आधी रात, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र: आखिर श्रीकृष्ण ने अपने जन्म के लिए क्यों चुना यही समय?
द्वापर युग में जब कंस के अत्याचारों से त्रस्त होकर पृथ्वी का रुदन अपने चरम पर था, तब धर्म की पुनर्स्थापना और मानवता को निष्काम कर्मयोग का अमर पाठ पढ़ाने के लिए भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपने आठवें पूर्णावतार के रूप में धरती पर कदम रखा। किंतु सनातन धर्म के इस सबसे बड़े जन्मोत्सव पर सदियों से विचारकों, दार्शनिकों और ज्योतिषविदों के मन में एक मौलिक जिज्ञासा बनी रही है। भगवान तो सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और काल के भी महाकाल हैं, वे चाहते तो चैत्र की खिली हुई वसंत पंचमी पर दिन के उजाले में जन्म ले सकते थे, या सूर्य के प्रचंड तेज वाले उत्तरायण काल में प्रकट हो सकते थे। फिर आखिर क्या कारण था कि उन्होंने अपने अवतरण के लिए भाद्रपद मास के घने बादलों से घिरी रात का चुनाव किया? क्यों उन्होंने आधी रात के सन्नाटे, कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के मिलन को ही अपने प्राकट्य का साक्षी बनाया? धार्मिक ग्रंथों जैसे श्रीमद्भागवत महापुराण, गर्ग संहिता और वैदिक ज्योतिष के अनुसार, यह कोई साधारण संयोग नहीं था, बल्कि इसके पीछे ब्रह्मांडीय ऊर्जा, सामाजिक संदेश, कर्म संतुलन और चंद्रवंश के गौरव से जुड़ा एक अत्यंत गहरा आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ था।
आधी रात का रहस्य: घोर अंधकार के बीच परम प्रकाश के अवतरण का दर्शन
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का समय 'निशिता काल' यानी ठीक आधी रात का समय चुना गया। इसके पीछे पहला और सबसे बड़ा दार्शनिक कारण अज्ञान और अंधकार का नाश करना था।
आधी रात का समय संसार में घनघोर अंधकार, सन्नाटे और सुषुप्ति (नींद) का प्रतीक होता है। उस कालखंड में मथुरा की जेल केवल पत्थरों की बनी एक कोठरी नहीं थी, बल्कि वह सांसारिक वासनाओं, भय, अहंकार और कंस के क्रूर शासन का प्रतीक थी। जहां चारों ओर निराशा का अंधकार था, वहां आधी रात को प्रकट होकर प्रभु ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि जब जीवन में कष्ट, निराशा और अधर्म का अंधकार अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाए, ठीक उसी क्षण आशा, सत्य और ईश्वरीय चेतना का प्रकाश फूटता है। भगवान परब्रह्म हैं और वे स्वयं प्रकाश स्वरूप हैं।
इसके अतिरिक्त, योग शास्त्र के अनुसार रात्रि का आठवां मुहूर्त मन की समस्त बाह्य वृत्तियों को शांत करने वाला होता है। दिन का समय सांसारिक भागदौड़ और रजोगुण का होता है, जबकि आधी रात का समय आंतरिक ध्यान और तमोगुण को सात्विक ऊर्जा में बदलने का काल होता है। श्रीकृष्ण ने आधी रात को जन्म लेकर यह सिद्ध किया कि ईश्वरीय तत्व को पाने के लिए बाह्य कोलाहल से दूर अंतर्मुखी होना अनिवार्य है।
अष्टमी तिथि का चुनाव: सात के बाद आठवें का रहस्य और जीवन में संतुलन का संदेश
हिंदू पंचांग में चंद्रमा के घटने और बढ़ने के आधार पर 15-15 दिनों के दो पक्ष होते हैं—शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। प्रत्येक पक्ष में प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा या अमावस्या तक की तिथियां चलती हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों पक्षों के ठीक मध्य में आने वाली 'अष्टमी तिथि' और वह भी 'कृष्ण पक्ष' को चुना।
अष्टमी तिथि चंद्रमा के आकार के अनुसार पूर्ण संतुलन की तिथि मानी जाती है। इस दिन न तो चंद्रमा का पूर्ण प्रकाश होता है (जैसा पूर्णिमा को होता है) और न ही पूर्ण अंधकार (जैसा अमावस्या को होता है)। यह तिथि सुख और दुख, प्रकाश और अंधकार, राग और वैराग्य के ठीक मध्य का बिंदु है। भगवान श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन संतुलन यानी कर्मयोग का साक्षात स्वरूप है। वे न तो राम की भांति केवल मर्यादा के कठोर बंधनों में बंधे रहे और न ही संन्यासियों की तरह संसार छोड़कर भागे। वे संसार के बीच रहकर, युद्ध के मैदान में खड़े होकर भी निर्लिप्त रहने वाले योगी थे। अष्टमी तिथि का चयन यह संदेश देता है कि मनुष्य को सुख और दुख के द्वंद्वों के बीच समान भाव से स्थित रहना चाहिए।
इसके साथ ही, संख्या '8' का आध्यात्मिक रहस्य भी अद्भुत है। श्रीकृष्ण देवकी और वसुदेव की 8वीं संतान थे। वे भगवान विष्णु के 8वें अवतार माने गए। सांख्य दर्शन और गीता के अनुसार यह प्रकृति 'अष्टधा प्रकृति' (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) से मिलकर बनी है। भगवान ने 8वें स्वरूप में आकर प्रकृति के इन सभी 8 तत्वों को अपने नियंत्रण में लेकर यह दर्शाया कि वे साक्षात प्रकृति के स्वामी और परमात्मा हैं। कृष्ण पक्ष का चुनाव यह सिखाता है कि जो समाज के शोषित, उपेक्षित और अंधकार में धकेले गए लोग हैं, प्रभु उनके रक्षक बनकर आते हैं।
रोहिणी नक्षत्र का चयन: चंद्रवंश का मान और सम्मोहन का ब्रह्मांडीय विज्ञान
ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्रों की व्यवस्था है। श्रीकृष्ण ने अपने जन्म के लिए रोहिणी नक्षत्र को ही क्यों चुना, इसके पीछे एक अत्यंत भावुक और आनुवंशिक कारण श्रीमद्भागवत में मिलता है।
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म 'चंद्रवंश' में हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंद्रमा की 27 पत्नियां (27 नक्षत्र) हैं, जिनमें से चंद्रमा को रोहिणी सर्वाधिक प्रिय हैं। चंद्रमा का सबसे अधिक लगाव और प्रेम रोहिणी के साथ रहता है। जब भगवान विष्णु ने अपने प्रिय भक्त चंद्रमा के कुल में जन्म लेने का निश्चय किया, तो उन्होंने अपने पूर्वज चंद्रमा को परम आनंद देने के लिए उनकी सबसे प्रिय रानी रोहिणी के नक्षत्र को अपने अवतरण का लग्न बनाया। जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, उस समय चंद्रमा अपनी सबसे प्रिय पत्नी रोहिणी के संग आकाश में विराजमान होकर अपने कुलदीपक के दर्शन कर रहे थे।
रोहिणी नक्षत्र का शाब्दिक अर्थ होता है 'आरोहण' अथवा 'विकास'। यह नक्षत्र सौंदर्य, कामुकता, सम्मोहन, कला, आकर्षण, वात्सल्य और उर्वरता का कारक माना जाता है। इस नक्षत्र का स्वामी स्वयं चंद्रमा है और राशि वृषभ होती है। वृषभ राशि में चंद्रमा 'परम उच्च' का होता है। उच्च का चंद्रमा जिस जातक की कुंडली में हो, उसका व्यक्तित्व सम्मोहक, विचार निर्मल और हृदय करुणा से भरा होता है। भगवान श्रीकृष्ण के नयनों में जो सम्मोहन था, उनकी बांसुरी में जो आकर्षण था और उनके स्वरूप में जो संपूर्ण जगत को मोहित करने वाला लावण्य था, वह खगोलीय दृष्टि से इसी रोहिणी नक्षत्र और उच्च के चंद्रमा की देन था।
द्वापर का अलौकिक जयंती योग: जब ठहर गई थीं समय की सुइयां
वैदिक ज्योतिष के प्रकांड ग्रंथ 'बृहत्पाराशर होराशास्त्र' और 'स्कंद पुराण' में वर्णन आता है कि श्रीकृष्ण के जन्म के समय केवल रोहिणी नक्षत्र ही नहीं, बल्कि कई दुर्लभ खगोलीय घटनाओं का महासंयोग एक साथ बना था।
उस समय भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृषभ लग्न, हर्षण योग और आधी रात का समय था। जब अष्टमी और रोहिणी का मिलन मध्यरात्रि में होता है, तो उसे 'जयंती योग' कहा जाता है। ग्रंथों में कहा गया है कि जब कन्हैया प्रकट हुए, तो पांचों प्रमुख ग्रह अपने उच्च स्थान पर थे। प्रकृति में एक अभूतपूर्व शांति छा गई थी। नदियों का जल निर्मल हो गया था, वनों में फूल खिल उठे थे और अग्नि जो कंस के डर से बुझ चुकी थी, वह स्वतः प्रज्वलित हो उठी थी। इस जयंती योग के कारण ही श्रीकृष्ण को 'सोलह कला संपूर्ण' पूर्णावतार कहा गया, क्योंकि इस समय की ब्रह्मांडीय ऊर्जा अपने सर्वोच्च स्तर पर थी, जिसने एक सामान्य मानव देह में संपूर्ण ब्रह्मांड के ईश्वर को समाहित होने का मार्ग दिया।
ब्रज से अवध और उन्नाव तक: सदियों से चली आ रही आधी रात के जागरण की परंपरा
भगवान श्रीकृष्ण के इस पावन जन्म समय का महत्व आज भी भारत के जनमानस में उसी जीवंतता के साथ रचा-बसा है। मथुरा, वृंदावन, गोकुल और बरसाना में आधी रात 12 बजे जब शंख और घंटों की गूंज होती है, तो लगता है मानो द्वापर युग लौट आया हो।
उत्तर प्रदेश के अवध परिक्षेत्र, विशेष रूप से उन्नाव, कानपुर, लखनऊ और अयोध्या के ग्रामीण व शहरी अंचलों में श्रद्धालु रात 12 बजे तक पलकें बिछाए इंतजार करते हैं। उन्नाव के स्थानीय मंदिरों और घरों में लोग पूरे दिन व्रत रखकर आधी रात को ही कान्हा का खीरे से नाल छेदन कराते हैं। लोग जानते हैं कि यह वही घड़ी है जब प्रकृति ने स्वयं ईश्वर का स्वागत किया था।
आधी रात का यह जागरण वास्तव में केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि अपनी सोई हुई आत्मा को जगाने का संकल्प है। अष्टमी तिथि हमें जीवन में संयम सिखाती है, रोहिणी नक्षत्र हमें प्रेम और आकर्षण की शुद्धता सिखाता है, और आधी रात का प्राकट्य हमें यह विश्वास दिलाता है कि चाहे जीवन में कितनी भी विपत्तियां, कारागार रूपी संकट और कंस रूपी नकारात्मकताएं क्यों न हों, यदि ईश्वर पर अटूट विश्वास है, तो अंततः विजय धर्म, सत्य और प्रकाश की ही होती है।