तेलंगाना में कॉलेजों से मिटेगा जातिगत भेदभाव, सरकार लाएगी ऐतिहासिक 'रोहित वेमुला बिल'
उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों के परिसरों में वर्षों से महसूस की जा रही असमानता और मानसिक प्रताड़ना की शिकायतों पर पूर्ण विराम लगाने के लिए तेलंगाना सरकार ने एक बड़ा विधायी कदम उठाने की घोषणा की है। राज्य के मुख्यमंत्री और उच्च शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि उच्च शिक्षा के परिसरों से जातिगत पूर्वाग्रहों और प्रताड़ना को जड़ से समाप्त करने के लिए राज्य में बहुप्रतीक्षित 'रोहित वेमुला बिल' को कानून का रूप देने की विस्तृत प्रक्रिया तेज कर दी गई है। यह प्रस्तावित कानून केवल कागजी दिशा-निर्देश बनकर नहीं रहेगा, बल्कि इसे कानूनी तौर पर बाध्यकारी अधिकारों, पारदर्शी न्यायिक तंत्र और जवाबदेह प्रशासनिक मशीनरी के साथ लागू किया जाएगा, ताकि हैदराबाद यूनिवर्सिटी जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की पुनरावृत्ति किसी भी शैक्षणिक परिसर में कभी न हो सके।
यूजीसी के पुराने नियमों की सीमाएं और नए कानून की अनिवार्यता
वर्तमान समय में पूरे देश सहित तेलंगाना के उच्च शिक्षण संस्थानों में भी यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) के साल 2012 के पुराने दिशा-निर्देशों के आधार पर भेदभाव निवारक व्यवस्था संचालित की जाती रही है। यूजीसी की उन मौजूदा नियमावलियों में विद्यार्थियों के दाखिले में अड़चन डालने, मूल्यांकन में पक्षपात करने, स्कॉलरशिप रोकने, हॉस्टल व मेस में अलग-थलग करने, या कक्षा के भीतर किसी छात्र को आरक्षित वर्ग का बताकर अपमानित करने जैसी बातों को स्पष्ट रूप से निषेध तो किया गया है, लेकिन उनके पास सख्त वैधानिक दंडात्मक शक्ति का भारी अभाव रहा है। कई मामलों में यह देखा गया कि कॉलेजों के आंतरिक प्रशासनिक तंत्र ऐसी शिकायतों को वर्षों तक लंबित रखते थे और पीड़ित छात्रों को कानूनी सुरक्षा या समयबद्ध न्याय नहीं मिल पाता था। इसी संस्थागत कमी को दूर करने के लिए तेलंगाना सरकार अब राज्य स्तर पर एक ठोस और जवाबदेह कानून लाने जा रही है, जो शिकायतों पर त्वरित और अनिवार्य कार्रवाई की कानूनी गारंटी प्रदान करेगा।
नालसार लॉ यूनिवर्सिटी तैयार करेगी मसौदा, छात्रों और शिक्षकों से लिया जाएगा परामर्श
इस ऐतिहासिक कानून के कानूनी ढांचे को किसी भी खामी से मुक्त और व्यावहारिक रूप से बेहद असरदार बनाने के लिए राज्य सरकार ने देश के शीर्ष विधि संस्थान 'नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ' (NALSAR) की विशेष विशेषज्ञता लेने का औपचारिक फैसला किया है। नालसार के प्रतिष्ठित कानूनविदों और रिसर्च स्कॉलरों की टीम इस बिल का प्राथमिक वैधानिक मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार करेगी। कानून के निर्माण में केवल प्रशासनिक अधिकारियों की राय तक सीमित न रहते हुए, लोकतांत्रिक परामर्श की एक व्यापक प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है। इसके तहत राज्यभर के विश्वविद्यालयों के दलित, बहुजन और वंचित वर्ग के छात्र संगठनों, शिक्षक संघों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानवाधिकार अधिवक्ताओं और विषय विशेषज्ञों के साथ विशेष राउंड-टेबल बैठकों का आयोजन किया जाएगा, ताकि वास्तविक जमीनी अनुभवों और रोजमर्रा के अदृश्य भेदभावों को इस कानून की धाराओं में विधिवत शामिल किया जा सके।
भेदभाव के नए और कड़े दायरे: अंकों में कटौती, रिसर्च पर रोक और हॉस्टल से बेदखली अपराध
प्रस्तावित 'रोहित वेमुला बिल' के संभावित प्रावधानों में उन सूक्ष्म और अप्रत्यक्ष तौर-तरीकों को कानूनी रूप से संज्ञेय अपराध की श्रेणी में परिभाषित किया जा रहा है, जिनका इस्तेमाल अक्सर वंचित वर्ग के विद्यार्थियों को प्रताड़ित करने के लिए किया जाता रहा है। नए कानून के तहत मौखिक परीक्षा (वाइवा) में जानबूझकर दुर्भावनापूर्ण तरीके से कम अंक देना, फेलोशिप व स्कॉलरशिप के दस्तावेजों को बेवजह दबाए रखना या देरी करना, लैब और रिसर्च के आवश्यक संसाधनों से वंचित रखना, शोध पत्र प्रकाशन में बाधा डालना, थीसिस गाइड द्वारा असहयोग करना या हॉस्टल खाली करने के लिए मानसिक व सामाजिक दबाव बनाना स्पष्ट रूप से गैर-कानूनी भेदभाव माना जाएगा। शैक्षणिक परिसरों में किसी भी विद्यार्थी की सामाजिक पृष्ठभूमि, जाति या उप-जाति को लेकर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से की जाने वाली किसी भी व्यंग्यात्मक टिप्पणी या मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न को संज्ञेय अपराध के रूप में दर्ज किया जाएगा।
90 दिनों की अनिवार्य समयसीमा और एससी-एसटी प्रतिनिधियों वाली विशेष जांच समितियां
इस कानून का सबसे मजबूत पहलू इसकी समयबद्ध और निष्पक्ष जांच प्रक्रिया को माना जा रहा है। मसौदे के प्रावधानों के तहत राज्य के प्रत्येक विश्वविद्यालय और संबद्ध कॉलेज परिसर में अनिवार्य रूप से एक स्थायी विशेष जांच समिति (Anti-Discrimination Cell) का गठन किया जाएगा। इन समितियों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और महिला प्रतिनिधियों की अनिवार्य मौजूदगी सुनिश्चित की जाएगी, ताकि संस्थान का प्रशासनिक दबाव जांच प्रक्रिया को प्रभावित न कर सके। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी पीड़ित छात्र द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत की प्राथमिक जांच और अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए 90 दिनों की सख्त समयसीमा तय की जा रही है। इस 90-दिवसीय अवधि के भीतर समिति को मामले की निष्पक्ष सुनवाई पूरी करके अपनी बाध्यकारी सिफारिशें संस्थान प्रमुख और राज्य स्तरीय निगरानी प्राधिकरण को सौंपनी होंगी।
बर्खास्तगी, निष्कासन, भारी जुर्माना और पीड़ित को अनिवार्य मुआवजे के कड़े प्रावधान
यदि जांच समिति की रिपोर्ट में किसी शिक्षक, प्रोफेसर, कर्मचारी या छात्र पर जातिगत भेदभाव का आरोप प्रमाणित हो जाता है, तो कानून के तहत बेहद कठोर दंडात्मक कदमों की कानूनी व्यवस्था की गई है। दोषी पाए जाने वाले शिक्षकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से सेवा से निलंबित अथवा स्थायी रूप से बर्खास्त करने की कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही दोषी छात्रों को संस्थान से निष्कासित करने और उनकी शैक्षणिक डिग्रियों पर प्रतिबंध लगाने तक के प्रावधान मसौदे में शामिल हैं। जो कॉलेज या शैक्षणिक संस्थान इन वैधानिक नियमों को लागू करने में लापरवाही बरतेंगे, शिकायतों को दबाने का प्रयास करेंगे या जांच में बाधा पहुंचाएंगे, उन पर लाखों रुपये का भारी वित्तीय जुर्माना लगाने और उनकी सरकारी मान्यता या अनुदान रद्द करने की सख्त अनुशंसा की गई है। इसके अलावा, भेदभाव और मानसिक आघात से जूझने वाले पीड़ित छात्र को आर्थिक व मनोवैज्ञानिक संबल देने के लिए संस्थान की ओर से अनिवार्य मुआवजा राशि प्रदान करने का स्पष्ट नियम भी बनाया जा रहा है।
पहचान की पूर्ण गोपनीयता और निष्पक्ष अपील के लिए राज्य स्तरीय निगरानी मंच
जातिगत उत्पीड़न के मामलों में अक्सर छात्र इसलिए चुप रह जाते हैं क्योंकि उन्हें अपने करियर, भविष्य के अंक और सुरक्षा पर बदले की भावना से होने वाली कार्रवाई का गहरा डर सताता रहता है। इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान करते हुए नए विधेयक में व्हिसलब्लोअर और शिकायतकर्ता की पहचान को पूरी तरह गोपनीय रखने का सख्त कानूनी सुरक्षा कवच प्रदान किया जाएगा। शिकायत दर्ज कराने वाले किसी भी छात्र को संस्थान द्वारा किसी भी रूप में प्रताड़ित करने की कोशिश को एक अतिरिक्त गंभीर अपराध माना जाएगा। इसके अलावा, यदि किसी पक्ष को कॉलेज स्तर की समिति के फैसले से असंतोष होता है, तो उन्हें राज्य स्तर पर गठित होने वाले स्वतंत्र अपीलीय न्यायाधिकरण (Appellate Tribunal) के समक्ष अपील दायर करने का वैधानिक अधिकार मिलेगा। यह पूरा तंत्र शैक्षणिक परिसरों को जातिमुक्त, भयमुक्त और पूरी तरह समावेशी वातावरण प्रदान करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी परिवर्तनकारी मील का पत्थर साबित होगा।