विधानसभा में एक भी विधायक नहीं, संसद के दोनों सदनों में शून्य होगी बसपा; क्या मायावती से छिन जाएगा राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा
उत्तर प्रदेश की सत्ता पर चार बार काबिज रहने वाली और कभी देश की राजनीति में 'किंगमेकर' की भूमिका निभाने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज अपने इतिहास के सबसे गहरे राजनीतिक संकट से जूझ रही है। चुनावी आंकड़ों और सदन में नुमाइंदगी के लिहाज से बसपा की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में उसका एक भी विधायक नहीं है और संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में पार्टी पूरी तरह 'शून्य' होने की दहलीज पर खड़ी है। इस शून्य की स्थिति के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की आगामी समीक्षा में मायावती की बसपा से 'राष्ट्रीय पार्टी' (National Party) का दर्जा भी छिन जाएगा?
1989 के बाद पहली बार: संसद के दोनों सदनों से साफ हो जाएगी मौजूदगी
बसपा के लिए 25 नवंबर की तारीख संसदीय इतिहास का सबसे काला अध्याय बनने जा रही है। पार्टी के इकलौते राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय समन्वयक रामजी गौतम का 6 साल का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है।
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लोकसभा में शून्य: 2024 के लोकसभा चुनाव में 'एकला चलो' की रणनीति पर मैदान में उतरी बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका खाता खाली रहा।
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विधानसभा और विधान परिषद में शून्य: उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा में 2022 में बसपा के पास सिर्फ एक विधायक (बलिया की रसड़ा सीट से उमाशंकर सिंह) थे। अगस्त में उनके असामयिक निधन के बाद विधानसभा में भी पार्टी का प्रतिनिधित्व शून्य हो गया। विधान परिषद में भी पार्टी के पास कोई सदस्य नहीं है।
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राज्यसभा भेजने की ताकत नहीं: उत्तर प्रदेश की 10 खाली हो रही राज्यसभा सीटों पर चुनाव के लिए किसी भी प्रत्याशी को जीत के लिए कम से कम 37 विधायकों के मतों की दरकार होती है। चूंकि बसपा के पास एक भी विधायक नहीं है, इसलिए वह अपने दम पर या किसी गठबंधन के बिना किसी नए सदस्य को राज्यसभा भेजने की स्थिति में ही नहीं है।
नतीजतन, साल 1989 में पहली बार संसद पहुंचने के बाद यह पहला मौका होगा जब संसद के दोनों सदनों में बाबा साहेब आंबेडकर और मान्यवर कांशीराम की विचारधारा पर बनी बसपा का एक भी सांसद नहीं होगा।
206 सीटों के पूर्ण बहुमत से शून्य तक: पतन का सफर
बसपा के राजनीतिक अवसान की शुरुआत 2012 के विधानसभा चुनाव से मानी जाती है। साल 2007 में मायावती के 'सोशल इंजीनियरिंग' फॉर्मूले ने करिश्मा करते हुए 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। लेकिन इसके बाद पार्टी का ग्राफ लगातार नीचे गिरता गया:
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2012 विधानसभा: सीटें घटकर 80 पर आ गईं और सत्ता हाथ से निकल गई।
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2014 लोकसभा: पूरे देश में 4.19% वोट मिले, लेकिन सीटें शून्य रहीं।
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2019 लोकसभा: सपा-रालोद गठबंधन के सहारे पार्टी ने 10 सीटें जीतीं।
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2022 विधानसभा: वोट शेयर गिरकर 12.88% और सीटें घटकर महज 1 रह गई।
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2024 लोकसभा: अकेले चुनाव लड़ा, वोट शेयर ऐतिहासिक रूप से गिरकर 2.06% रह गया और सीटें फिर शून्य हो गईं।
लगातार कमजोर प्रदर्शन के चलते पार्टी का कैडर और पारंपरिक दलित-जाटव वोट बैंक भी खिसक कर भाजपा, सपा और चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) की तरफ बंटता नजर आया है।
क्या छिन जाएगा राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा? जानिए चुनाव आयोग के कड़े नियम
चुनाव चिह्न (आरक्षण व आवंटन) आदेश, 1968 के तहत किसी भी राजनीतिक दल को 'राष्ट्रीय पार्टी' का दर्जा बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग (ECI) के तीन बुनियादी पैमानों में से कम से कम किसी एक शर्त को पूरा करना अनिवार्य होता है:
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शर्त 1 (चार राज्यों में राज्य स्तरीय दर्जा): उस पार्टी को कम से कम चार अलग-अलग राज्यों में 'राज्य स्तरीय दल' (State Party) के रूप में मान्यता प्राप्त हो।
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शर्त 2 (वोट और सीटें): लोकसभा या विधानसभा चुनाव में पार्टी को कम से कम चार राज्यों में कुल वैध मतों का न्यूनतम 6% वोट मिला हो और साथ ही उसने लोकसभा में कम से कम चार सीटें जीती हों।
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शर्त 3 (तीन राज्यों से लोकसभा सीटें): पार्टी ने लोकसभा की कुल सीटों का कम से कम 2% (यानी 11 सीटें) जीती हों और ये सांसद कम से कम तीन अलग-अलग राज्यों से चुनकर आए हों।
मौजूदा स्थिति में बसपा शर्त 2 और शर्त 3 दोनों से पूरी तरह बाहर हो चुकी है। पार्टी की राष्ट्रीय मान्यता सिर्फ और सिर्फ शर्त 1 यानी चार राज्यों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और मध्य प्रदेश/राजस्थान) में मिले उसके पुराने प्रदर्शन और राज्य स्तरीय पार्टी के दर्जे पर टिकी हुई है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में भी बसपा का वोट प्रतिशत और सीटें लगातार गिरी हैं।
चुनाव आयोग का 'दो चुनावों का नियम' दे रहा है फिलहाल राहत
हालांकि, बसपा समर्थकों के लिए राहत की बात यह है कि चुनाव आयोग किसी पार्टी का राष्ट्रीय दर्जा तुरंत नहीं छीनता। चुनाव आयोग के नियमों में 2016 में किए गए संशोधन के अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल के राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय दर्जे की समीक्षा हर 5 साल के बजाय 10 साल (यानी लगातार दो लोकसभा/विधानसभा चुनावों के प्रदर्शन) के आधार पर की जाती है।
चुनाव आयोग ने वर्ष 2023-2025 की समीक्षा प्रक्रिया के दौरान बसपा का राष्ट्रीय दर्जा बरकरार रखा था, क्योंकि उसने अतीत में चार राज्यों में मान्यता की न्यूनतम अर्हता को बचाए रखा था। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में देश भर में मिले महज 2.06% वोट और एक भी सीट न जीत पाने के बाद पार्टी की स्थिति बेहद कमजोर हो गई है।
2027 का यूपी चुनाव तय करेगा बसपा का वजूद और 'हाथी' का भविष्य
चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव बसपा के राष्ट्रीय वजूद के लिए 'करो या मरो' की लड़ाई साबित होंगे।
यदि बसपा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कम से कम 6 से 8 प्रतिशत वोट और पर्याप्त सीटें हासिल कर राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा मजबूती से नहीं बचा पाती है, तो चुनाव आयोग की अगली व्यापक समीक्षा में उससे 'राष्ट्रीय पार्टी' का तमगा छिन सकता है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि पार्टी का आरक्षित चुनाव चिह्न 'हाथी' देश भर में सुरक्षित नहीं रहेगा और वह सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित रह सकता है।
हाल ही में मायावती द्वारा अपने बड़े भतीजे आकाश आनंद को बाहर का रास्ता दिखाकर छोटे भतीजे ईशान आनंद को नेशनल कोऑर्डिनेटर बनाने का फैसला भी इसी डूबती नैया को पार लगाने और संगठन में नई जान फूंकने की हताशा भरी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन जब तक बसपा अपनी जमीनी सियासत, कैडर कनेक्टिविटी और गठबंधन की रणनीति में बुनियादी बदलाव नहीं लाती, तब तक राष्ट्रीय दल का तमगा बचाए रखना मायावती के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना रहेगा।