विजयदशमी 2026 पर शनि की साढ़ेसाती और राहु-केतु के महादोष से पाएं तुरंत मुक्ति
सनातन परंपरा में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि यानी विजयादशमी को वर्ष के साढ़े तीन सबसे शक्तिशाली और स्वयं-सिद्ध 'अबूझ मुहूर्तों' में से एक माना गया है। यह वह पावन दिन है जब ब्रह्मांड में नकारात्मक शक्तियों का पराभव होता है और सकारात्मक ऊर्जा अपने चरम पर होती है। पौराणिक ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण पर आक्रमण करने से पूर्व और महाभारत काल में अर्जुन ने अज्ञातवास समाप्त होने पर विजयदशमी के ही दिन अस्त्र-शस्त्रों और प्रकृति की दिव्य शक्तियों की आराधना की थी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब किसी जातक की जन्मकुंडली में शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या, राहु की महादशा या केतु के अशुभ प्रभाव के कारण जीवन में लगातार विपदाएं, मानसिक संताप, आर्थिक तंगी और असाध्य रोग घर कर लेते हैं, तब दशहरा का विजय मुहूर्त इन सभी कुप्रभावों को नष्ट करने के लिए एक अभूतपूर्व संजीवनी सिद्ध होता है। इस दिन श्रवण नक्षत्र और अपराह्न काल का संयोग नवग्रहों के क्रूर प्रभाव को शांत करने की अपार क्षमता रखता है, जिससे साधारण से उपाय भी तत्काल फलदायी हो जाते हैं।
शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से मुक्ति के लिए शमी वृक्ष और तेल दान का महाप्रयोग
ज्योतिष में शनि देव को कर्मफल दाता और दंडाधिकारी का पद प्राप्त है, जिनकी वक्र दृष्टि राजा को भी रंक बना देती है। यदि आपकी कुंडली में शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या का प्रभाव चल रहा है अथवा शनि सातवें, आठवें या बारहवें भाव में पीड़ित होकर निरंतर दुर्घटना, व्यापार में नुकसान या हड्डियों के रोग दे रहे हैं, तो विजयदशमी की संध्या का समय आपके लिए वरदान समान है। इस दिन प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के ठीक बाद किसी पवित्र स्थान या घर के ईशान कोण में स्थित शमी वृक्ष के समक्ष जाएं। शमी के वृक्ष को साक्षात शनि देव का प्रिय माना गया है। शमी की जड़ में सबसे पहले थोड़ा सा कच्चा गाय का दूध और गंगाजल अर्पित करें। इसके पश्चात शुद्ध सरसों के तेल अथवा तिल के तेल का एक चौमुखी दीपक जलाएं, जिसमें काले तिल और साबुत उड़द के कुछ दाने अवश्य डालें। दीपक प्रज्वलित करने के बाद हाथ जोड़कर 'शमी शमयते पापम् शमी लोहितकण्टका। धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी॥' मंत्र का कम से कम 21 बार जप करें। इसके बाद शमी के वृक्ष से एक छोटा सा पत्ता तोड़कर अपने पूजा स्थान में रखें और अगले दिन उसे चांदी के ताबीज में भरकर अपनी दाईं भुजा या गले में धारण करें। साथ ही, विजयदशमी के दिन किसी निर्धन, असहाय या सफाईकर्मी को लोहे का तवा, काले जूते या छाते का दान करने से शनि देव की क्रूरता तत्काल प्रभाव से समाप्त होकर शुभता में परिवर्तित हो जाती है।
राहु की महादशा, भ्रम और अचानक आने वाले संकटों को शांत करने का अचूक विधान
राहु को छाया ग्रह माना गया है, जो जातक की बुद्धि को भ्रमित कर रातों-रात गलत निर्णय लेने पर विवश करता है। राहु के दुष्प्रभाव से अनिद्रा, डिप्रेशन, अकारण भय, कानूनी विवाद और शेयर बाजार या सट्टे में भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। विजयदशमी बुराई पर अच्छाई और छल पर धर्म की विजय का प्रतीक है, इसलिए राहु के मायावी जाल को काटने के लिए इस दिन विशेष उपाय किए जाते हैं। राहु शांति के लिए विजयदशमी के दिन दोपहर के विजय मुहूर्त में एक जटा वाला नारियल लें। उस नारियल पर मौली (कलावा) लपेटें और उस पर थोड़ा सा नीला पुष्प तथा काले तिल अर्पित करें। इसके बाद उस नारियल को अपने सिर से घड़ी की सुई की उल्टी दिशा (एंटी-क्लॉकवाइज) में 7 बार वार लें। वारने के उपरांत मन ही मन राहु बीज मंत्र 'ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः' का 108 बार स्मरण करें। इसके पश्चात सूर्यास्त से ठीक पहले इस नारियल को किसी बहते हुए पवित्र जल स्रोत या नदी में प्रवाहित कर दें। यदि आसपास नदी न हो, तो इसे रावण दहन के समय अग्नि के समीप सुरक्षित रख आएं अथवा किसी शिव मंदिर में भगवान भैरव के चरणों में अर्पित कर दें। इसके अतिरिक्त, इस दिन सात प्रकार के अनाज (सतनाजा) का दान किसी कुष्ठ रोगी या जरूरतमंद को करने से राहु का विषैला प्रभाव पूर्णतः क्षीण हो जाता है।
केतु के आकस्मिक घात, अज्ञात भय और पारिवारिक कलह से निजात के टोटके
केतु को मोक्ष और वैराग्य का कारक ग्रह कहा जाता है, परंतु अशुभ स्थिति में होने पर यह जातक को गुप्त रोग, अचानक दुर्घटना, मित्रों से विश्वासघात और पारिवारिक अलगाव का शिकार बना देता है। यदि आपकी कुंडली में केतु का प्रभाव प्रतिकूल है, तो दशहरे के पावन अवसर पर ध्वज दान का महाप्रयोग अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध होता है। विजयादशमी के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद एक त्रिकोणीय (तीन कोनों वाला) पीला या केसरिया रेशमी झंडा बनवाएं। उस ध्वज पर सिंदूर और चमेली के तेल से ॐ अथवा स्वास्तिक का पवित्र चिन्ह अंकित करें। विजय मुहूर्त में इस ध्वज को किसी प्रसिद्ध हनुमान मंदिर या भगवान शिव के मंदिर के शिखर पर स्थापित करवाएं। मान्यता है कि जैसे-जैसे यह ध्वज हवा में लहराता है, वैसे-वैसे जातक के जीवन से केतु के कारण आने वाली अचानक विपत्तियां और संकट स्वतः समाप्त हो जाते हैं। इसके साथ ही, दशहरे की शाम को दो रंग के (काले और सफेद) आवारा कुत्तों को मीठी रोटी या सरसों के तेल से चुपड़ी हुई रोटी अवश्य खिलानी चाहिए। केतु के शमन के लिए किसी संन्यासी अथवा अनाथालय में दो रंग के कंबल या गर्म वस्त्रों का गुप्त दान करना जातक के भाग्योदय का मार्ग प्रशस्त करता है।
विजय मुहूर्त में अपराजिता पूजन, नीलकंठ दर्शन और रक्षा कवच धारण की गुप्त विधि
विजयादशमी के दिन अपराह्न काल में माता अपराजिता की विशेष पूजा का विधान है, जो सभी प्रकार के गृह दोषों, शत्रु बाधाओं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती हैं। घर के उत्तर-पूर्व भाग में अष्टदल कमल बनाकर उस पर अपराजिता देवी का आह्वान करें और उन्हें नीले रंग के अपराजिता पुष्प अर्पित करें। इस दौरान 'ॐ अपराजितायै नमः' मंत्र की एक माला जपें। विजयादशमी के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन को साक्षात भगवान शिव का आशीर्वाद माना गया है। यदि प्रत्यक्ष दर्शन न हो सकें, तो नीलकंठ की तस्वीर का दर्शन कर अपने दोनों हाथ जोड़कर मनचाही सफलता की प्रार्थना करें। इसके पश्चात एक लाल रेशमी रक्षा सूत्र लेकर उसे माता अपराजिता और भगवान श्रीराम के चरणों में स्पर्श कराएं और फिर उसे अपनी कलाई पर बांध लें। यह रक्षा सूत्र वर्ष भर जातक को तंत्र दोष, बुरी नजर और ग्रहों के अनिष्ट से सुरक्षित रखने वाले एक अभेद्य कवच की भांति कार्य करता है।
इन आवश्यक नियमों और सावधानियों का पालन सुनिश्चित करें
दशहरे के दिन किए जाने वाले इन तांत्रिक और वैदिक उपायों का पूर्ण लाभ तभी प्राप्त होता है जब जातक कुछ बुनियादी नियमों का कड़ाई से पालन करे। इस पूरे दिन घर के वातावरण को शांत, शुद्ध और सकारात्मक बनाए रखना अनिवार्य है। किसी भी प्रकार के तामसिक भोजन, मदिरापान या परनिंदा से पूर्ण परहेज करें। दान देते समय मन में किसी भी प्रकार का अहंकार न लाएं और उपायों को पूर्णतः गोपनीय रखें, क्योंकि गुप्त दान और एकांत में की गई साधना ही शीघ्र फलदायी होती है। ग्रहों के दोष केवल बाह्य परिस्थितियों का परिणाम नहीं होते, बल्कि हमारे कर्मों का दर्पण होते हैं; अतः विजयदशमी के दिन अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ और अहंकार रूपी रावण का दहन करने का संकल्प लेकर ही इन उपायों को करें, जिससे नवग्रह अनुकूल होकर जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और विजयश्री का मार्ग सदैव प्रशस्त रखें।