सऊदी विमान में थे 1 अरब डॉलर? तेहरान में पकी सीक्रेट डील की खिचड़ी, जानें हूती हमलों के बीच कहां गायब हुआ 'मक्का पैक्ट' और पाकिस्तान
पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक रंगमंच पर एक ऐसे सनसनीखेज खुलासे ने हड़कंप मचा दिया है, जिसने रियाद, तेहरान और इस्लामाबाद के कूटनीतिक गलियारों को हिलाकर रख दिया है। इजरायली मीडिया आउटलेट 'इजरायल हायोम' (Israel Hayom) और अंतरराष्ट्रीय रक्षा सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सऊदी अरब के एक शीर्ष प्रतिनिधिमंडल को लेकर ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचे सैन्य विमान में कथित तौर पर 1 अरब डॉलर (करीब 8,400 करोड़ रुपये) की भारी-भरकम राशि मौजूद थी। दावा है कि यह रकम यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को एक गुप्त संघर्षविराम समझौते के तहत सौंपने के लिए लाई गई थी।
हालांकि, सऊदी अरब के आधिकारिक हलकों ने किसी भी तरह के प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण की औपचारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन तेहरान में आयोजित इस बंद कमरे की बैठक ने यह साफ कर दिया है कि सऊदी अरब अपने तेल प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डों और शहरों पर होने वाले विनाशकारी हूती हमलों को रोकने के लिए किसी भी समझौते पर उतरने को तैयार है। लाल सागर में व्यापारिक जहाजों और सऊदी अरामको की रिफाइनरियों पर हूती ड्रोन और मिसाइल हमलों ने सऊदी अर्थव्यवस्था और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के महत्वाकांक्षी 'विजन 2030' के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। ऐसे में यह सवाल तेजी से गूंज रहा है कि क्या सऊदी अरब ने दशकों पुराने युद्ध को खत्म करने के लिए आर्थिक सौदेबाजी का रास्ता चुन लिया है?
तेहरान में क्या खिचड़ी पकी? ईरान की मध्यस्थता और हूतियों की मांगें
तेहरान में आयोजित यह बैठक केवल एक सामान्य कूटनीतिक मेल-जोल नहीं थी, बल्कि यह शक्ति संतुलन के नए समीकरणों की पटकथा थी। चीन की मध्यस्थता में सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक संबंध बहाल होने के बाद तेहरान अब खुद को खाड़ी क्षेत्र के सबसे बड़े शांति मध्यस्थ (Diplomatic Mediator) के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। ईरान का घोषित मकसद यह है कि वह अमेरिका या इजरायल के किसी भी सैन्य हस्तक्षेप के बिना खाड़ी की सुरक्षा संरचना को क्षेत्रीय शक्तियों के हाथ में रखे।
इस सीक्रेट मीटिंग में जो शर्तें टेबल पर रखी गईं, उनका मुख्य केंद्र 1 अरब डॉलर का कथित फंड था। दरअसल, हूती विद्रोही लंबे समय से यह मांग कर रहे हैं कि उत्तरी यमन में काम कर रहे लाखों सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और डॉक्टरों के कई वर्षों से रुके हुए वेतन का भुगतान सऊदी अरब करे। इसके अलावा, सना एयरपोर्ट और होदेइदाह बंदरगाह से हर तरह की आर्थिक पाबंदियां हटाने की शर्त भी रखी गई थी। सऊदी अरब ने इस प्रस्ताव के बदले हूतियों से दो टूक गारंटी मांगी है:
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सऊदी अरब के किसी भी शहर, एयरपोर्ट या अरामको के तेल संयंत्रों पर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमले फौरन और स्थायी रूप से बंद किए जाएं।
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लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले सऊदी तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों को निशाना न बनाया जाए।
'मक्का पैक्ट' और पाकिस्तान: संकट की घड़ी में कहां गायब हुआ 'इस्लामिक नाटो'?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला पहलू पाकिस्तान की भूमिका का है। महज कुछ समय पहले ही सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मिलकर ऐतिहासिक 'मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट' (Mecca Joint Defence Agreement) पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने 'इस्लामिक नाटो' का नाम दिया था। इस समझौते की मूल धारा यह थी कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा और जरूरत पड़ने पर सैन्य बल का संयुक्त प्रयोग किया जाएगा।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बयान दिया था कि यदि सऊदी अरब की संप्रभुता पर हूतियों का हमला होता है, तो मक्का समझौते की धाराओं को सक्रिय किया जा सकता है और पाकिस्तान सऊदी की हिफाजत के लिए सैन्य कदम उठाएगा। लेकिन जब हूतियों ने सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे और रिफाइनरियों पर मिसाइलें बरसाईं, तो पाकिस्तान की यह कागजी हुंकार पूरी तरह फुस्स साबित हुई। पाकिस्तान ने जमीनी स्तर पर अपनी सेना या वायुसेना का कोई दस्ता सऊदी अरब की मदद के लिए नहीं भेजा।
पाकिस्तान की मजबूरी: आर्थिक लाचारी या घरेलू शिया आबादी का डर?
सवाल उठता है कि जब मक्का पैक्ट में सुरक्षा की कसम खाई गई थी, तो पाकिस्तान पीछे क्यों हट गया? रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे पाकिस्तान की अपनी दोहरी और गंभीर मजबूरियां हैं:
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घरेलू सांप्रदायिक संतुलन और ईरान सीमा: पाकिस्तान की आबादी का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा शिया समुदाय का है। यदि पाकिस्तान यमन में शिया हूती लड़ाकों के खिलाफ सऊदी अरब के पक्ष में सीधे तौर पर युद्ध में उतरता, तो उसके अपने ही मुल्क में भीषण शिया-सुन्नी गृहयुद्ध और सांप्रदायिक दंगे भड़कने का खतरा पैदा हो जाता। इसके अलावा, पाकिस्तान की 900 किलोमीटर से लंबी सीमा सीधे ईरान से लगती है, जहां पहले से ही बलूच विद्रोहियों को लेकर तनाव रहता है। ऐसे में ईरान के परोक्ष लड़ाकों (हूतियों) पर हमला करना तेहरान से सीधा बैर मोल लेना होता।
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खस्ताहाल अर्थव्यवस्था और आईएमएफ का शिकंजा: पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार कर्ज के सहारे टिका है और वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की सख्त शर्तों में जकड़ा हुआ है। युद्ध लड़ने के लिए भारी-भरकम बजट, गोला-बारूद और ईंधन की दरकार होती है। सऊदी अरब से कर्ज और सस्ता तेल लेने के बावजूद पाकिस्तान के पास किसी विदेशी जंग में अपनी सेना झोंकने की वित्तीय क्षमता नहीं है। इसी लाचारी के चलते पाकिस्तान ने मक्का पैक्ट को केवल एक प्रतीकात्मक दस्तावेज बनाकर छोड़ दिया।
तुर्की की दूरी और सऊदी अरब का अकेलापन: पैसों से शांति खरीदने की विवशता
मक्का पैक्ट के तीसरे बड़े साझेदार तुर्की ने भी इस संकट में सऊदी अरब को केवल ड्रोन और तकनीकी सलाह देने की बात कही, लेकिन जमीनी जंग में हाथ डालने से साफ इनकार कर दिया। तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन अपने क्षेत्र में खुद को एक स्वतंत्र वैश्विक शक्ति के रूप में देखते हैं और वे किसी भी हाल में लाल सागर के संघर्ष में सीधे उलझना नहीं चाहते थे।
जब सऊदी अरब को यह पूरी तरह समझ आ गया कि न तो अमेरिका के पैट्रियट मिसाइल सिस्टम हूतियों के सस्ते ड्रोन को रोकने में 100 प्रतिशत कारगर हैं और न ही मक्का समझौते के सहयोगी (पाकिस्तान और तुर्की) उसकी सुरक्षा के लिए अपनी सेनाएं भेजेंगे, तो रियाद के पास एक ही रास्ता बचा—सीधे पर्दे के पीछे से खेल को नियंत्रित करने वाले 'मास्टरमाइंड' यानी ईरान के साथ मेज पर बैठना। 1 अरब डॉलर की इस कथित डील को विश्लेषक 'रणनीतिक समर्पण' के रूप में देख रहे हैं, जहां सऊदी अरब ने अपने आधुनिक बुनियादी ढांचे को जलने से बचाने के लिए वित्तीय समझौता करना ही सबसे कम नुकसानदेह विकल्प माना।
आगे की राह: क्या पैसे देकर खरीदी गई शांति टिक पाएगी?
तेहरान में पकी इस खिचड़ी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हूती विद्रोही इस समझौते पर टिके रहेंगे? हूती कोई पारंपरिक सेना नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी वैचारिक गुरिल्ला शक्ति हैं जो पूरे मध्य पूर्व में इजरायल और पश्चिमी ताकतों के खिलाफ लड़ रही हैं। लाल सागर में वैश्विक व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाना उनकी रणनीतिक ताकत बन चुका है।
यदि सऊदी अरब 1 अरब डॉलर देकर कुछ महीनों के लिए शांति खरीद भी लेता है, तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि भविष्य में इजरायल-हमास या ईरान-अमेरिका के बीच नया तनाव भड़कने पर हूती दोबारा सऊदी रिफाइनरियों को निशाना नहीं बनाएंगे। इस पूरे प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध में भारी-भरकम रक्षा बजट और बड़े अंतरराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन (जैसे मक्का पैक्ट) जमीनी हकीकत के सामने बेबस साबित हो सकते हैं, और जब अस्तित्व पर बन आती है, तो पुराने दुश्मन भी एक ही टेबल पर सीक्रेट डील करने को मजबूर हो जाते हैं।