CJP प्रोटेस्ट में जावेद अख्तर का तीखा प्रहार: बोले- 'कुछ लोग केवल शोर मचाते हैं, काम नहीं'

CJP प्रोटेस्ट में जावेद अख्तर का तीखा प्रहार: बोले- 'कुछ लोग केवल शोर मचाते हैं, काम नहीं'

देश के ज्वलंत सामाजिक और लोकतांत्रिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखने के लिए पहचाने जाने वाले मशहूर लेखक, कवि और गीतकार जावेद अख्तर एक बार फिर अपने तीखे और तंजिया बयानों को लेकर सुर्खियों में हैं। मुंबई में सिटीजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) द्वारा आयोजित एक विरोध प्रदर्शन और जनसभा के दौरान जावेद अख्तर ने समाज के कुछ खास वर्गों, तथाकथित कार्यकर्ताओं और सोशल मीडिया पर एक्टिव रहने वाले लोगों पर जमकर निशाना साधा। मंच संभालते ही उन्होंने किसी लाग-लपेट के बिना सीधे शब्दों में कहा कि कुछ लोग केवल शोर-शराबे की राजनीति और खोखले नारों तक सीमित रह जाते हैं, जबकि वास्तविक बदलाव जमीन पर पसीना बहाने से आता है। उनके इस दो-टूक बयान ने प्रदर्शन में मौजूद भीड़ के साथ-साथ इंटरनेट जगत में भी एक नई बहस छेड़ दी है।

जावेद अख्तर का तीखा तंज: 'कुछ लोग सिर्फ शोर-शराबे में यकीन रखते हैं'

मंच से जनसभा को संबोधित करते हुए जावेद अख्तर ने व्यवस्था पर सवाल उठाने के साथ-साथ उन लोगों को भी आड़े हाथों लिया जो केवल विरोध के नाम पर माहौल गर्म करते हैं लेकिन नतीजे शून्य देते हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आज के दौर में कुछ लोगों की आदत बन चुकी है कि वे हर मसले पर केवल चिल्लाना और शोर मचाना जानते हैं। उनका मकसद किसी समस्या का ठोस समाधान निकालना या पीड़ित को न्याय दिलाना नहीं होता, बल्कि सिर्फ यह दिखाना होता है कि वे कितने बड़े क्रांतिकारी हैं। अख्तर ने कहा कि नारों और शोर की गूंज से कभी लोकतंत्र मजबूत नहीं होता, बल्कि समझदारी, कानून के दायरे में रहकर लड़ी जाने वाली लड़ाई और जमीनी स्तर पर खड़े रहने से ही समाज में सकारात्मक बदलाव संभव है।

किन लोगों पर था जावेद अख्तर का सीधा निशाना?

जावेद अख्तर का यह कटाक्ष मुख्य रूप से दो तरह के लोगों की तरफ केंद्रित था:

  • आर्मचेयर एक्टिविस्ट्स (Armchair Activists): वे लोग जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर या सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े भाषण और स्टेटस लिखकर खुद को समाज सुधारक मान लेते हैं, लेकिन जब धूप और सड़कों पर उतरकर किसी गरीब या मजलूम के लिए संघर्ष करने की बात आती है, तो वे नदारद हो जाते हैं।

  • कट्टरपंथी और उग्र सोच वाले तत्व: वे गुट जो किसी भी जायज और लोकतांत्रिक विरोध को केवल अपनी उग्र बयानबाजी और हंगामे की भेंट चढ़ा देते हैं, जिससे असली आंदोलन की गरिमा और प्रभाव दोनों कमजोर पड़ जाते हैं।

अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी और संवैधानिक लड़ाई जरूरी

जावेद अख्तर ने सीजेपी (CJP) जैसे नागरिक मंचों के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि यदि किसी को अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करनी है, तो उसे कानूनी बारीकियों, अदालती प्रक्रियाओं और संविधान के मूल्यों को हथियार बनाना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक आपके पास ठोस तथ्य, कानूनी समझ और धैर्य नहीं होगा, तब तक आप किसी भी अन्याय का मुकाबला नहीं कर सकते। सिर्फ माइक पकड़कर चिल्लाने से अदालतें या कानून नहीं बदलते। समाज को दिशा देने के लिए शोर नहीं, बल्कि स्पष्ट सोच और निरंतर प्रयास की दरकार होती है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक समाज की जिम्मेदारी

अपने संबोधन में उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति दर्ज कराने का अधिकार सबसे पवित्र है, लेकिन इस अधिकार का उपयोग जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए। जब विरोध व्यक्तिगत स्वार्थ या केवल सुर्खियां बटोरने का जरिया बन जाता है, तो जनता का उस आंदोलन से भरोसा उठ जाता है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे भावनाओं के बहाव में आकर किसी भी अतिवादी नैरेटिव का शिकार न बनें, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए लोकतांत्रिक अधिकारों का तार्किक और शांतिपूर्ण ढंग से इस्तेमाल करें।

सोशल मीडिया पर बंटी राय: कुछ ने की तारीफ, कुछ ने उठाए सवाल

जावेद अख्तर के इस बेबाक भाषण की वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर आते ही तेजी से वायरल हो गई। बुद्धिजीवियों और आम यूजर्स के एक बड़े तबके ने उनके इस व्यावहारिक नजरिए की सराहना की। लोगों का कहना है कि उन्होंने उस कड़वी हकीकत को उजागर किया है जिसे अक्सर आंदोलनकारी नजरअंदाज कर देते हैं। वहीं, कुछ आलोचकों का मानना था कि विरोध प्रदर्शनों में जनता का आक्रोश और आवाज स्वाभाविक रूप से मुखर होती है और उसे केवल 'शोर-शराबा' कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। बहरहाल, जावेद अख्तर के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी मंच पर हों, अपनी बात बिना किसी डर या पक्षपात के पूरी मजबूती से रखने से कभी पीछे नहीं हटते।