छड़ी के सहारे प्राची ने जापान में लहराया तिरंगा: 6 बार स्पाइन सर्जरी के बाद टेबल टेनिस में रचा इतिहास

छड़ी के सहारे प्राची ने जापान में लहराया तिरंगा: 6 बार स्पाइन सर्जरी के बाद टेबल टेनिस में रचा इतिहास

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की बेटी प्राची पांडेय ने जापान की धरती पर आयोजित एशियाई पैरा गेम्स 2026 में अद्वितीय पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए भारत का मान पूरी दुनिया में बढ़ा दिया है। गंभीर रीढ़ (स्पाइन) की समस्या से जूझने और चलने-फिरने के लिए छड़ी का सहारा लेने के बावजूद प्राची ने महिला एकल क्लास सिक्स (Class 6) टेबल टेनिस स्पर्धा में ऐतिहासिक कांस्य पदक जीतकर पोडियम पर अपनी जगह पक्की कर ली। विश्व रैंकिंग में 17वें स्थान पर काबिज प्राची ने अपनी फौलादी इच्छाशक्ति और जादुई खेल कौशल से यह साबित कर दिया कि शारीरिक अक्षमता कभी भी मजबूत इरादों के आगे बाधा नहीं बन सकती। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद गृह जनपद उन्नाव, कानपुर मंडल और पूरे प्रदेश के खेल प्रेमियों में जश्न का माहौल है।

इराक की चैंपियन नजला अल को सेमीफाइनल में दी करारी शिकस्त, 12 अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंटों में जीत चुकी हैं पदक

जापान में खेले गए इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट के रोमांचक सेमीफाइनल मुकाबले में प्राची पांडेय का सामना इराक की दिग्गज खिलाड़ी नजला अल से हुआ, जो वर्तमान दौर में पैरालंपिक और एशियन पैरा गेम्स की डिफेंडिंग चैंपियन मानी जाती हैं। टेबल टेनिस बोर्ड के एक छोर पर छड़ी के सहारे खड़ी होकर संतुलन बनाते हुए प्राची ने अपने आक्रामक शॉट और रणनीति से इराक की चैंपियन को पूरी तरह बैकफुट पर धकेल दिया और जीत दर्ज कर पदक पर मुहर लगाई। प्राची का यह कारनामा कोई अचानक मिली सफलता नहीं है, बल्कि इससे पूर्व भी वे विश्व भर के 12 बड़े अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग टूर्नामेंटों में देश के लिए पदक हासिल कर चुकी हैं। ब्राजील, थाईलैंड, जर्मनी, नाइजीरिया और जॉर्डन जैसे देशों में आयोजित प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पैरा टेबल टेनिस प्रतियोगिताओं में भी उनका बल्ला अपनी चमक बिखेर चुका है।

सॉफ्टवेयर इंजीनियर से अंतरराष्ट्रीय पैरा एथलीट बनने का सफर: 6 स्पाइन सर्जरी के बाद भी नहीं मानी हार

मूल रूप से उन्नाव की रहने वाली प्राची पांडेय पेशे से चंडीगढ़ में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर कार्यरत रही हैं। बचपन से ही खेलों के प्रति गहरा लगाव रखने वाली प्राची के जीवन में उस समय भारी संकट आ खड़ा हुआ जब उन्हें रीढ़ की हड्डी से जुड़ी एक बेहद गंभीर और लाइलाज समझी जाने वाली बीमारी ने घेर लिया। डॉक्टरों ने कई जटिल ऑपरेशनों की सलाह दी और प्राची को एक के बाद एक कुल 6 बार स्पाइन की बड़ी सर्जरी से गुजरना पड़ा। शारीरिक असहनीय पीड़ा और लंबे समय तक बिस्तर पर रहने के बाद भी प्राची का आत्मविश्वास नहीं डिगा। उन्होंने न केवल खुद को दोबारा पैरों पर खड़ा किया बल्कि अपनी शारीरिक दिव्यांगता को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तिरंगा लहराने का संकल्प लिया।

साई सेंटर गांधीनगर में रोजाना 1000 फोरहैंड और टॉप स्पिन का कड़ा अभ्यास

पदक जीतने के इस कठिन सफर को साकार करने के लिए प्राची पिछले एक साल से गुजरात के गांधीनगर स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के अत्याधुनिक सेंटर में कठोर प्रशिक्षण ले रही थीं। टेबल टेनिस के तकनीकी गुर सिखाने वाले उनके कोच अमरेश ने बताया कि प्राची की सबसे बड़ी ताकत उनका कभी न हार मानने वाला जज्बा है। वे प्रतिदिन टेबल पर 1000 से अधिक बार फोरहैंड, बैकहैंड और आक्रामक टॉप स्पिन जैसे कठिन शॉट्स का अनवरत अभ्यास करती थीं। एक हाथ से छड़ी को संतुलित करना और दूसरे हाथ से बिजली की गति से गेंद पर प्रहार करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन प्राची ने इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया।

स्पॉन्सरशिप की किल्लत और आर्थिक तंगी को मात देकर पहुंचीं जापान

जापान में पदक जीतने के बाद दैनिक जागरण से विशेष बातचीत करते हुए प्राची पांडेय ने अपने संघर्ष के दिनों को याद किया। उन्होंने बताया कि वे पूरी तैयारी और आत्मविश्वास के साथ इस चैंपियनशिप में देश का प्रतिनिधित्व करने गई थीं और उन्हें भरोसा था कि वे खाली हाथ नहीं लौटेंगी। प्राची ने साझा किया कि प्रतियोगिता से ठीक पहले स्पॉन्सरशिप और यात्रा खर्च जुटाने को लेकर गहरा संकट पैदा हो गया था, जिससे एक समय ऐसा लगने लगा था कि वे शायद जापान जा ही नहीं पाएंगी। हालांकि, परिवार के अटूट विश्वास, खेल प्रेमियों और स्थानीय शुभचिंतकों द्वारा की गई आर्थिक मदद के दम पर वे अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने में सफल रहीं और कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया।