मायावती और सतीश चंद्र मिश्रा की ट्रेनिंग के बाद भी नहीं 'पके' आकाश आनंद

मायावती और सतीश चंद्र मिश्रा की ट्रेनिंग के बाद भी नहीं 'पके' आकाश आनंद

बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक कांशीराम ने कभी एक मजबूत कैडर और समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी करके उत्तर प्रदेश की सत्ता पर चार बार पार्टी का परचम लहराया था। लेकिन आज वही बसपा अपने सबसे गंभीर राजनीतिक व संगठनात्मक अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। इस संकट के केंद्र में हैं पार्टी सुप्रीमो मायावती के भतीजे आकाश आनंद, जिन्हें पार्टी का भविष्य और मायावती का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानकर मैदान में उतारा गया था।

लंदन से एमबीए की डिग्री लेकर भारतीय राजनीति की जटिल पिच पर उतरे आकाश आनंद को खुद मायावती और पार्टी के कद्दावर रणनीतिकार सतीश चंद्र मिश्रा ने सालों तक सियासी दांव-पेंच और भाषण कला की ट्रेनिंग दी। बावजूद इसके, पिछले एक दशक (2016 से 2026) के राजनीतिक सफर में आकाश आनंद न तो पार्टी कैडर में अपनी निर्विवाद स्वीकार्यता बना पाए और न ही मायावती के सख्त अनुशासन के सांचे में खुद को स्थायी रूप से ढाल सके। नतीजा यह रहा कि वे तीन बार बसपा में 'नंबर 2' का रुतबा पाकर भी उसे गंवा बैठे।

पहली एंट्री और शुरुआती झटका (2016-2019): साये की तरह चले, पर नहीं जमा पाए सिक्का

आकाश आनंद की राजनीति में पहली झलक वर्ष 2016 में लखनऊ के कांशीराम स्मारक स्थल पर आयोजित एक रैली में दिखी थी, जहां वे मायावती के बगल में खड़े नजर आए। इसके बाद 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ हुए गठबंधन के दौरान उन्हें सक्रिय किया गया।

  • मिश्रा और मायावती की संयुक्त पाठशाला: मायावती ने आकाश को जमीनी संगठन और कानूनी-प्रशासनिक पहलुओं की बारीकियां सिखाने के लिए पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के साथ अटैच किया। सतीश मिश्रा उन्हें चुनावी सभाओं, नामांकन प्रक्रियाओं और प्रेस ब्रीफिंग में साथ लेकर चलते थे।

  • 2019 में बने नेशनल कोऑर्डिनेटर: 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद मायावती ने परिवारवाद के अपने पुराने सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए भतीजे आकाश आनंद और अपने भाई आनंद कुमार को पार्टी का 'नेशनल कोऑर्डिनेटर' बनाकर संगठन में नंबर 2 की अनौपचारिक हैसियत दे दी।

  • पहला बैकफुट: हालांकि, राज्यों के विधानसभा चुनावों (जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना) में कमान संभालने के बावजूद जब पार्टी का प्रदर्शन लगातार गिरता गया, तो उनके फैसलों पर सवाल उठे। संगठन में पुराने निष्ठावान नेताओं को दरकिनार करने की शिकायतों के बाद उनकी शक्तियों को पहली बार सीमित कर दिया गया।

लोकसभा चुनाव 2024 का ड्रामा: आक्रामक भाषण से सीतापुर में फंसे, मायावती ने छीनी कुर्सी

आकाश आनंद के राजनीतिक जीवन का सबसे नाटकीय मोड़ दिसंबर 2023 में आया, जब लखनऊ में पार्टी पदाधिकारियों की एक राष्ट्रीय बैठक में मायावती ने सार्वजनिक रूप से उनके सिर पर हाथ रखकर उन्हें अपना 'एकमात्र राजनीतिक उत्तराधिकारी' घोषित किया। इस घोषणा के साथ ही आकाश आनंद आधिकारिक रूप से बसपा के नंबर-2 नेता बन गए।

  • सीतापुर रैली का विवादित भाषण: 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान आकाश आनंद ने एक नया और आक्रामक तेवर अपनाने की कोशिश की। अप्रैल 2024 में सीतापुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला और आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग कर डाला। इसके चलते जिला प्रशासन ने उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 171सी और 188 के तहत नफरती भाषण (Hate Speech) का मुकदमा दर्ज कर लिया।

  • उत्तराधिकारी पद से बर्खास्तगी: आकाश के इस आक्रामक रुख से पूरी पार्टी कानूनी और राजनीतिक पचड़े में फंसती दिखी। मायावती को लगा कि आकाश अभी 'राजनीतिक रूप से पूरी तरह परिपक्व' नहीं हुए हैं। 7 मई 2024 को मायावती ने सोशल मीडिया पर अप्रत्याशित ऐलान करते हुए आकाश आनंद को राष्ट्रीय समन्वयक और अपने उत्तराधिकारी पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया। मायावती का यह फैसला पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ा झटका था।

माफी, वापसी और फिर संगठन से साइडलाइन होने का अंतहीन चक्र

लोकसभा चुनाव 2024 में जब बसपा का खाता भी नहीं खुला और वोट प्रतिशत घटकर 9.39% पर आ गया, तो पार्टी के भीतर यह मांग उठी कि दलित युवाओं को जोड़ने के लिए आकाश आनंद की वापसी जरूरी है।

  • पैर छूकर मांगी माफी, फिर बहाल हुए पद: 23 जून 2024 को लखनऊ की स्टेट एग्जीक्यूटिव बैठक में आकाश आनंद ने सार्वजनिक रूप से बुआ मायावती के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और अपनी गलतियों के लिए खेद जताया। इसके बाद मायावती ने एक बार फिर पिघलते हुए उन्हें नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाया और उत्तराखंड व पंजाब के उपचुनावों की जिम्मेदारी सौंपी।

  • तीसरी बार कुर्सी छिनने की नौबत: लेकिन यह 'कमबैक' भी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाया। उपचुनावों में बसपा की जमानतें जब्त होने और संगठन में पुराने काडर के साथ सामंजस्य न बिठा पाने के कारण पार्टी में असंतोष फिर गहरा गया। मायावती ने हाल के महीनों में संगठन की समीक्षा करते हुए आकाश के दौरों और निर्णयों पर फिर से अंकुश लगा दिया। पार्टी के अहम फैसलों, प्रेस बयानों और हालिया सहारनपुर जैसे संवेदनशील घटनाक्रमों में भी आकाश आनंद कहीं फ्रंटफुट पर नजर नहीं आए, जिससे साफ जाहिर होता है कि वे तीसरी बार भी नंबर-2 की अपनी स्थिति को सुरक्षित नहीं रख सके।

कहां चूक गए आकाश आनंद? विशेषज्ञ विश्लेषण

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आकाश आनंद की विफलता के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण रहे हैं:

  1. जमीनी संघर्ष का अभाव: कांशीराम और खुद मायावती ने साइकिल यात्राओं, चौपालों और पुलिसिया लाठियों के बीच अपना जनाधार तैयार किया था। इसके उलट आकाश आनंद को कॉरपोरेट पृष्ठभूमि से सीधे नंबर दो की कुर्सी पर बैठाया गया, जिससे वे कैडर के मनोविज्ञान को पकड़ने में नाकाम रहे।

  2. सोशल मीडिया बनाम फील्ड पॉलिटिक्स: आकाश आनंद की राजनीति ज्यादातर एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और वातानुकूलित हॉलों की बैठकों तक सीमित रही, जबकि पश्चिमी यूपी और पूर्वांचल के दलित-पिछड़े समाज की मांग एक ऐसे जुझारू नेता की थी जो उनके मुद्दों पर सड़कों पर उतर सके। इसी खाली जगह का फायदा चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी) ने नगीना जीतकर उठाया।

  3. मायावती का सख्त नियंत्रण: बसपा की कार्यप्रणाली में किसी दूसरे नेता को स्वतंत्र निर्णय लेने या अपनी स्वतंत्र लाइन खींचने की छूट कभी नहीं रही। जब भी आकाश ने अपनी नई टीम बनाने या आक्रामक भाषा बोलने की कोशिश की, मायावती के अनुशासन के डंडे ने उन्हें रोक दिया।

बसपा के भविष्य और उत्तराधिकार पर सवालिया निशान

आकाश आनंद के बार-बार डिरेल होने से बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं में भारी असमंजस की स्थिति है। सवाल यह है कि यदि पार्टी सुप्रीमो अपने ही चुने हुए उत्तराधिकारी को 10 साल में तैयार नहीं कर पाईं, तो आने वाले समय में चंद्रशेखर आजाद जैसे आक्रामक दलित युवा नेताओं के उभार के बीच बसपा का वजूद कैसे बचेगा? जब तक आकाश आनंद केवल 'बुआ के भतीजे' के तमगे से बाहर निकलकर सड़कों पर पसीना बहाने वाला नेता नहीं बनते, तब तक नंबर 2 की कुर्सी पर उनकी पकड़ हमेशा रेत की तरह फिसलती रहेगी।

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