटा संस बोर्ड में नामित निदेशक नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव के खिलाफ अकेला वोट डाला।

  • ट्रस्टी निदेशकों में मतभेद: टाटा ट्रस्ट्स की ओर से बोर्ड में मौजूद दूसरे नामित निदेशक वेणु श्रीनिवासन ने चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति के पक्ष में मतदान किया।

  • कास्टिंग वोट से फैसला: दोनों ट्रस्टी निदेशकों की राय अलग-अलग होने के बाद बैठक की अध्यक्षता कर रहे स्वतंत्र निदेशक हरीश मनवानी ने कास्टिंग वोट का इस्तेमाल करते हुए चंद्रशेखरन के पक्ष में फैसला सुनाया। एन. चंद्रशेखरन ने खुद इस वोटिंग प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया।

नोएल टाटा ने फैसले को बताया 'अवैध' और 'शुरुआत से ही अमान्य'

बोर्ड बैठक के तुरंत बाद नोएल टाटा ने टाटा संस के कंपनी सेक्रेटरी और साथी निदेशकों को कड़े शब्दों में पत्र लिखकर इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

नोएल टाटा ने अपनी आपत्ति में कहा है:

  1. आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन का उल्लंघन: नोएल टाटा के अनुसार, टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (AoA) के अनुच्छेद 121 और 118 के तहत चेयरमैन के चयन या दोबारा नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों के बहुमत का सकारात्मक समर्थन (Affirmative Vote) अनिवार्य होता है। जब दो में से एक ट्रस्टी ने विरोध किया, तो ट्रस्ट्स का बहुमत नहीं माना जा सकता।

  2. फैसले को बताया 'Null and Void': नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव को कानूनी रूप से शून्य (Null and void ab initio) करार देते हुए कहा कि बोर्ड ने कानूनी राय लिए बिना और शेयरधारकों की आगामी वार्षिक आम बैठक (AGM) से पहले सार्वजनिक घोषणा करके नियमों का उल्लंघन किया है।

  3. अदालत जाने की तैयारी: टाटा ट्रस्ट्स, जिसके पास टाटा संस की करीब 66% हिस्सेदारी है, इस फैसले और बहुमत शेयरधारकों के अधिकारों की अनदेखी के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) या बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की कानूनी तैयारी में जुट गया है।

खुद हटने का फैसला ले चुके थे चंद्रशेखरन, फिर कैसे पलटी बाजी?

इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि 12 अगस्त को एन. चंद्रशेखरन ने खुद बोर्ड में सर्वसम्मति न बनने के कारण फरवरी 2027 के बाद पद पर न बने रहने की इच्छा जताई थी। इसके बाद एक सर्च कमेटी बनाकर नए उत्तराधिकारी की तलाश शुरू कर दी गई थी।

हालांकि, 3 सितंबर को टाटा संस की नॉमिनेशन एंड रेमुनरेशन कमेटी (NRC) ने समूह के व्यापक व्यावसायिक हितों, वैश्विक विस्तार और सेमीकंडक्टर-इलेक्ट्रिक व्हीकल जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स की निरंतरता का हवाला देते हुए चंद्रशेखरन से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का विशेष आग्रह किया। इसके बाद चंद्रशेखरन ने बने रहने पर सहमति दी और बोर्ड ने आपात स्थिति में यह प्रस्ताव पास कर दिया।

टाटा संस की लिस्टिंग और RBI के नियमों ने बढ़ाई तकरार

इस खींचतान के पीछे केवल चेयरमैन का पद ही नहीं, बल्कि टाटा संस के भविष्य का ढांचा भी जुड़ा है:

  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी (NBFC-UL) के तहत शेयर बाजार में लिस्ट कराने के अनिवार्य नियमों से छूट देने की याचिका को खारिज कर दिया है।

  • बोर्ड की बैठक में एन चंद्रशेखरन की अगुवाई वाले बहुमत ने आरबीआई के नियमों का पालन करते हुए टाटा संस को पब्लिक कंपनी बनाने (IPO लाने) की दिशा में कदम उठाने का संकल्प लिया है।

  • वहीं, टाटा ट्रस्ट्स का एक धड़ा कंपनी को निजी बनाए रखने के पक्ष में था।

बॉम्बे हाउस में साइरस मिस्त्री विवाद के बाद यह पहला मौका है जब टाटा संस के बोर्ड और समूह के 66% मालिक टाटा ट्रस्ट्स के बीच इस स्तर का खुला कानूनी और प्रशासनिक टकराव देखने को मिल रहा है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह मामला अदालत की चौखट पर पहुंचेगा या फिर दोनों पक्ष बातचीत से बीच का कोई रास्ता निकालेंगे।