भाजपा छोड़ फिर सपा की साइकिल पर सवार हुए पूर्व सांसद राजपाल सैनी; बेटे शिवान को मीरापुर से लड़ाने की चर्चा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सियासी दल-बदल और गोलबंदी का दौर तेज हो गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दिग्गज गैर-यादव ओबीसी (सैनी) चेहरे और पूर्व राज्यसभा सांसद राजपाल सिंह सैनी ने एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बड़ा झटका देते हुए समाजवादी पार्टी (सपा) का दामन थाम लिया है। लखनऊ स्थित सपा प्रदेश मुख्यालय में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन्हें पार्टी की औपचारिक सदस्यता दिलाई। इस मौके पर सपा के वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव और कैराना सांसद इकरा हसन भी मौजूद रहीं। राजपाल सैनी के साथ उनके बेटे शिवान सैनी और कई पूर्व जनप्रतिनिधियों ने 'साइकिल' की सवारी कर ली है। राजनीतिक गलियारों में इस घर वापसी को राजपाल सैनी द्वारा अपने बेटे शिवान सैनी की सियासी जमीन तैयार करने और मुजफ्फरनगर की मीरापुर विधानसभा सीट से उन्हें चुनावी मैदान में उतारने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
5 साल में 3 दलों का सफर: क्यों भाजपा से मोहभंग होकर लौटे सपा में?
पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर जिले के लुहसाना (बुढ़ाना) निवासी राजपाल सैनी उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिनका अपने सजातीय (सैनी/ओबीसी) वोट बैंक पर मजबूत प्रभाव माना जाता है। हालांकि, हाल के वर्षों में उनका सियासी सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है:
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2002 में विधायक और मंत्री: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर उन्होंने मोरना विधानसभा सीट से जीत दर्ज की और तत्कालीन सरकार में मंत्री बने। इसके बाद 2010 में बसपा ने उन्हें राज्यसभा भेजा।
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2022 विधानसभा चुनाव: वे बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए और खतौली सीट से रालोद-सपा गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े, हालांकि उन्हें भाजपा प्रत्याशी से मामूली अंतर से शिकस्त का सामना करना पड़ा।
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2024 में भाजपा में एंट्री: लोकसभा चुनाव 2024 से ठीक पहले वे सपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे।
भाजपा में शामिल होने के बाद राजपाल सैनी को अपेक्षित राजनीतिक हिस्सेदारी और संगठनात्मक तवज्जो नहीं मिल पा रही थी। खुद को हाशिए पर महसूस करते हुए और 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए उन्होंने भाजपा से नाता तोड़कर दोबारा अखिलेश यादव के पाले में लौटने का फैसला किया।
बेटे शिवान सैनी की लॉन्चिंग: क्या मीरापुर से मिलेगा टिकट?
राजपाल सैनी के सपा में आने के साथ ही सबसे ज्यादा चर्चा उनके बेटे शिवान सैनी के राजनीतिक भविष्य को लेकर शुरू हो गई है। शिवान सैनी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा के टिकट पर खतौली सीट से किस्मत आजमाई थी, जहां वे तीसरे स्थान पर रहे थे। अब चर्चा है कि सैनी परिवार खतौली के बजाय मुजफ्फरनगर की मीरापुर विधानसभा सीट पर अपनी दावेदारी मजबूत कर रहा है।
मीरापुर विधानसभा क्षेत्र में सैनी, गुर्जर, मुस्लिम, जाट और दलित मतदाताओं की खासी तादाद है। समाजवादी पार्टी के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के तहत यदि सपा यहां किसी मजबूत ओबीसी चेहरे पर दांव लगाती है, तो स्थानीय जातीय समीकरणों के हिसाब से शिवान सैनी एक प्रमुख दावेदार के तौर पर उभर सकते हैं।
अखिलेश यादव के 'पीडीए' फॉर्मूले को पश्चिमी यूपी में मिली मजबूती
राजपाल सैनी के साथ कई अन्य महत्वपूर्ण स्थानीय नेताओं ने भी सपा की सदस्यता ग्रहण की है, जिनमें यूपी अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व सदस्य सरदार अमृतपाल सिंह, श्यामलाल प्रजापति, जसप्रीत प्रधान रामराज, त्रिलोक सिंह और आजाद समाज पार्टी से जुड़े पूर्व बसपा जिलाध्यक्ष कमल गौतम प्रमुख हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा और रालोद के एनडीए गठबंधन को चुनौती देने के लिए अखिलेश यादव लगातार गैर-यादव पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने में जुटे हैं। सैनी समुदाय पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे में राजपाल सैनी की वापसी से सपा को मुजफ्फरनगर, शामली और सहारनपुर बेल्ट में सैनी वोटरों के बीच पैठ मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
सपा संगठन के सामने टिकट वितरण का पेच
हालांकि, राजपाल सैनी की वापसी जितनी सपा के लिए उत्साहवर्धक है, टिकट वितरण के समय यह पार्टी के लिए उतनी ही बड़ी चुनौती भी बन सकती है। खतौली और मीरापुर दोनों ही सीटों पर समाजवादी पार्टी और उसके संभावित गठबंधन सहयोगियों के कई पुराने और स्थानीय दावेदार पहले से सक्रिय हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व को स्थानीय कार्यकर्ताओं के असंतोष को साधे रखते हुए जातीय संतुलन बैठाना होगा। अब देखना होगा कि अखिलेश यादव 2027 के महासमर में राजपाल सैनी के बेटे शिवान को टिकट का तोहफा देते हैं या संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंपते हैं।