मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का विवाद अभी थमा भी नहीं था कि घिरे चुनाव आयोग के एक और वरिष्ठ अफसर

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का विवाद अभी थमा भी नहीं था कि घिरे चुनाव आयोग के एक और वरिष्ठ अफसर

मतदाता सूची संशोधन (SIR) और आयोग की निष्पक्षता को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों का विरोध प्रदर्शन अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के भीतर से एक और बड़ा प्रशासनिक विवाद सामने आ गया है। इस बार विवादों के घेरे में आयोग के सबसे प्रभावशाली अधिकारियों में गिने जाने वाले सीनियर डिप्टी चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग आ गए हैं।

हैरान करने वाली बात यह है कि इस बार सवाल किसी बाहरी राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि आयोग के भीतर मौजूद दोनों चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने उठाए हैं। दोनों चुनाव आयुक्तों ने देश के कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखकर मनीष गर्ग द्वारा लिए गए प्रशासनिक और फाइल-रूटिंग से जुड़े फैसलों पर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई थी।

विवाद की मुख्य वजह: IT विंग की फाइल मॉनिटरिंग से IAS अफसर को हटाना

इस पूरे विवाद की जड़ में चुनाव आयोग के अति-संवेदनशील आईटी (IT) विंग की फाइलों का रूटिंग सिस्टम है:

  • प्रशासनिक स्तर को समाप्त करना: सीनियर डिप्टी चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग ने एक आंतरिक आदेश जारी कर आईटी महानिदेशक (DG IT) डॉ. सीमा खन्ना की फाइलों की समीक्षा करने वाले डिप्टी चुनाव आयुक्त संजय कुमार (IAS) की भूमिका को बीच से हटा दिया था।

  • सीधी रिपोर्टिंग: पहले नियम यह था कि आईटी विंग के फैसले और फाइलें फील्ड अनुभव रखने वाले आईएएस स्तर के डिप्टी चुनाव आयुक्त की निगरानी के बाद ही आगे बढ़ते थे। नए आदेश के तहत यह स्तर खत्म कर फाइलों को सीधे मनीष गर्ग के जरिए शीर्ष स्तर पर भेजने की व्यवस्था की गई।

  • आयुक्तों की आपत्ति: चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने इसे तय प्रशासनिक प्रक्रिया और बहुस्तरीय जांच (Multi-tier scrutiny) का उल्लंघन माना। दोनों आयुक्तों के कड़े विरोध के बाद इस विवादास्पद आदेश को वापस लेना पड़ा था।

सीनियरिटी की दलील और संजय कुमार का ट्रांसफर

मनीष गर्ग ने अपने फैसले के पक्ष में दलील दी थी कि आईटी महानिदेशक डॉ. सीमा खन्ना को लेवल-14 से प्रमोट कर लेवल-15 (अपर सचिव स्तर) का अधिकारी बनाया गया था, जबकि उनकी फाइलों की समीक्षा कर रहे डिप्टी चुनाव आयुक्त संजय कुमार लेवल-14 के अधिकारी थे। प्रोटोकॉल के लिहाज से एक जूनियर स्तर का अधिकारी सीनियर अफसर की फाइलों की समीक्षा नहीं कर सकता, इसलिए फाइल रूटिंग बदली गई थी।

हालांकि, विवाद यहीं नहीं रुका। कुछ समय बाद ही संजय कुमार की चुनाव आयोग से उनके मूल कैडर में वापसी (रिपैट्रिएशन) हो गई। संजय कुमार के पद छोड़ते ही उनका प्रभार भी मनीष गर्ग को ही सौंप दिया गया। इसके चलते जिस तकनीकी और आईटी विंग की निगरानी को लेकर सवाल उठे थे, उसकी पूरी कमान एक बार फिर मनीष गर्ग के पास ही केंद्रित हो गई।

क्यों गहराता जा रहा है चुनाव आयोग का यह संकट?

यह मामला ऐसे समय में गरमाया है जब चुनाव आयोग पहले से ही कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है:

  • ECINET और SIR का तकनीकी केंद्रीकरण: राजनीतिक दल आरोप लगा रहे हैं कि चुनाव आयोग के नए पोर्टल और सॉफ्टवेयर के जरिए राज्य और जिला स्तर के वैधानिक अधिकारियों (DEO/ERO) के अधिकारों को दबाकर पूरा कंट्रोल दिल्ली स्थित आईटी विंग अपने हाथ में ले रहा है।

  • संवैधानिक स्वायत्तता बनाम DoPT: कैबिनेट सचिव ने दोनों चुनाव आयुक्तों की चिट्ठियों को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को विचारार्थ भेजा, लेकिन चुनाव आयोग के एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था होने के कारण सरकार सीधे हस्तक्षेप से बचती दिखी।

  • अंदरूनी अविश्वास: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग के भीतर आयुक्तों और शीर्ष नौकरशाहों के बीच तालमेल की यह कमी संस्था की साख और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रही है।