दिल्ली में प्रदर्शनों पर UN की आलोचना पर भारत ने जताया कड़ा ऐतराज, जिनेवा में दिया दो टूक जवाब

दिल्ली में प्रदर्शनों पर UN की आलोचना पर भारत ने जताया कड़ा ऐतराज, जिनेवा में दिया दो टूक जवाब

संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति की उच्चस्तरीय बैठक में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर मानवाधिकारों के नाम पर चुनिंदा देशों को घेरने की पश्चिमी और बहुपक्षीय प्रवृत्तियों पर बेहद कड़ा और दो टूक रुख अपनाया है। जिनेवा में आयोजित इस महत्वपूर्ण सत्र के दौरान भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मानवाधिकार जैसे संवेदनशील विषय का उपयोग किसी संप्रभु राष्ट्र पर अनुचित राजनीतिक दबाव बनाने या उसे रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए कतई नहीं किया जाना चाहिए। भारतीय राजनयिक प्रतिनिधिमंडल ने बिना किसी ठोस सत्यापन और अधूरे, एकतरफा आंकड़ों के आधार पर दुनिया के सबसे बड़े और जीवंत लोकतंत्र की वैश्विक छवि को धूमिल करने के सुनियोजित प्रयासों का पुरजोर और तार्किक विरोध दर्ज कराया। भारत की ओर से यह तीखी और स्पष्ट प्रतिक्रिया तब सामने आई जब संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों के एक समूह ने नई दिल्ली में छात्रों और युवाओं के हालिया विरोध-प्रदर्शनों से निपटने के प्रशासनिक तौर-तरीकों पर उंगली उठाई थी।

जिनेवा में गरजीं उप सचिव बरखा ताम्रकार: निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवाद पर दिया सबसे ज्यादा बल

संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति (सोशल, ह्यूमैनिटेरियन एंड कल्चरल अफेयर्स) में भारत का आधिकारिक पक्ष रखते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने अंतरराष्ट्रीय मंचों के दोहरे मानदंडों की तीखी आलोचना की। बरखा ताम्रकार ने अपने संबोधन में जोर देकर कहा कि मानवाधिकारों से जुड़े किसी भी विमर्श में पूर्ण निष्पक्षता, संतुलन और पारदर्शिता का होना अनिवार्य शर्त है। भारत बहुपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों के साथ रचनात्मक जुड़ाव और सार्थक साझेदारी के लिए सदैव तत्पर रहा है, परंतु यह जुड़ाव केवल और केवल आपसी समझ, संप्रभुता के सम्मान और वास्तविक सहयोग के आधार पर ही संभव हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जमीनी रिपोर्टों और परिस्थितियों को उनके सही ऐतिहासिक और कानूनी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ताम्रकार ने यह भी रेखांकित किया कि संयुक्त राष्ट्र की किसी भी नियमित प्रक्रिया या सामान्य संवाद को अंतिम विधिक फैसला मानकर प्रचारित करने की प्रवृत्ति मानवाधिकार तंत्र की विश्वसनीयता को ही गहरी चोट पहुंचाती है।

दिल्ली में युवा प्रदर्शनों पर यूएन विशेषज्ञों की टिप्पणी: भारत ने बताया पूर्वाग्रह से ग्रसित और अपुष्ट

भारत का यह आक्रामक राजनयिक पलटवार दरअसल जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र के बीस से अधिक स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों द्वारा जारी किए गए एक विवादास्पद संयुक्त बयान के बाद सामने आया है। इन विदेशी विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में आरोप लगाया था कि नई दिल्ली में शिक्षा व्यवस्था में सुधार और मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे युवाओं और छात्र संगठनों के खिलाफ स्थानीय सुरक्षा बलों ने अनुचित बल प्रयोग किया। विशेषज्ञों ने दिल्ली पुलिस की कथित सख्त कार्रवाई पर गंभीर चिंता जताते हुए दावा किया था कि प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए अत्यधिक बल का प्रयोग किया गया, सार्वजनिक सभाओं पर एकतरफा पाबंदियां लगाई गईं और लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया। इस आधार पर यूएन पैनल ने भारतीय अधिकारियों से अपील की थी कि वे नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करें।

7 हजार हिरासत और फोन जब्ती के दावों पर सवाल: चुनावी सूचियों को लेकर गढ़े गए आरोपों का खंडन

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों द्वारा जारी किए गए पत्र में यह भी आरोप मढ़ा गया था कि देश भर के छात्र शिक्षा नीतियों और मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने के मामलों के विरोध में सड़कों पर उतरे थे। रिपोर्ट में अपुष्ट खबरों का हवाला देते हुए यह संवेदनशील दावा किया गया कि मतदाता सूची से नाम काटे जाने की इस प्रक्रिया का सर्वाधिक नकारात्मक प्रभाव मुस्लिम, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के मतदाताओं पर पड़ा है। इसके साथ ही बयान में यह सनसनीखेज आंकड़ा पेश किया गया कि नई दिल्ली में 7,000 से अधिक युवाओं, स्वतंत्र पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों को हिरासत में लेकर राजधानी के दूर-दराज के डिटेंशन सेंटरों में भेजा गया था। विशेषज्ञों ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के व्यक्तिगत मोबाइल फोन जब्त किए गए, डिजिटल सामग्री हटाई गई और कई लोगों के साथ दुर्व्यवहार हुआ, यद्यपि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अधिकांश लोगों को 24 घंटे के भीतर रिहा कर दिया गया था। भारत ने इन आंकड़ों को भ्रामक, जमीनी हकीकत से परे और राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित करार देते हुए साफ किया कि देश की निष्पक्ष निर्वाचन प्रणाली और स्वतंत्र न्यायपालिका किसी भी नागरिक के अधिकारों के हनन की अनुमति नहीं देती।

संप्रभुता बनाम वैश्विक दखल: लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में कानून के राज का भारत ने दिया हवाला

भारतीय राजनयिकों ने विश्व मंच पर यह स्पष्ट किया कि भारत का संविधान हर नागरिक को शांतिपूर्ण प्रदर्शन और असहमति का मौलिक अधिकार प्रदान करता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून के राज की सीमाओं के अधीन है। किसी भी लोकतांत्रिक देश की राजधानी में कानून और व्यवस्था बनाए रखना और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चुनी हुई सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को यह आईना दिखाया कि वे गैर-सरकारी स्रोतों और राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित तत्वों के अपुष्ट दावों को मानवाधिकारों का रंग देकर अपनी निष्पक्षता को न खोएं। वैश्विक मानवाधिकार मंचों का इस्तेमाल यदि चुनिंदा देशों की घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप के औजार के रूप में किया जाएगा, तो इससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की बुनियाद ही कमजोर होगी। भारत के इस कड़े संदेश ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह सिद्ध कर दिया है कि वह अपने लोकतांत्रिक ताने-बाने और आंतरिक संप्रभुता के मामलों में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप या निराधार नसीहत को कतई स्वीकार नहीं करेगा।