नवरात्रि नौ दिन की, फिर दो दिन सप्तमी और एक ही दिन अष्टमी-नवमी क्यों? जानिए तिथियों का गणित और सही तारीखें

नवरात्रि नौ दिन की, फिर दो दिन सप्तमी और एक ही दिन अष्टमी-नवमी क्यों? जानिए तिथियों का गणित और सही तारीखें

शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर अक्सर श्रद्धालुओं के सामने यह असमंजस खड़ा हो जाता है कि जब नवरात्रि पूरे 'नौ दिनों' और नौ रात्रियों का पर्व है, तो पंचांग में कभी कोई तिथि दो दिन तक खिंच जाती है और कभी दो महत्वपूर्ण तिथियां एक ही दिन में सिमट जाती हैं। कई बार ऐसी स्थिति बनती है जब सप्तमी तिथि लगातार दो दिन मनाई जाती है, जबकि महाअष्टमी और महानवमी का पूजन एक ही दिन संपन्न कर लिया जाता है। आम लोगों के लिए यह स्थिति भ्रम पैदा करती है कि उपवास किस दिन रखें और कन्या पूजन (कंजक) किस तारीख को करें। वैदिक ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार, यह कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि सूर्योदय कालीन 'उदयातिथि' और चंद्रमा की गति पर आधारित तिथियों के क्षय व वृद्धि का विशुद्ध खगोलीय गणित है।

उदयातिथि का नियम और 'तिथि वृद्धि': कैसे दो दिन पड़ती है सप्तमी?

हिंदू पंचांग में किसी भी धार्मिक पर्व और उपवास का निर्धारण सूर्योदय के समय मौजूद तिथि यानी 'उदयातिथि' के आधार पर किया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर की तरह हिंदू तिथियां रात 12 बजे नहीं बदलतीं, बल्कि सूर्य और चंद्रमा के बीच के कोणीय अंतर (12 डिग्री) से तय होती हैं। जब कोई तिथि एक सूर्योदय के समय मौजूद होती है और अगले दिन के सूर्योदय के समय भी कुछ पलों या घंटों के लिए विद्यमान रहती है, तो ज्योतिष शास्त्र में उसे 'वृद्धि तिथि' कहा जाता है। उदाहरण के लिए, जब आश्विन शुक्ल सप्तमी तिथि पहले दिन दोपहर में शुरू होकर अगले दिन के सूर्योदय को पार कर दोपहर तक रहती है, तो दोनों ही दिन सप्तमी का प्रभाव माना जाता है। पहले दिन जहां तंत्र साधना, कालरात्रि आह्वान और निशा पूजा की जाती है, वहीं अगले दिन उदयातिथि के मान से सप्तमी का व्रत और दर्शन-पूजन जारी रहता है।

'तिथि क्षय' का सिद्धांत: एक ही दिन अष्टमी और नवमी का महासंयोग

इसके ठीक उलट स्थिति तब बनती है जब किसी तिथि का 'क्षय' (समाप्ति) हो जाता है। यदि कोई तिथि एक सूर्योदय के बाद शुरू होती है और अगले सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाती है—अर्थात वह किसी भी सूर्योदय को स्पर्श नहीं कर पाती—तो पंचांग में उस तिथि का क्षय माना जाता है। जब अष्टमी तिथि सुबह या दोपहर में समाप्त हो जाती है और उसी दिन नवमी तिथि का प्रारंभ हो जाता है, जो अगले दिन सुबह तक ही सीमित रहती है, तो अष्टमी और नवमी एक ही दिन आ जाती हैं। ऐसी स्थिति में पहले पहर में मां महागौरी की आराधना और संधि पूजा संपन्न होती है, जबकि दोपहर बाद या सायंकाल मां सिद्धिदात्री की उपासना और नवमी हवन का मुहूर्त शुरू हो जाता है।

कन्या पूजन और व्रत पारण को लेकर न रहें भ्रमित

अष्टमी और नवमी के एक ही दिन पड़ने पर व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं में कन्या पूजन (कंजक खिलाने) को लेकर सबसे ज्यादा संशय रहता है। धर्मग्रंथ 'निर्णय सिंधु' और 'धर्मसिंधु' के अनुसार, यदि अष्टमी और नवमी एक ही दिन मिल रही हों, तो मध्याह्न व्यापिनी नवमी के समय या अष्टमी के समाप्त होते ही संधिकाल में कन्या पूजन करना शास्त्रसम्मत माना जाता है। जो लोग अष्टमी व्रत का पालन करते हैं, वे सुबह के समय महागौरी पूजन कर 9 कन्याओं और एक लंगूर को भोजन कराते हैं। वहीं जो साधक पूरे नौ दिनों का अखंड व्रत रखते हैं, वे नवमी तिथि के हवन और कन्या पूजन के पश्चात दशमी तिथि के सूर्योदय पर विधिवत पारण करते हैं।

तिथियों के फेर के बावजूद नौ रात्रियों की साधना रहती है अखंड

शास्त्रों में इस महापर्व को 'नवरात्र' कहा गया है, न कि 'नवदिन'। इसका अर्थ है कि इसमें नौ विशिष्ट रात्रियों का महत्व सर्वोपरि है। भले ही सौर दिवसों की गणना में तिथियों के घटने-बढ़ने से दिन 8 या 10 प्रतीत हों, लेकिन आश्विन शुक्ल प्रतिपदा की पहली रात से लेकर नवमी की अंतिम रात तक नौ सिद्ध रात्रियां पूरी तरह सक्रिय रहती हैं। यही कारण है कि देवी के नौ स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की रात्रिकालीन उपासना का क्रम कभी खंडित नहीं होता। पंचांग के इस गणित को समझकर श्रद्धालु बिना किसी संशय के अपनी साधना और कुल-परंपरा के अनुसार व्रत व पूजन संपन्न कर सकते हैं।