देश में रसोई गैस की खपत में 16% की भारी गिरावट, क्या बदलने वाला है लाल गैस सिलेंडर का पूरा खेल?
भारत के करोड़ों घरों की रसोई का अनिवार्य हिस्सा रहे 14.2 किलोग्राम वाले पारंपरिक लाल गैस सिलेंडर के भविष्य को लेकर देश के ऊर्जा और पेट्रोलियम सेक्टर में एक बहुत बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। पेट्रोलियम नियोजन एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (PPAC) और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के हालिया मासिक आंकड़ों के मुताबिक, देश के कई प्रमुख राज्यों और उपनगरीय बाजारों में तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) की कुल खपत में 16 प्रतिशत तक की अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की गई है। दशकों से लगातार बढ़ती रहने वाली एलपीजी की मांग में आई यह अचानक मंदी केवल एक मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि यह देश के ऊर्जा उपभोग पैटर्न में आ रहे युगांतरकारी बदलाव की ओर इशारा कर रही है। एक तरफ जहां महानगरों और टियर-2 शहरों में घर-घर पाइप के जरिए प्राकृतिक गैस (PNG) का नेटवर्क तेजी से पहुंच रहा है, वहीं दूसरी तरफ 'पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' के विस्तार ने इंडक्शन कुकिंग (बिजली आधारित खाना पकाने) को गैस सिलेंडर का सबसे सस्ता विकल्प बना दिया है। इस दोहरी मार के बीच पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने भी पारंपरिक सिलेंडरों पर आयात निर्भरता घटाने और नई ऊर्जा नीतियों को जमीन पर उतारने के लिए एक बड़े रणनीतिक पुनर्गठन की रूपरेखा तैयार कर ली है।
16% की गिरावट का जमीनी सच: आखिर क्यों घट रही है गैस सिलेंडरों की मांग?
पेट्रोलियम बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि एलपीजी की खपत में यह तेज गिरावट कई अलग-अलग कारकों के एक साथ सक्रिय होने का परिणाम है।
पहला और सबसे बड़ा कारण शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में 'सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन' (CGD) नेटवर्क का तेजी से पैर पसारना है। पिछले कुछ वर्षों में देश के 300 से अधिक भौगोलिक क्षेत्रों में पाइपलाइन के जरिए घरेलू पीएनजी गैस के कनेक्शन बांटे गए हैं। जिस परिवार के घर में एक बार पीएनजी की पाइपलाइन लग जाती है, वह तुरंत एलपीजी सिलेंडर की बुकिंग बंद कर देता है या केवल आपातकालीन बैकअप के तौर पर एक छोटा सिलेंडर रखता है।
दूसरा बड़ा कारण वाणिज्यिक (कमर्शियल) और होटल-रेस्तरां सेक्टर में बिजली के आधुनिक उपकरणों, इंडक्शन फ्रायर्स और बड़े इलेक्ट्रिक ओवन का बढ़ता इस्तेमाल है। व्यावसायिक 19 किलो वाले सिलेंडरों के ऊंचे दामों और रीफिलिंग के झंझट से बचने के लिए छोटे और मध्यम ढाबों व कैफे ने तेजी से इलेक्ट्रिक कुकटॉप्स का रुख किया है, जिससे व्यावसायिक गैस की बिक्री में भी भारी सुस्ती आई है।
घर-घर PNG पाइपलाइन का जाल: सिलेंडर बुकिंग और डिलीवरी बॉय के दिन लदे
भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय ने देश के 88 प्रतिशत से अधिक भौगोलिक क्षेत्र और 98 प्रतिशत आबादी को सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) के दायरे में लाने का लक्ष्य तय किया है। देश भर में तेजी से बिछाई जा रही गैस ग्रिड के जरिए लाखों घरों को सीधे पाइप से स्वच्छ ईंधन पहुंचाया जा रहा है।
पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह पारंपरिक एलपीजी सिलेंडर की तुलना में 15 से 20 प्रतिशत तक सस्ती पड़ती है। इसके अलावा इसमें न तो हर महीने सिलेंडर बुक कराने की कोई माथापच्ची होती है, न ही डिलीवरी बॉय का इंतजार करना पड़ता है और न ही गैस खत्म होने पर भारी-भरकम सिलेंडर बदलने का कोई जोखिम रहता है। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, लखनऊ और बेंगलुरु जैसे प्रमुख शहरों के विशाल रिहायशी अपार्टमेंट्स और सोसायटियों में अब 90 प्रतिशत से ज्यादा रसोई पूरी तरह पीएनजी पर शिफ्ट हो चुकी हैं। यह वह कोर शहरी उपभोक्ता वर्ग था, जो पहले हर महीने औसतन एक से दो सिलेंडर खाली करता था। इस बड़े उपभोक्ता वर्ग के पाइपलाइन पर शिफ्ट होने से एलपीजी वितरण एजेंसियों के पास रिफिल ऑर्डर में भारी कमी देखने को मिल रही है।
'पीएम सूर्य घर' और इंडक्शन क्रांति: मुफ्त बिजली से रसोई में सिलेंडर की छुट्टी
एलपीजी सिलेंडर के तिलिस्म को तोड़ने वाला दूसरा सबसे बड़ा गेमचेंजर केंद्र सरकार की 'पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना' साबित हो रही है। इस योजना के तहत केंद्र सरकार देश भर के एक करोड़ घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाने के लिए ₹78,000 तक की भारी सब्सिडी मुहैया करा रही है, जिससे हर परिवार को हर महीने 300 यूनिट तक बिल्कुल मुफ्त बिजली मिल रही है।
मुफ्त बिजली मिलने के बाद मध्यम और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों के उपभोग व्यवहार में क्रांतिकारी बदलाव आया है। जिन घरों में पहले हर महीने ₹800 से ₹900 का गैस सिलेंडर खरीदना एक अनिवार्य मासिक खर्च था, वहां अब महिलाओं ने आधुनिक इंडक्शन चूल्हों (Induction Cooktops) का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया है। चाय, दूध उबालने, दाल-चावल पकाने और सब्जी बनाने जैसे दैनिक कामों के लिए जब बिजली पूरी तरह मुफ्त मिल रही है, तो परिवार गैस का इस्तेमाल केवल रोटियां सेकने तक सीमित कर रहे हैं। इससे जिस घर में सिलेंडर 25 से 30 दिनों में खत्म हो जाता था, अब वही सिलेंडर 60 से 70 दिनों तक चल रहा है। इस 'रिफिल साइकिल' के दोगुना हो जाने का सीधा असर कुल खपत में भारी गिरावट के रूप में सामने आया है।
उज्ज्वला योजना और ग्रामीण भारत का पेच: रिफिल का आर्थिक गणित
खपत में आई गिरावट की एक अन्य अहम कड़ी देश के ग्रामीण इलाकों और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के 10 करोड़ से अधिक लाभार्थियों से भी जुड़ी हुई है। सरकार द्वारा उज्ज्वला कनेक्शनों पर ₹300 प्रति सिलेंडर की सब्सिडी दिए जाने के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में कई आर्थिक रूप से कमजोर परिवार साल भर में औसतन केवल 3 से 4 सिलेंडर ही रिफिल करा पाते हैं।
ग्रामीण इलाकों में जब फसल कटाई का सीजन खत्म होता है या स्थानीय स्तर पर कृषि अवशेष (जैसे लकड़ी, उपले और पराली) मुफ्त और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं, तो कई परिवार महंगे सिलेंडर के बजाय दोबारा पारंपरिक चूल्हों की ओर लौट जाते हैं। मुद्रास्फीति और ग्रामीण आय के दबाव के कारण कई परिवारों के लिए एकमुश्त ₹500 से ₹600 की नकद रकम जुटाकर सिलेंडर भरवाना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। सरकार के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह ग्रामीण भारत में रिफिल दर को स्थिर रखने के लिए केवल सब्सिडी पर निर्भर रहने के बजाय छोटे और अधिक किफायती विकल्पों पर काम करे।
सरकार का नया मास्टरप्लान: कंपोजिट 'स्मार्ट' सिलेंडर और डीबीटी 2.0 की तैयारी
एलपीजी की गिरती खपत और उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकताओं को देखते हुए केंद्र सरकार और सरकारी तेल कंपनियां (इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम) अब पारंपरिक लाल लोहे के सिलेंडर के ढांचे को पूरी तरह बदलने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं:
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कंपोजिट 'स्मार्ट' सिलेंडरों का विस्तार: पुराने 14.2 किलो के भारी लोहे के सिलेंडरों की जगह अब हल्के, जंग-रहित और पारदर्शी (ब्लॉ-मोल्डेड फाइबरग्लास) कंपोजिट सिलेंडरों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन सिलेंडरों में उपभोक्ता बाहर से ही देख सकता है कि कितनी गैस बची है, जिससे गैस चोरी की गुंजाइश खत्म हो जाती है।
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5 किलो और 2 किलो के 'मिनी सिलेंडर' (छोटू): कम आय वाले परिवारों, प्रवासी मजदूरों और छात्रों के लिए 2 किलो और 5 किलो के छोटे रीफिल पैक को हर राशन की दुकान और पेट्रोल पंप पर आसानी से उपलब्ध कराने का प्लान है, ताकि लोगों को एक साथ बड़ी रकम खर्च न करनी पड़े।
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इंडोर सोलर कुकटॉप 'सूर्य नूतन': इंडियन ऑयल द्वारा विकसित 'सूर्य नूतन' जैसे रिचार्जेबल सोलर कुकटॉप्स को व्यापक पैमाने पर बाजार में उतारने की तैयारी है, जो सीधे सौर ऊर्जा से चलते हैं और रात में भी बिना बिजली या गैस के खाना पकाने की सुविधा देते हैं।
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सब्सिडी का लक्षित पुनर्गठन (DBT 2.0): सरकार अब सब्सिडी को केवल उन अति-वंचित परिवारों तक सीमित करने पर विचार कर रही है जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है, जबकि संपन्न शहरी वर्ग को पूरी तरह पीएनजी और बिजली की ओर मोड़ने की नीति बनाई जा रही है।
विदेशी आयात पर 40 हजार करोड़ की बचत: क्या इतिहास बन जाएगा लाल सिलेंडर?
ऊर्जा अर्थशास्त्रियों के नजरिए से देखा जाए तो एलपीजी की घरेलू खपत में यह 16 फीसदी की गिरावट देश की मैक्रो-इकोनॉमी के लिए एक वरदान जैसी है। भारत अपनी कुल एलपीजी मांग का लगभग 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे खाड़ी देशों से भारी विदेशी मुद्रा (डॉलर) खर्च करके आयात करता है।
वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उतार-चढ़ाव के कारण भारत का एलपीजी आयात बिल सालाना 40,000 करोड़ रुपये से अधिक बैठता है। यदि घरेलू स्तर पर पीएनजी, रूफटॉप सोलर और इंडक्शन कुकिंग के जरिए एलपीजी की खपत में 15 से 20 प्रतिशत की स्थायी कटौती हो जाती है, तो देश को हर साल अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा की बचत होगी। यह बचत सीधे तौर पर देश के चालू खाता घाटे (CAD) को कम करेगी और रुपये को मजबूती देगी।
हालांकि, इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि लाल गैस सिलेंडर कल से गायब हो जाएगा। भारत के विशाल भूभाग, दूरदराज के पहाड़ी इलाकों, द्वीपों और घनी बस्तियों में जहां पाइपलाइन बिछाना भौगोलिक रूप से बेहद मुश्किल और खर्चीला है, वहां एलपीजी सिलेंडर अगले कई दशकों तक जीवनरेखा बना रहेगा। लेकिन यह तय हो चुका है कि आने वाले समय में रसोई का 'एकछत्र राजा' कोई एक ईंधन नहीं होगा, बल्कि पीएनजी, सोलर पावर, इंडक्शन और स्मार्ट एलपीजी मिलकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिखेंगे।