सर्वपितृ अमावस्या पर करें अचूक उपाय: तृप्त होंगे पितर, घर में बरसेगी भगवान श्रीहरि की असीम कृपा
आश्विन कृष्ण पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या पितृपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम दिन होती है। इस पावन तिथि पर सभी ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य करने का विधान है ताकि उनकी आत्मा को शांति और तृप्ति मिले। सनातन धर्म में जहां एक ओर भगवान श्रीहरि विष्णु को पितरों का उद्धारक और मोक्षदाता माना गया है, वहीं दूसरी ओर माता तुलसी को भगवान विष्णु की परम प्रिय और वैकुंठ का द्वार खोलने वाली दिव्य शक्ति माना जाता है। गरुड़ पुराण और पद्म पुराण के अनुसार, जिस घर में तुलसी के माध्यम से भगवान विष्णु की आराधना की जाती है और श्राद्ध कर्म में तुलसी का सही उपयोग होता है, वहां के पितर तृप्त होकर अपने वंशजों को सुख, समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। यदि आप भी सर्वपितृ अमावस्या पर पितृ दोष से मुक्ति और श्रीहरि का आशीर्वाद पाना चाहते हैं, तो तुलसी जी से जुड़े ये शास्त्रीय उपाय जरूर करें।
सर्वपितृ अमावस्या पर तुलसी के पौधे के पास करें यह खास उपाय
सर्वपितृ अमावस्या की शाम को प्रदोष काल के समय तुलसी जी के पास किया जाने वाला दीपदान पितरों के मार्ग को आलोकित करने वाला माना गया है।
शाम के समय सूर्यास्त के बाद गाय के शुद्ध घी या तिल के तेल का एक दीपक तैयार करें। इस दीपक में कलावे (मौली) की बाती लगाएं। अब तुलसी के क्यारे के पास इस दीपक को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके प्रज्वलित करें। दीपक जलाते समय मन ही मन 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का 11 बार जप करें और अपने पितरों की आत्मा की शांति और सद्गति के लिए प्रार्थना करें। शास्त्रों के अनुसार, तुलसी के समीप किया गया यह दीपदान पितृलोक तक प्रकाश पहुंचाता है, जिससे पितर प्रसन्न होकर तृप्ति का अनुभव करते हैं और अपने कुल को आशीर्वाद देकर विदा होते हैं।
श्राद्ध और भोग में तुलसी दल का महत्व: बिना तुलसी अधूरा रहता है तर्पण
पितृपक्ष में पितरों के निमित्त बनाए जाने वाले भोजन और भगवान विष्णु को अर्पित किए जाने वाले भोग में तुलसी दल (पत्ते) का होना अनिवार्य माना गया है।
मान्यता है कि जब तक भोजन में तुलसी का पत्ता न रखा जाए, तब तक भगवान विष्णु और पितर उस भोग को स्वीकार नहीं करते। सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों के लिए निकाले जाने वाले पंचबलि भोजन (गाय, कौवे, कुत्ते, चींटी और देव) में तुलसी दल अवश्य रखें। इसके अलावा, पितरों को जल तर्पण देते समय भी जल के पात्र में तुलसी का एक पत्ता जरूर डालना चाहिए। तुलसी की गंध और पवित्रता से यमदूत दूर रहते हैं और जीवात्मा को सीधे श्रीहरि के चरणों में स्थान प्राप्त होता है।
तुलसी जी से उपाय करते समय इन जरूरी नियमों का रखें ध्यान
सर्वपितृ अमावस्या तिथि पर तुलसी की पूजा करते समय कुछ शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करना अत्यंत आवश्यक है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो:
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अमावस्या के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें: शास्त्रों के अनुसार अमावस्या, रविवार और एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित माना गया है। इसलिए श्राद्ध या भोग के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले (चतुर्दशी को) ही तोड़कर रख लें, अथवा जो पत्ते अपने आप टूटकर नीचे गिर गए हों, उन्हें धोकर प्रयोग में लाएं।
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तुलसी की जड़ में सीधे श्राद्ध का जल न चढ़ाएं: पितरों के तर्पण का जल कभी भी सीधे तुलसी के गमले में नहीं डालना चाहिए। तर्पण हमेशा अलग पात्र में करें और तुलसी जी को केवल शुद्ध जल व गंगाजल ही अर्पित करें।
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तुलसी के पास स्वच्छता रखें: तुलसी के पौधे के आसपास की जगह बिल्कुल साफ-सुथरी होनी चाहिए। वहां कोई जूठा बर्तन, चप्पल या कचरा न रहने दें।
पितृ दोष से मुक्ति और घर में सुख-समृद्धि का आगमन
यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष के कारण विवाह में अड़चनें, संतान प्राप्ति में रुकावट, लगातार बीमारी या आर्थिक तंगी बनी रहती है, तो सर्वपितृ अमावस्या पर तुलसी जी की सेवा अत्यंत चमत्कारी प्रभाव दिखाती है।
तुलसी जी की 11 बार परिक्रमा करते हुए अपनी भूलों की क्षमा याचना करें। इसके बाद तुलसी के गमले की थोड़ी सी मिट्टी लेकर अपने माथे पर तिलक के रूप में लगाएं। ऐसा करने से नकारात्मक ऊर्जा और पितृ दोष की पीड़ा का शमन होता है, घर का वातावरण शांत होता है और परिवार में धन-धान्य की वृद्धि होती है। श्रद्धा और विधिपूर्वक किया गया यह उपाय पितरों को मोक्ष दिलाकर जीवन में खुशहाली लाता है।