रूसी तेल पर 100% अमेरिकी टैरिफ की आशंका के बीच जयशंकर की मार्को रूबियो से अहम बैठक: भारत ने दो टूक रखी अपनी बात

रूसी तेल पर 100% अमेरिकी टैरिफ की आशंका के बीच जयशंकर की मार्को रूबियो से अहम बैठक: भारत ने दो टूक रखी अपनी बात

रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल की निरंतर खरीद को लेकर भारत और अमेरिका के बीच उपजे कूटनीतिक तनाव के बीच भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में अपने अमेरिकी समकक्ष (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) मार्को रूबियो के साथ एक उच्चस्तरीय और संवेदनशील द्विपक्षीय बैठक की है।

यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका की संसद (कांग्रेस) से पारित विवादित 'लिंडसे ग्राहम सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' (SRIA) पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हस्ताक्षर कर उसे कानून का रूप दे दिया है। इस नए कानून के तहत अमेरिका को यह विशेषाधिकार मिल गया है कि वह रूस और ईरान से पेट्रोलियम उत्पाद या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले किसी भी तीसरे देश के आयात पर 10% से लेकर 100% तक का दंडात्मक टैरिफ (Punitive Tariff) थोप सकता है। इस संभावित खतरे के बीच जयशंकर ने भारत के आर्थिक और रणनीतिक हितों को अमेरिकी प्रशासन के सामने पूरी मजबूती और स्पष्टता के साथ रखा।

जयशंकर ने सोशल मीडिया पर दी जानकारी: ऊर्जा सुरक्षा पर दो टूक

बैठक संपन्न होने के बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर जानकारी साझा की। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया कि भारत ने अमेरिका के नए प्रतिबंधात्मक कानून को लेकर अपनी चिंताओं को सीधे तौर पर दर्ज कराया है।

डॉ. जयशंकर ने लिखा:

"अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रूबियो से मिलकर अच्छा लगा। बैठक के दौरान SRIA (सेंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट) के संबंध में भारत के राष्ट्रीय हितों और बुनियादी चिंताओं को मजबूती से दोहराया। इसके साथ ही खाड़ी क्षेत्र और यूक्रेन युद्ध की मौजूदा जमीनी स्थितियों पर भी विस्तृत चर्चा की।"

सूत्रों के मुताबिक, भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी पक्ष को स्पष्ट संदेश दिया कि भारत की कच्चे तेल की खरीद विशुद्ध रूप से बाजार की मांग, आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता और देश की 1.4 अरब की आबादी को किफायती ऊर्जा मुहैया कराने के उद्देश्य से संचालित है, न कि किसी भू-राजनीतिक मंशा से।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का बयान

बैठक के बाद अमेरिकी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रूबियो ने भी इस मुलाकात को सकारात्मक बताते हुए साझेदारी पर जोर दिया। रूबियो ने अपने आधिकारिक बयान में कहा:

  • "न्यूयॉर्क में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ सार्थक और व्यापक बैठक हुई। हम दोनों देश मिलकर अमेरिका-भारत द्विपक्षीय साझेदारी को और मजबूत कर रहे हैं तथा क्षेत्रीय स्तर पर साझा हितों के लिए बहुपक्षीय प्रयासों के साथ बेहतर तालमेल बैठा रहे हैं।"

हालांकि, अमेरिकी विदेश विभाग के आधिकारिक बयान में टैरिफ और ऊर्जा खरीद के तीखे बिंदुओं को कूटनीतिक भाषा के पीछे रखा गया, लेकिन वाशिंगटन के जानकारों का मानना है कि बंद कमरों की वार्ता में दोनों पक्षों के बीच इस कानून के असर को लेकर बेहद सीधी और तल्ख चर्चा हुई है।

क्या है ट्रंप का 'SRIA कानून' और भारत पर क्या है इसका जोखिम?

रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा पेश किए गए इस कानून का मूल उद्देश्य रूस और ईरान के ऊर्जा राजस्व पर चोट कर उनकी युद्ध क्षमताओं को पंगु बनाना है।

  • कानून का दायरा: इस कानून के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति को यह कानूनी शक्ति दी गई है कि जो देश रूस या ईरान से तेल या गैस का आयात जारी रखेंगे, उनके उत्पादों पर अमेरिका 10% से लेकर 100% तक का भारी आयात शुल्क (Tariff) लगा सकता है।

  • भारत के लिए चिंता: साल 2022 में रूस-यूक्रेन संघर्ष की शुरुआत के बाद से भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा रूस से रियायती दामों पर खरीद रहा है। इसके बाद पश्चिम एशिया में ईरान से जुड़े तनावों के चलते भारत के लिए आपूर्ति की विविधता बनाए रखना राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन गया है।

  • राष्ट्रपति का विशेषाधिकार: हालांकि इस कानून में भारत का नाम सीधे तौर पर शामिल नहीं है और न ही यह तुरंत प्रभाव से स्वतः लागू होता है, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के पास किसी भी समय भारत पर दंडात्मक टैरिफ लगाने का कानूनी आधार मौजूद रहेगा।

भारत का सख्त रुख: बाहरी दबाव में नहीं होंगे फैसले

विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस पूरे घटनाक्रम पर पहले भी अपना रुख दोहराया है कि भारत की विदेश और आर्थिक नीति पूर्णतः संप्रभु है। भारत किसी भी तीसरे देश के घरेलू कानूनों या एकतरफा प्रतिबंधों से बंधा हुआ नहीं है।

भारतीय अधिकारियों का तर्क है कि यदि भारत ने वैश्विक बाजार से रूसी तेल खरीदना बंद कर दिया होता, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 130 से 150 डॉलर प्रति बैरल के पार चली जातीं, जिससे पूरी दुनिया में महामंदी और मुद्रास्फीति की सुनामी आ जाती। भारत वैश्विक तेल बाजार को स्थिर बनाए रखने में एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में काम कर रहा है और अपने नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए अपनी स्वतंत्र ऊर्जा रणनीति पर कायम रहेगा।