कार्तिक मास 27 अक्टूबर से शुरू: ब्रह्म मुहूर्त स्नान, महादान और तुलसी पूजन के ये गुप्त नियम बदल देंगे आपका भाग्य

कार्तिक मास 27 अक्टूबर से शुरू: ब्रह्म मुहूर्त स्नान, महादान और तुलसी पूजन के ये गुप्त नियम बदल देंगे आपका भाग्य

सनातन धर्म के पंचांग में वर्ष के सभी बारह महीनों में कार्तिक मास को सबसे पवित्र, मोक्षदायी और ऊर्जावान महीना माना गया है। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि 'न कार्त्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम्' अर्थात कार्तिक के समान कोई श्रेष्ठ मास नहीं है और सत्ययुग के समान कोई युग नहीं है। इस वर्ष 27 अक्टूबर से पुण्यदायिनी कार्तिक मास का विधिवत शुभारंभ हो रहा है, जो अगले एक माह तक श्रद्धालुओं के जीवन में आध्यात्मिक चेतना और सकारात्मक बदलाव का संचार करेगा। भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने का समय इसी पावन महीने में 'देवउठनी एकादशी' के रूप में आता है, इसलिए इसे 'दामोदर मास' भी कहा जाता है। उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक केंद्रों जैसे काशी, प्रयागराज, अयोध्या, मथुरा-वृंदावन और हरिद्वार में इस पूरे महीने लाखों श्रद्धालु कल्पवास और नदी स्नान का व्रत लेते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखें तो शरद ऋतु के आगमन के साथ वातावरण में वायुमंडलीय बदलाव और ओस की बूंदों में औषधीय गुण होते हैं। इस समय जल और आकाश तत्व में एक विशेष प्रकार का संतुलन स्थापित होता है, जो मानव शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध होता है।

ब्रह्म मुहूर्त में कार्तिक स्नान और कल्पवास के पावन नियम व तीर्थ परंपरा

कार्तिक मास का सबसे प्रमुख और अनिवार्य अंग ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना माना गया है। शास्त्रों का आदेश है कि कार्तिक के पूरे महीने सूर्योदय से ठीक पूर्व यानी तारों की छांव में जब ब्रह्म मुहूर्त रहता है, तब पवित्र नदियों, सरोवरों या कुंडों में स्नान करना चाहिए। प्रयागराज के त्रिवेणी संगम और काशी की गंगा की धारा में इस दौरान डुबकी लगाने का विशेष माहात्म्य है। यदि किसी कारणवश तीर्थ स्थलों पर जाना संभव न हो, तो अपने घर पर ही सामान्य जल में कुछ बूंदें गंगाजल मिलाकर 'गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥' मंत्र का स्मरण करते हुए स्नान करें। ऐसा करने से तीर्थ स्नान के समान ही फल की प्राप्ति होती है। स्नान के तुरंत बाद तांबे के पात्र से भगवान सूर्य नारायण को कुमकुम, अक्षत और लाल पुष्प डालकर अर्घ्य अर्पित करना चाहिए। प्रयागराज में इस पूरे महीने कल्पवास करने वाले श्रद्धालु एक समय सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं, भूमि पर शयन करते हैं और निरंतर हरिनाम संकीर्तन में लीन रहते हैं, जिससे मन और आत्मा से सभी प्रकार के विकारों का नाश हो जाता है।

तुलसी पूजन का विशेष महत्व: घर में सुख-समृद्धि और आरोग्य के लिए रोजाना करें ये कार्य

कार्तिक मास साक्षात मां तुलसी और भगवान शालिग्राम के अनन्य प्रेम का प्रतीक माना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास में नित्य तुलसी माता की सेवा, सिंचन और परिक्रमा करता है, उसके घर में कभी भी दरिद्रता और गृहक्लेश का वास नहीं होता। 27 अक्टूबर से प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान से निवृत्त होकर तुलसी के पौधे में शुद्ध जल, कच्चा दूध और थोड़ा सा गंगाजल अर्पित करना चाहिए। इसके पश्चात तुलसी के तने पर रोली, अक्षत और चंदन का तिलक लगाएं और 'महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धिनी, आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वं नमोऽस्तुते' मंत्र का कम से कम 11 बार भक्तिभाव से जप करें। तुलसी के पौधे के पास की मिट्टी को साफ रखें और शाम के समय गाय के शुद्ध घी का या तिल के तेल का दीपक तुलसी चौरे में अवश्य प्रज्वलित करें। ध्यान रखें कि रविवार, एकादशी और सूर्य ग्रहण के दिन तुलसी के पत्तों को तोड़ना शास्त्रों में सख्त वर्जित बताया गया है। कार्तिक मास के अंत में तुलसी विवाह का आयोजन कराने से कन्यादान के समान महापुण्य की प्राप्ति होती है और विवाह योग्य जातकों के जीवन में आ रही सभी बाधाएं समाप्त हो जाती हैं।

आकाशदीप और दीपदान का अचूक विधान: अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला महापुण्य

कार्तिक महीने में दीपदान को समस्त दानों में सबसे श्रेष्ठ उपाधि दी गई है। इस महीने शाम के समय किसी पवित्र नदी के तट पर, देवालय में, पीपल के वृक्ष के नीचे, तुलसी के समक्ष, घर की चौखट पर और आकाश में ऊंचे स्थान पर 'आकाशदीप' जलाने का विधान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस महीने हमारे पितृ देव यमलोक से पृथ्वी लोक की ओर अपने वंशजों को आशीर्वाद देने आते हैं, और आकाशदीप का दिव्य प्रकाश उनके पथ को आलोकित करता है। घर के मुख्य द्वार पर दोनों ओर नियमित रूप से तिल के तेल का दीपक जलाने से मां लक्ष्मी का स्थाई वास होता है और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। जो जातक पूरे महीने किसी मंदिर में अखंड ज्योति या संध्या दीप प्रज्वलित करते हैं, उनके कुल के सात पीढ़ियों के पाप जलकर भस्म हो जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य या शनि का दोष चल रहा हो, तो उसे इस पूरे महीने शिवालय में तांबे या मिट्टी के दीपक में सरसों का तेल डालकर दीपदान करना चाहिए, इससे सभी प्रकार के ग्रह क्लेशों से तत्काल शांति मिलती है।

कार्तिक माह में क्या करें और क्या न करें: खान-पान और जीवनशैली से जुड़ी जरूरी सावधानियां

कार्तिक मास केवल पूजा-पाठ का नहीं, बल्कि आत्म-संयम, इंद्रिय निग्रह और सात्विक जीवनशैली का महीना है। इस महीने कुछ विशेष नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य बताया गया है। खान-पान की दृष्टि से कार्तिक महीने में बैंगन, मूली, परवल, उड़द की दाल, मसूर की दाल, चना, बासी भोजन और किसी भी प्रकार के मांसाहार व मदिरा का सेवन पूरी तरह से त्याग देना चाहिए। शास्त्रों में मछली और लहसुन-प्याज के सेवन को इस माह में महापाप माना गया है, क्योंकि इस ऋतु में पाचन तंत्र अत्यंत संवेदनशील रहता है। इसके साथ ही, पूरे महीने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें, कठोर वाणी या किसी का अपमान न करें और झूठ बोलने से बचें। जो लोग शारीरिक रूप से सक्षम हों, उन्हें भूमि पर बिस्तर लगाकर शयन करना चाहिए और दिन में केवल एक बार ही अन्न ग्रहण करना चाहिए। इसके विपरीत, इस महीने अन्नदान, वस्त्रदान, आंवला दान और गीता के 12वें व 15वें अध्याय का पाठ करना अनंत कोटि गुना फलदायी माना गया है। कार्तिक के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करने से व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।