पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर खौफनाक रफ्तार का कहर: एक साल में 76% बढ़े सड़क हादसे
राजधानी लखनऊ को पूर्वी उत्तर प्रदेश के अंतिम छोर गाजीपुर से जोड़ने वाला 340.8 किलोमीटर लंबा 'पूर्वांचल एक्सप्रेसवे' जहां एक ओर सुगम और निर्बाध सफर के लिए प्रदेश की लाइफलाइन बनकर उभरा है, वहीं दूसरी ओर यह खूनी हादसों का नया केंद्र बनता जा रहा है। एक्सप्रेसवे पर बेलगाम रफ्तार, यातायात नियमों की अनदेखी और सुरक्षा मानकों में चूक के चलते दुर्घटनाओं का ग्राफ बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। हालिया यातायात और सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े रोंगटे खड़े करने वाले हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक वर्ष के भीतर पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर होने वाले सड़क हादसों में लगभग 76 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि इन दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों (मृतकों) की संख्या में 137 प्रतिशत का अप्रत्याशित उछाल आया है। सफर का समय 10 से 12 घंटे से घटकर मात्र साढ़े चार से पांच घंटे होने के कारण लोग इसे हाई-स्पीड कॉरिडोर की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन जरा सी लापरवाही सीधे मौत के मुंह में धकेल रही है। आइए विस्तार से जानते हैं कि एक्सप्रेसवे पर हादसों की असल वजहें क्या हैं, कौन से जिले सबसे ज्यादा संवेदनशील बन चुके हैं और उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPEIDA) तथा यातायात पुलिस इससे निपटने के लिए क्या कड़े कदम उठा रही है।
चौंकाने वाले आंकड़े: 76% बढ़े हादसे और 137% बढ़ीं मौतें, जानिए क्या कहती है सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के विभिन्न माइलस्टोन्स और टोल प्लाजा से जुटाए गए आंकड़ों का तुलनात्मक विश्लेषण करने पर पता चलता है कि यह एक्सप्रेसवे देश के सबसे जोखिम भरे हाई-स्पीड कॉरिडोर्स में शुमार होता जा रहा है:
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हादसों की संख्या में 76% का इजाफा: पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले इस साल एक्सप्रेसवे पर दर्ज होने वाली छोटी-बड़ी दुर्घटनाओं की संख्या 76 प्रतिशत से अधिक बढ़ चुकी है। इनमें से अधिकांश दुर्घटनाएं सीधी टक्कर (Head-on Collision), डिवाइडर से टकराने या खड़े वाहनों में पीछे से घुसने के कारण हुई हैं।
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मौतों में 137% का भयावह उछाल: सबसे खौफनाक पहलू यह है कि हादसों के अनुपात में मृत्यु दर (Fatality Rate) दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी है। 137 प्रतिशत मौतों में बढ़ोतरी यह दर्शाती है कि टक्कर इतनी भीषण और उच्च गति (High Impact) पर हो रही है कि एयरबैग और सीट बेल्ट के बावजूद वाहन सवारों को बचने का मौका तक नहीं मिल पा रहा है।
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गंभीर रूप से घायलों का आंकड़ा: दुर्घटनाओं में अपंग होने और गंभीर रूप से चोटिल होने वाले यात्रियों की संख्या में भी 80 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे राज्य के ट्रामा सेंटर्स और अस्पतालों पर भारी दबाव बना हुआ है।
एक्सप्रेसवे पर क्यों हो रहे हैं इतने जानलेवा हादसे? 5 प्रमुख कारण बने यात्रियों का काल
सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों, ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स और फॉरेंसिक क्रैश इंवेस्टिगेशन टीमों द्वारा किए गए अध्ययनों में पांच मुख्य कारण सामने आए हैं जो इन जानलेवा हादसों की असली वजह बने हुए हैं:
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ओवरस्पीडिंग (निर्धारित गति सीमा का उल्लंघन): पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर कारों के लिए अधिकतम गति सीमा 100 किमी/घंटा और भारी वाहनों के लिए 80 किमी/घंटा निर्धारित है। लेकिन चौड़ी, समतल और खाली सड़क देखकर कई चालक अपनी गाड़ियों को 130 से 160 किमी/घंटा की रफ्तार पर दौड़ाते हैं। इस गति पर अचानक कोई अवरोध आने पर ब्रेक लगाना नामुमकिन हो जाता है।
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हाइवे हिप्नोसिस और नींद की झपकी (Microsleep): 340 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेसवे लगभग बिल्कुल सीधा और बिना किसी मोड़ वाला है। लगातार एक जैसी सपाट सड़क और इंजन की एकरस आवाज के कारण चालक 'हाइवे हिप्नोसिस' की अवस्था में चले जाते हैं, जहां आंखें खुली रहने पर भी दिमाग सुन्न हो जाता है। विशेष रूप से रात 2 बजे से सुबह 5 बजे के बीच लगने वाली 2 से 3 सेकंड की झपकी सैकड़ों जिंदगियों को लील चुकी है।
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अत्यधिक गर्मी और घर्षण से टायर फटना (Tyre Burst): हाई-स्पीड ड्राइविंग के दौरान कंक्रीट और तारकोल की सड़क पर घर्षण से टायर का तापमान और वायु दाब (Air Pressure) तेजी से बढ़ जाता है। पुराने, घिसे हुए या ओवर-इन्फ्लेटेड टायर इस दबाव को नहीं झेल पाते और बीच सड़क पर अचानक फट जाते हैं, जिससे गाड़ी बेकाबू होकर पलट जाती है।
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शोल्डर लेन पर अवैध और खतरनाक पार्किंग: कई ट्रक और वाणिज्यिक वाहन बिना टेल-लाइट या रिफ्लेक्टर जलाए एक्सप्रेसवे के आपातकालीन शोल्डर पर गाड़ी खड़ी कर देते हैं। रात के अंधेरे में या कोहरे के दौरान पीछे से आ रहे तेज रफ्तार वाहन इन खड़े ट्रकों में घुस जाते हैं।
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अचानक छुट्टा मवेशियों का आना: फेंसिंग (तारबंदी) के टूटे होने या ग्रामीणों द्वारा अवैध रूप से बनाए गए कटों से अचानक नीलगाय, गोवंश और कुत्ते सड़क पर आ जाते हैं, जिन्हें बचाने के चक्कर में वाहन अनियंत्रित हो जाते हैं।
सुल्तानपुर, बाराबंकी और आजमगढ़ बने सबसे संवेदनशील जोन: जानिए प्रमुख ब्लैक स्पॉट्स
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे लखनऊ के चांद सराय से शुरू होकर बाराबंकी, अमेठी, सुल्तानपुर, अयोध्या, अंबेडकर नगर, आजमगढ़, मऊ होते हुए गाजीपुर के हैदरिया गांव तक जाता है। इनमें से कुछ खंड हादसों के लिहाज से बेहद कुख्यात हो चुके हैं:
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सुल्तानपुर और कूरेभार खंड: यह इलाका एक्सप्रेसवे का मध्य भाग है। लखनऊ से करीब 120-140 किलोमीटर चलने के बाद चालक थकान महसूस करने लगते हैं। यही कारण है कि सुल्तानपुर के किलोमीटर 100 से 150 के बीच सबसे अधिक नींद की झपकी और ओवरस्पीडिंग के कारण हादसे दर्ज किए गए हैं।
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बाराबंकी और हैदरगढ़ बेल्ट: राजधानी लखनऊ से निकलते ही चौड़ी सड़क देखकर शुरू के 50 किलोमीटर में सबसे ज्यादा ओवरस्पीडिंग और ओवरटेकिंग से जुड़े हादसे होते हैं।
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आजमगढ़ और मऊ खंड: गाजीपुर की ओर जाने वाले इस अंतिम 100 किलोमीटर के स्ट्रेच में भारी ट्रकों, डंपरों और धीमी गति से चलने वाले वाहनों के साथ अचानक टक्कर की घटनाएं सामने आई हैं।
UPEIDA और पुलिस का मेगा एक्शन प्लान: एआई कैमरे, स्पीड गन और ऑटोमैटिक चालान
हादसों के बढ़ते ग्राफ को थामने के लिए उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीडा) और यूपी ट्रैफिक पुलिस ने हाई-टेक सर्विलांस सिस्टम को पूरी तरह सक्रिय कर दिया है:
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एडवांस्ड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम (ATMS): एक्सप्रेसवे के हर कुछ किलोमीटर पर ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकॉग्निशन (ANPR) कैमरे और स्पीड डिटेक्टिंग रडार लगाए गए हैं। अब यदि कोई वाहन दो टोल प्लाजा के बीच की दूरी निर्धारित समय से पहले तय करता है (औसत गति सीमा पार करता है), तो उसका ऑटोमैटिक ई-चालान कटकर मोबाइल पर भेजा जा रहा है।
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24x7 हाई-स्पीड पेट्रोलिंग वैन: यूपीडा ने हर 20-25 किलोमीटर पर गश्ती वाहनों और रिकवरी वैन की तैनाती बढ़ाई है। रात के समय शोल्डर पर खड़े वाहनों को तत्काल हटाने के लिए क्रेन और पेट्रोलिंग टीमें सायरन बजाकर गश्त कर रही हैं।
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टोल प्लाजा पर टी-ब्रेक और रैंडम चेकिंग: लंबी दूरी की बसों और ट्रकों के चालकों को नींद से जगाने के लिए रात के समय टोल प्लाजा पर उन्हें पानी से मुंह धोने और गर्म चाय पीने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। साथ ही ब्रीथ एनालाइजर के जरिए शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों की धरपकड़ की जा रही है।
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रिफ्लेक्टिव स्टिकर और रंबल स्ट्रिप्स: ब्लैक स्पॉट्स और टोल प्लाजा से पहले सड़कों पर थर्मोप्लास्टिक रंबल स्ट्रिप्स (झटके देने वाली पट्टियां) लगाई गई हैं ताकि यदि चालक को झपकी आ रही हो, तो कंपन से उसकी नींद तुरंत टूट जाए।
एक्सप्रेसवे पर सुरक्षित सफर के लिए 6 गोल्डन रूल्स: खुद भी सुरक्षित रहें और दूसरों को भी बचाएं
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर यात्रा करने वाले वाहन चालकों को अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए:
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गति सीमा को कभी न लांघें: अपनी कार की गति 90 से 100 किमी/घंटा से ऊपर बिल्कुल न ले जाएं। याद रखें कि 100 किमी/घंटा के बाद गाड़ी का नियंत्रण फिजिक्स के नियमों के अधीन हो जाता है, ब्रेक के नहीं।
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हर 2 घंटे में 15 मिनट का ब्रेक लें: लखनऊ से गाजीपुर या पूर्वांचल से दिल्ली का सफर करते समय एक्सप्रेसवे पर बने रेस्ट एरिया या ढाबों पर रुकें। गाड़ी से उतरकर थोड़ा टहलें, पानी पिएं और आंखें धोएं।
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टायर में नाइट्रोजन गैस का उपयोग करें: लंबी यात्रा से पहले टायरों की ग्रिप, कट और एयर प्रेशर की जांच कराएं। साधारण हवा के बजाय नाइट्रोजन गैस भरवाएं, क्योंकि नाइट्रोजन गर्म होने पर फैलती नहीं है और टायर फटने का जोखिम 90% कम हो जाता है।
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लेन अनुशासन का कड़ाई से पालन करें: सबसे दाहिनी लेन (Right Lane) केवल ओवरटेक करने के लिए होती है। लगातार दाहिनी लेन में गाड़ी न चलाएं। ओवरटेक करने के बाद अपनी गाड़ी को मध्यम लेन में वापस लाएं और ओवरटेकिंग हमेशा दाहिनी तरफ से ही करें।
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सीट बेल्ट हर सवारी के लिए अनिवार्य: कार में आगे और पीछे बैठने वाले सभी यात्रियों को सीट बेल्ट लगाना अनिवार्य है। भीषण हादसों में 80% मौतें केवल इसलिए होती हैं क्योंकि सीट बेल्ट न होने से यात्री गाड़ी का शीशा तोड़कर बाहर फिंक जाते हैं।
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आपातकालीन हेल्पलाइन याद रखें: एक्सप्रेसवे पर किसी भी खराबी, दुर्घटना या आपात स्थिति में तुरंत यूपीडा की आपातकालीन हेल्पलाइन 1033 या यूपी पुलिस हेल्पलाइन 112 पर कॉल करें। 15 से 20 मिनट के भीतर एम्बुलेंस और राहत दल मौके पर पहुंच जाता है।
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के विकास और समृद्धि का प्रतीक है, लेकिन इसे सुरक्षित बनाना केवल प्रशासन के नियमों से संभव नहीं है। जब तक हर चालक सड़क पर अपनी गति, संयम और जिम्मेदारी को नहीं समझेगा, तब तक इन खूनी आंकड़ों पर पूरी तरह लगाम नहीं लगाई जा सकती।