ऑस्टियोपोरोसिस को क्यों कहते हैं 'साइलेंट किलर'? जानें लक्षण, कारण और बचाव के सही उपाय
हमारे शरीर का पूरा ढांचा हड्डियों की मजबूती पर टिका होता है, लेकिन जब यही ढांचा अंदर ही अंदर खोखला होने लगे और हमें इसका रत्ती भर भी अहसास न हो, तो यह स्थिति बेहद खतरनाक रूप ले लेती है। चिकित्सा जगत में ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) को 'साइलेंट बीमारी' या खामोश बीमारी कहा जाता है और यह नाम इस रोग के स्वभाव पर पूरी तरह सटीक बैठता है। अधिकांश मामलों में इंसान खुद को पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त और स्वस्थ महसूस कर रहा होता है, उसकी दिनचर्या भी बिल्कुल सामान्य चल रही होती है, लेकिन अचानक जमीन पर जरा सा पैर फिसलने, बिस्तर से उठते समय हल्का झटका लगने या फिर सामान्य छींक आने पर भी शरीर की कोई मुख्य हड्डी टूट जाती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति हैरान रह जाता है कि आखिर इतनी मामूली बात पर फ्रैक्चर कैसे हो गया, जबकि हकीकत यह होती है कि हड्डियों का घनत्व और आंतरिक मजबूती कई सालों से धीरे-धीरे खत्म हो रही थी।
हड्डियों का अंदरूनी विज्ञान: क्यों बिना किसी लक्षण के चुपके से हमला करता है ऑस्टियोपोरोसिस
मानव शरीर की हड्डियां कोई निष्क्रिय ढांचा नहीं हैं, बल्कि वे जीवित ऊतक (Living Tissue) होती हैं, जिनमें पुनर्निर्माण की निरंतर जैविक प्रक्रिया चलती रहती है। हमारे शरीर में पुरानी और घिस चुकी हड्डियों के ऊतक प्राकृतिक रूप से टूटते रहते हैं और उनकी जगह नई मजबूत कोशिकाएं बनती रहती हैं। युवावस्था तक शरीर में नई हड्डियों के बनने की रफ्तार पुरानी हड्डियों के क्षरण से कहीं तेज होती है, जिसके चलते हड्डियां घनी और फौलादी बनी रहती हैं। हालांकि, जैसे-जैसे उम्र 30 से 35 वर्ष के पार पहुंचती है, यह संतुलन बिगड़ने लगता है और नई हड्डियां बनने की गति धीमी पड़ने लगती है।
जब पुरानी हड्डियों के क्षरण की दर नई कोशिकाओं के निर्माण से अधिक तेज हो जाती है, तो हड्डियों का बोन मिनरल डेंसिटी (बीएमडी) यानी घनत्व घटने लगता है। हड्डियों की आंतरिक संरचना एक मधुमक्खी के छत्ते की तरह बारीक जालीदार होती है, लेकिन ऑस्टियोपोरोसिस होने पर इस जाली के छेद बड़े और खोखले हो जाते हैं। यही वजह है कि जब तक हड्डी पूरी तरह टूट नहीं जाती, तब तक न तो मांसपेशियों में कोई दर्द होता है और न ही जोड़ों में किसी सूजन का पता चलता है। रीढ़ की हड्डी के गंभीर मामलों में मरीज को चलने-फिरने या बैठने में असहनीय कमर दर्द तब शुरू होता है, जब रीढ़ की निचली हड्डी यानी वर्टेब्रा अंदर ही अंदर दबकर क्रश या फ्रैक्चर हो चुकी होती है।
महिलाओं में मेनोपॉज, विटामिन डी-3 की कमी और हड्डियों के कमजोर होने के मुख्य कारण
हड्डियों के असमय कमजोर होने के पीछे कई शारीरिक, जैविक और जीवनशैली से जुड़े कारण जिम्मेदार होते हैं। विशेष रूप से महिलाओं में यह समस्या पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक देखने को मिलती है। महिलाओं में रजोनिवृत्ति यानी मेनोपॉज के बाद शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन के स्तर में भारी और अचानक गिरावट दर्ज की जाती है, जो हड्डियों की मजबूती बनाए रखने के लिए सबसे अहम हार्मोन माना जाता है। इस हार्मोनल बदलाव के चलते महिलाओं की हड्डियों से कैल्शियम तेजी से बहने लगता है, जिससे उनका कंकाल तंत्र बेहद नाजुक हो जाता है।
इसके अलावा आधुनिक दौर में युवाओं के भीतर विटामिन डी-3 की व्यापक कमी भी इसका सबसे प्रमुख कारण बनकर उभरी है। मेडिकल जांचों में अक्सर यह पाया जाता है कि स्वस्थ दिखने वाले युवाओं में भी विटामिन डी-3 का स्तर खतरनाक रूप से नीचे चला जाता है। चूंकि भोजन से मिलने वाले कैल्शियम को शरीर तभी अवशोषित कर सकता है जब खून में पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी मौजूद हो, ऐसे में धूप से दूरी और गलत खान-पान सीधे हड्डियों के क्षरण को बुलावा देते हैं। इसके अतिरिक्त परिवार में ऑस्टियोपोरोसिस का आनुवंशिक इतिहास होना, थायराइड ग्रंथि का असंतुलन, गठिया या दमा जैसी बीमारियों के इलाज के लिए लंबे समय तक स्टेरॉयड और कॉर्टिकोस्टेरॉइड दवाओं का अंधाधुंध सेवन, अत्यधिक धूम्रपान, शराब की लत और पोषक तत्वों को पचाने में आंतों की अक्षमता भी हड्डियों को खोखला बना देती है।
ये 4 शुरुआती संकेत बताते हैं कि आपकी हड्डियां अंदर से हो चुकी हैं बहुत ज्यादा नाजुक
यद्यपि ऑस्टियोपोरोसिस प्रारंभिक अवस्था में बिल्कुल खामोश रहता है, लेकिन शरीर कुछ ऐसे सूक्ष्म संकेत जरूर देता है जिन्हें समय रहते पहचानना अनिवार्य है:
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मामूली सी चोट या झटके से फ्रैक्चर होना: यदि किसी व्यक्ति को हल्के से ठोकर लगने, फर्श पर पैर फिसलने या कोई साधारण वजन उठाने भर से हाथ की कलाई, कूल्हे (हिप) या रीढ़ की हड्डी में हेयरलाइन या गंभीर फ्रैक्चर हो जाए, तो यह स्पष्ट संकेत है कि हड्डियां पहले से ही खोखली हो चुकी हैं।
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कद में अचानक कमी आना: उम्र बढ़ने के साथ यदि किसी व्यक्ति की लंबाई में दो सेंटीमीटर या उससे अधिक की गिरावट दर्ज की जाए, तो इसे केवल बुढ़ापे का सामान्य असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह रीढ़ के मनकों के आंतरिक क्षरण और उनके आपस में दबने का सीधा परिणाम होता है।
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शरीर के पोस्चर में बदलाव और कूबड़ निकलना: यदि कोई व्यक्ति अचानक झुककर चलने लगे या उसकी पीठ के ऊपरी हिस्से में कूबड़ (डोवेजर हंप) उभर आए, विशेषकर जब यह बदलाव लंबाई घटने के साथ देखा जाए, तो यह कमजोर हड्डियों का चेतावनी संकेत है।
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उठते-बैठते समय पीठ और कमर के निचले हिस्से में तेज दर्द: सामान्य तौर पर हड्डियों का क्षरण कोई दर्द पैदा नहीं करता, लेकिन जब रीढ़ की निचली हड्डी में सूक्ष्म फ्रैक्चर होने लगते हैं, तो मरीज को खड़े रहने या बैठने में तीव्र कमर दर्द की शिकायत रहने लगती है।
किन्हें करानी चाहिए डेक्सा स्कैन जांच और कैसे सुरक्षित रखें अपनी हड्डियों का स्वास्थ्य
चिकित्सा मानकों के अनुसार 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र की सभी महिलाओं और 70 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों को नियमित रूप से 'डेक्सा स्कैन' (DEXA Scan - Bone Density Test) जरूर करवाना चाहिए। इसके अलावा यदि किसी को समय से पहले मेनोपॉज हो गया हो, वजन बहुत कम हो, या फिर बिना किसी भारी दुर्घटना के कोई हड्डी टूटी हो, तो कम उम्र में भी डॉक्टर की सलाह से यह बोन स्कैन करवाना जरूरी हो जाता है।
हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए रोजाना संतुलित आहार का सेवन करें, जिसमें दूध, दही, पनीर, रागी, सोयाबीन, हरी पत्तेदार सब्जियां और प्रोटीन की प्रचुर मात्रा शामिल हो। सुबह की गुनगुनी धूप में 20 से 30 मिनट जरूर बिताएं और आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकीय परामर्श के बाद विटामिन डी-3 और कैल्शियम सप्लीमेंट्स का नियमित सेवन करें। रोजाना कम से कम 30 मिनट तेज गति से टहलना (ब्रिस्क वॉक) और हल्के वजन के व्यायाम करना हड्डियों के पुनर्निर्माण को सक्रिय करता है। इसके साथ ही बुजुर्गों को गिरने से बचाने के लिए घर के कमरों और बाथरूम में बिना फिसलने वाले एंटी-स्किड मैट और मजबूत पायदान का उपयोग करना चाहिए तथा तंबाकू, धूम्रपान और शराब के अत्यधिक सेवन से पूरी तरह दूरी बनानी चाहिए।