जितिया व्रत में क्यों रखा जाता है 24 घंटे का निर्जला उपवास? जानें इस कठिन तपस्या के पीछे की पौराणिक कथा
सनातन संस्कृति में संतान के सुखी जीवन, दीर्घायु और आरोग्य की कामना के लिए रखे जाने वाले व्रतों में जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत को सबसे कठिन और कठोर तपस्या माना गया है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह उपवास केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संतान के प्रति एक मां के अटूट प्रेम, त्याग और आध्यात्मिक समर्पण का सबसे बड़ा प्रतीक है। इस व्रत की सबसे खास और विस्मयकारी बात यह है कि इसमें माताएं पूरे 24 घंटे से भी अधिक समय तक अन्न की एक बूंद और जल का एक घूंट ग्रहण किए बिना निर्जला उपवास रखती हैं। महिलाएं नहाय-खाय से इस व्रत की शुरुआत करती हैं और तीसरे दिन पारण के साथ इसका समापन होता है। लेकिन मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर संतान की रक्षा के लिए इतना कठोर निर्जला व्रत ही क्यों रखा जाता है और इसके पीछे क्या धार्मिक व आध्यात्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं।
जितिया व्रत का महत्व: संतान की रक्षा के लिए माताओं का अखंड संकल्प
जितिया व्रत मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो माताएं इस पावन व्रत को पूरे विधि-विधान और निष्ठा के साथ रखती हैं, उनकी संतान पर आने वाले बड़े से बड़े संकट टल जाते हैं। यह व्रत संतान को अकाल मृत्यु के भय से मुक्त करता है और उन्हें दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सफलता प्रदान करता है। व्रत के नियमों का पालन अत्यंत सूक्ष्मता से किया जाता है। सप्तमी के दिन 'ओठगन' या नहाय-खाय के बाद अष्टमी तिथि के पूरे दिन और रात भर निर्जला रहकर नवमी तिथि को सूर्योदय के बाद ही अन्न-जल ग्रहण किया जाता है। भूख और प्यास पर विजय पाकर की जाने वाली यह तपस्या संतान के जीवन में रक्षा कवच का काम करती है।
आखिर क्यों रखा जाता है निर्जला उपवास: त्याग और तप की पराकाष्ठा
शास्त्रों में निर्जला व्रत को तपस्या का उच्चतम स्वरूप माना गया है। जितिया में पानी तक न पीने की परंपरा के पीछे गहरा आध्यात्मिक दर्शन छिपा हुआ है। मान्यता है कि जब कोई मां अपनी संतान के जीवन पर आए संकट को टालने के लिए स्वयं असह्य शारीरिक कष्ट, भूख और प्यास को सहती है, तो उस असीम त्याग से एक शक्तिशाली सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह तपस्या ब्रह्मांडीय शक्तियों और कुलदेवी-देवताओं को प्रसन्न करती है। जीमूतवाहन भगवान की कृपा से संतान को जीवनदान मिलता है। यह कठोर साधना इस बात का प्रमाण है कि एक मां अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जाकर अपनी सुख-सुविधाओं का परित्याग कर सकती है।
गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन की अमर कथा: परोपकार और जीवनदान की मिसाल
जीवित्पुत्रिका व्रत का सीधा संबंध गंधर्वों के धर्मात्मा राजा जीमूतवाहन से है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जीमूतवाहन बड़े ही दयालु, त्यागी और परोपकारी स्वभाव के थे। वे अपना राजपाट अपने भाइयों को सौंपकर वन में अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करने चले गए। वन में भ्रमण करते हुए एक दिन उन्होंने एक वृद्ध स्त्री को जोर-जोर से विलाप करते हुए देखा। जब जीमूतवाहन ने उस वृद्धा से उसके दुख का कारण पूछा, तो उसने बताया कि वह नागवंश की स्त्री है और उसका नाम शंखचूड़ की माता है। उसने बताया कि नागों और पक्षीराज गरुड़ के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत हर दिन एक नाग को गरुड़ के आहार के लिए वध्यशिला पर भेजा जाता है। आज उसके इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी है।
वृद्धा का करुण क्रंदन देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने उस मां को वचन दिया कि वे उसके पुत्र के प्राणों की रक्षा करेंगे और उसकी जगह स्वयं गरुड़ का आहार बनेंगे। तय समय पर जीमूतवाहन लाल कपड़े में लिपटकर वध्यशिला पर लेट गए। गरुड़ आए और उन्हें अपने पंजों में दबाकर पहाड़ की चोटी पर ले जाकर नोंचने लगे। लेकिन गरुड़ ने देखा कि उनके शिकार की आंखों में कोई भय या आंसू नहीं थे, बल्कि उसके चेहरे पर एक अलौकिक शांति और संतोष था।
गरुड़ ने चकित होकर उनका परिचय पूछा। तब जीमूतवाहन ने पूरी सच्चाई बताई। जीमूतवाहन के इस अप्रतिम त्याग, परोपकार और साहस से पक्षीराज गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने न केवल जीमूतवाहन को जीवनदान दिया, बल्कि यह प्रतिज्ञा भी की कि वे भविष्य में कभी किसी नाग का शिकार नहीं करेंगे। जीमूतवाहन के इस पुण्य कर्म के कारण ही उन्हें 'जीवित्पुत्रिका' का रक्षक माना गया और तभी से संतान की लंबी उम्र के लिए राजा जीमूतवाहन की कुशा की प्रतिमा बनाकर पूजा करने की परंपरा शुरू हुई।
महाभारत काल से जुड़ा रहस्य: उत्तरा के गर्भ की रक्षा और श्रीकृष्ण का वरदान
जीवित्पुत्रिका व्रत की एक अन्य अत्यंत प्रसिद्ध कथा महाभारत के युद्ध से जुड़ी हुई है। महाभारत युद्ध के अंतिम चरण में अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु से क्रोधित होकर अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को समूल नष्ट करने का प्रतिज्ञा ली। उसने आधी रात को पांडवों के शिविर पर हमला कर द्रोपदी के पांचों पुत्रों का वध कर दिया। इसके बाद भी जब उसका प्रतिशोध शांत नहीं हुआ, तो उसने अभिमन्यु की गर्भवती पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु को मारने के लिए 'ब्रह्मास्त्र' चला दिया।
अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र अचूक था और उसने उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु को गर्भ में ही नष्ट कर दिया। इस घोर अधर्म को देखकर भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने अपने समस्त पुण्यों और सुदर्शन चक्र की शक्ति को एकत्रित कर उत्तरा के मृत गर्भ को पुनः जीवित कर दिया। गर्भ में दोबारा जीवन पाने के कारण उस बालक का नाम 'जीवित्पुत्रिका' और आगे चलकर राजा 'परीक्षित' पड़ा। भगवान श्रीकृष्ण ने उस समय वरदान दिया कि आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन जो भी माताएं निर्जला रहकर व्रत करेंगी और भगवान जीमूतवाहन व श्रीहरि की उपासना करेंगी, उनकी संतान की रक्षा स्वयं सुदर्शन चक्रधारी करेंगे और उनके वंश का कभी नाश नहीं होगा।
चील्ह और सियारिन की लोककथा: व्रत के नियमों की कठोरता का सबक
जितिया व्रत के दौरान चील्ह (चील) और सियारिन (लोमड़ी) की कथा सुनने का विशेष विधान है। नर्मदा नदी के किनारे एक घने जंगल में एक चील और एक सियारिन सहेलियों की तरह रहती थीं। एक बार उन्होंने वन में स्त्रियों को जीवित्पुत्रिका का निर्जला व्रत करते देखा और दोनों ने मिलकर यह व्रत रखने का संकल्प लिया। अष्टमी के दिन दोनों निर्जला उपवास पर थीं। लेकिन रात होते ही सियारिन को बहुत तेज भूख लग गई। जंगल में जलती हुई चिता का मांस देखकर सियारिन अपनी भूख पर काबू न रख सकी और उसने चुपके से मांस और हड्डियां खाकर अपना व्रत तोड़ लिया।
दूसरी ओर, चील ने तमाम कष्टों और भूख-प्यास के बावजूद पूरी निष्ठा और धैर्य के साथ अपना निर्जला व्रत पूरा किया और अगले दिन पारण किया। परिणाम यह हुआ कि अगले जन्म में दोनों ने मनुष्य रूप में जन्म लिया और दोनों बहनें बनीं। चील की निष्ठा के कारण उसके सभी पुत्र स्वस्थ, दीर्घायु और राज्य के उच्च पदों पर आसीन हुए, जबकि सियारिन के व्रत भंग करने के पाप के कारण उसके सभी बच्चे जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे। यह कथा संदेश देती है कि जितिया के पावन व्रत में नियमों का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए और पूरी निष्ठा के साथ भूख-प्यास पर संयम रखना चाहिए।
जितिया व्रत की पूजा विधि और पारण के नियम
जितिया व्रत के दिन प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर माताएं स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और पूरे दिन निर्जला रहने का संकल्प लेती हैं। पूजा स्थल पर मिट्टी या गोबर से लीपकर छोटा तालाब बनाया जाता है। उसके किनारे पाकड़ की डाल लगाई जाती है और कुशा से राजा जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित की जाती है। साथ ही मिट्टी से चील्ह और सियारिन की आकृतियां बनाई जाती हैं। पूजा में सरसों का तेल, खली, नोनी का साग, मरुवा की रोटी और मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं। स्त्रियां समूह में बैठकर जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनती हैं और जीमूतवाहन भगवान से अपनी संतान के सुदीर्घ जीवन की प्रार्थना करती हैं। नवमी तिथि के सूर्योदय के बाद स्नान और पूजन कर नोनी का साग, मरुवा की रोटी और खीरे से व्रत का पारण किया जाता है।