'संसद से बेहतर तो विधानसभा है, काश मैं MLA होता!' FCRA और परिसीमन पर पी. चिदंबरम का मोदी सरकार पर तीखा हमला; बोले- हंसी का पात्र बन गया है लोकतंत्र का मंदिर

'संसद से बेहतर तो विधानसभा है, काश मैं MLA होता!' FCRA और परिसीमन पर पी. चिदंबरम का मोदी सरकार पर तीखा हमला; बोले- हंसी का पात्र बन गया है लोकतंत्र का मंदिर

देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था संसद की मौजूदा कार्यप्रणाली, विधेयकों को बिना सार्थक बहस के पारित कराने के तौर-तरीकों और जनहित के मुद्दों पर विपक्ष की आवाज को अनसुना करने के आरोपों के बीच पूर्व केंद्रीय गृह एवं वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला है। चेन्नई में आयोजित कांग्रेस पार्टी की एक महत्वपूर्ण बैठक को संबोधित करते हुए वरिष्ठ राज्यसभा सांसद चिदंबरम ने संसद की स्थिति पर गहरा अफसोस जताया और कहा कि आज संसद दिन-ब-दिन मजाक और हंसी का पात्र बनती जा रही है। इस दौरान उन्होंने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक, 2026 के बाद प्रस्तावित परिसीमन और 'एक देश, एक चुनाव' जैसे ज्वलंत विषयों पर सरकार की नीतियों को संविधान के संघीय ढांचे के लिए गंभीर खतरा बताया।

'संसद से बेहतर तो विधानसभा है': चिदंबरम के बयान से सियासी हलचल

चेन्नई के मंच से अपने लंबे संसदीय और विधायी अनुभवों को साझा करते हुए पी. चिदंबरम ने राज्य विधानसभाओं और देश की संसद के कामकाज की तुलना की। उन्होंने तमिलनाडु विधानसभा में होने वाली बहसों और जनहित के नीतिगत विमर्श की खुलकर सराहना की। चिदंबरम ने कहा कि राज्य विधानसभाओं में जनता के बुनियादी मुद्दों पर संसद की तुलना में कहीं अधिक गंभीर, सकारात्मक और असरदार बहसें देखने को मिलती हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री ने तंज कसते हुए कहा कि तमिलनाडु विधानसभा की कार्यवाही को देखने के बाद कभी-कभी उनके मन में यह विचार आता है कि उन्हें संसद में सांसद (MP) होने के बजाय राज्य विधानसभा में एक विधायक (MLA) होना चाहिए था। उनके इस बयान ने राष्ट्रीय राजनीति में यह बहस छेड़ दी है कि क्या संसद में विधायी प्रक्रियाओं की गुणवत्ता सचमुच लगातार गिर रही है।

बिना बहस 12 बिल पास, स्थगन प्रस्तावों का सूखा: 'मजाक बन चुकी है संसद'

हाल ही में संपन्न हुए संसद के मानसून सत्र का उल्लेख करते हुए चिदंबरम ने आरोप लगाया कि सत्र के दौरान सरकार के अड़ियल रवैये के चलते कोई सार्थक और सकारात्मक कामकाज नहीं हो पाया। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर विपक्ष को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया और सदन को बार-बार स्थगित किया जाता रहा। चिदंबरम ने सवाल उठाया कि पिछले 12 वर्षों में संसद में किसी भी अहम राष्ट्रीय संकट या गंभीर विषय पर स्थगन प्रस्ताव (Adjournment Motion) को चर्चा के लिए स्वीकार क्यों नहीं किया गया। उन्होंने राजधानी दिल्ली में छात्रों के हालिया विरोध-प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए कहा कि छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई, जिसमें एक छात्र की आंख की रोशनी तक चली गई, उस संवेदनशील मामले पर भी संसद में स्थगन प्रस्ताव के जरिए चर्चा की अनुमति नहीं दी गई। चिदंबरम ने आरोप लगाया कि सरकार ने बिना किसी विस्तृत चर्चा के 12 महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवा लिया, जिससे संसद केवल एक औपचारिकता और मजाक बनकर रह गई है।

FCRA संशोधन बिल पर कड़ा प्रहार: 'अल्पसंख्यक व सामाजिक संगठनों को कुचलने का प्रयास'

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधनों पर चिदंबरम ने कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने इसे देश के सबसे दमनकारी और खराब कानूनों में से एक करार दिया। चिदंबरम ने दावा किया कि इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य सामाजिक कल्याण, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर काम करने वाले ईसाई और मुस्लिम धर्मार्थ संगठनों, ट्रस्टों और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) को निशाना बनाना है। अपने गृह क्षेत्र शिवगंगा का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां एक कैथोलिक बिशप द्वारा संचालित अनाथालय और स्कूल का एफसीआरए पंजीकरण तीन साल पहले रद्द कर दिया गया था। चिदंबरम ने कहा कि हजारों ईसाई बिशप, पादरी और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दशकों से भारतीय समाज और वंचितों की निस्वार्थ सेवा की है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून के जरिए ऐसे जनसेवी संगठनों के फंड और संपत्तियों पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है।

परिसीमन पर दक्षिणी राज्यों के लिए रेड अलर्ट: प्रतिनिधित्व घटने की चेतावनी

चिदंबरम ने अपने संबोधन में परिसीमन (Delimitation) के मुद्दे को देश के लोकतांत्रिक संतुलन के लिए सबसे संवेदनशील संकट बताया। उन्होंने आगाह किया कि यदि 2026 के बाद जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्गठन किया गया, तो दक्षिण भारत के राज्यों—तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना—का संसद में प्रतिनिधित्व काफी घट सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि जिन दक्षिणी राज्यों ने राष्ट्रीय विकास में योगदान देते हुए परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को पूरी निष्ठा से लागू किया, उन्हें इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कम सीटों के रूप में दंडित नहीं किया जाना चाहिए। चिदंबरम ने मौजूदा 543 लोकसभा सीटों की संख्या को ही बरकरार रखने की वकालत की और चेतावनी दी कि एकतरफा परिसीमन प्रस्ताव कानून बनने पर बेहद खतरनाक साबित होगा।

'एक देश, एक चुनाव' संघीय ढांचे पर हमला और विपक्षी एकजुटता का आह्वान

केंद्र सरकार के 'वन नेशन, वन इलेक्शन' प्रस्ताव पर चिदंबरम ने कहा कि यह विचार भारतीय संविधान के संघीय ढांचे (Federal Structure) के मूल सिद्धांतों के विपरीत है और देश की स्थापित चुनावी व्यवस्था को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर देगा। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राज्यों के अपने क्षेत्रीय मुद्दे और स्वायत्तता होती है, जिसे केंद्रीय व्यवस्था में नहीं दबाया जा सकता। परिसीमन और संघीय अधिकारों की रक्षा के लिए चिदंबरम ने एक साझा राजनीतिक रणनीति पेश करते हुए अपील की कि तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक जैसे दक्षिणी राज्यों के दलों को उत्तर प्रदेश और बिहार की प्रमुख विपक्षी पार्टियों के साथ मिलकर एक मजबूत मोर्चा बनाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि यदि दक्षिण और हिंदी पट्टी के बड़े राज्यों के दल एकजुट हो जाएं, तो केंद्र सरकार इस एकतरफा परिसीमन प्रस्ताव को थोप नहीं पाएगी।

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