गिरमिटिया मजदूर थे दादा, तमिल माहौल में पली-बढ़ीं; जानिए रंगभेद से लड़कर शांति का नोबेल जीतने वाली नवी पिल्लई की अनसुनी दास्तान

गिरमिटिया मजदूर थे दादा, तमिल माहौल में पली-बढ़ीं; जानिए रंगभेद से लड़कर शांति का नोबेल जीतने वाली नवी पिल्लई की अनसुनी दास्तान

दक्षिण अफ्रीका में जब रंगभेद (Apartheid) का क्रूर कानून इंसानों को उनकी चमड़ी के रंग के आधार पर बांट रहा था, उस दौर में एक भारतीय मूल की युवती ने श्वेत हुकूमत के सबसे मजबूत गढ़ यानी अदालतों को अपने तर्कों से हिला कर रख दिया था। वह नाम है नवनेथम 'नवी' पिल्लई। हाल ही में शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित की गईं नवी पिल्लई केवल दक्षिण अफ्रीका की पहली गैर-श्वेत महिला जज या संयुक्त राष्ट्र (UN) की पूर्व मानवाधिकार उच्चायुक्त भर नहीं हैं, बल्कि वे उस अदम्य मानवीय साहस की पहचान हैं जिसने नस्लभेद, युद्ध अपराधों और नरसंहार के पीड़ितों को न्याय की चौखट तक पहुंचाया। उनका जीवन उन लाखों भारतीय प्रवासियों के संघर्ष और स्वाभिमान का जीवंत दस्तावेज है, जिन्हें इतिहास ने कभी हाशिए पर धकेलने की कोशिश की थी।

तमिलनाडु से दक्षिण अफ्रीका का सफर: गिरमिटिया मजदूर थे दादा

नवी पिल्लई की पारिवारिक जड़ें भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु से जुड़ी हैं। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जब अंग्रेजों ने भारत से लाखों श्रमिकों को गन्ने और चाय के बागानों में काम करने के लिए अनुबंध पर विदेश भेजा, तब उनके दादा भी एक 'गिरमिटिया' (इंडेंचर्ड लेबर या बंधुआ मजदूर) के तौर पर तमिलनाडु से पानी के जहाज में बैठकर दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे। खून-पसीना बहाकर उन्होंने विदेशी धरती पर अपनी पहचान बनाई। नवी पिल्लई का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर की एक बेहद साधारण बस्ती क्लेयरवुड में हुआ था। उनके पिता एक साधारण बस ड्राइवर थे और मां एक गृहिणी थीं। घर में तमिल संस्कृति, भाषा और पारंपरिक संस्कारों का गहरा प्रभाव था। अभावों और सीमित संसाधनों के बावजूद उनके माता-पिता ने अपनी बेटियों की पढ़ाई से कभी समझौता नहीं किया।

रंगभेद का क्रूर दौर और स्थानीय समुदाय का चंदा: ऐसे बनीं वकील

जिस दौर में नवी पिल्लई बड़ी हो रही थीं, उस समय दक्षिण अफ्रीका का कानूनी ढांचा गैर-श्वेतों, अश्वेतों और भारतीयों को दोयम दर्जे का नागरिक मानता था। स्कूल-कॉलेज, बसें, बेंच और यहां तक कि समुद्र तट भी नस्ल के आधार पर बंटे हुए थे। एक बस ड्राइवर की बेटी के लिए कानून की पढ़ाई करना किसी असंभव सपने जैसा था। जब उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ नटाल में दाखिला लिया, तो उनकी फीस भरने के लिए पूरे तमिल और भारतीय समुदाय के दुकानदारों, ड्राइवरों और रिश्तेदारों ने मिलकर चंदा इकट्ठा किया था। इस समुदाय के भरोसे को उन्होंने टूटने नहीं दिया। अपनी काबिलियत के दम पर उन्होंने एलएलबी पूरी की और बाद में अमेरिका के विश्वविख्यात हार्वर्ड लॉ स्कूल से मास्टर ऑफ लॉज (LLM) और डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस (SJD) की डिग्री हासिल की। वे हार्वर्ड से डॉक्टरेट करने वाली पहली दक्षिण अफ्रीकी नागरिक बनीं।

रोबेन आइलैंड से नेल्सन मंडेला तक: श्वेत अदालतों में लड़ी ऐतिहासिक लड़ाई

साल 1967 में नवी पिल्लई नटाल प्रांत में अपनी खुद की लीगल प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली गैर-श्वेत महिला वकील बनीं। उस जमाने में श्वेत जजों के सामने एक भारतीय महिला का गाउन पहनकर बहस करना ही अपने आप में एक खुली बगावत थी। अदालतों में उन्हें जजों के निजी कमरों में घुसने तक की इजाजत नहीं थी क्योंकि वे गोरे नहीं थीं। लेकिन पिल्लई ने इन बेड़ियों को तोड़ा और रंगभेद विरोधी स्वतंत्रता सेनानियों के मुकदमों की कमान संभाली। उन्होंने कुख्यात रोबेन आइलैंड जेल में बंद नेल्सन मंडेला समेत अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC) के प्रमुख नेताओं के कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। उन्होंने जेल में कैदियों पर होने वाले अमानवीय टॉर्चर और सोलिटरी कन्फाइनमेंट के खिलाफ ऐतिहासिक याचिकाएं दायर कीं। इस दौरान उनके अपने पति, गाबी पिल्लई, को भी सरकार ने राजनीतिक गतिविधियों के आरोप में बिना किसी ट्रायल के महीनों तक जेल में बंद रखा था, लेकिन पिल्लई का इरादा कभी कमजोर नहीं पड़ा।

रवांडा नरसंहार का युगांतरकारी फैसला: रेप को घोषित किया 'युद्ध अपराध'

1994 में जब दक्षिण अफ्रीका आजाद हुआ और नेल्सन मंडेला राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने नवी पिल्लई को देश की पहली गैर-श्वेत महिला हाईकोर्ट जज नियुक्त किया। इसके बाद उनका कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से बढ़ा। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें रवांडा इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल (ICTR) का जज और बाद में प्रेसिडेंट बनाया। रवांडा में 1994 के भयानक नरसंहार के दौरान हुए मुकदमों में पिल्लई ने इतिहास रच दिया। 'जीन-पॉल अकायसु' मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उन्होंने दुनिया के कानूनी इतिहास में पहली बार यह स्थापित किया कि युद्ध में महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म और यौन हिंसा केवल साधारण अपराध नहीं, बल्कि एक सुनियोजित 'नरसंहार' (Genocide) का हथियार है। इस अकेले फैसले ने वैश्विक युद्ध अपराध कानून की पूरी दिशा ही बदल दी।

यूएन मानवाधिकार प्रमुख के तौर पर महाशक्तियों को भी दिखाया आईना

साल 2008 में नवी पिल्लई को संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त (UN High Commissioner for Human Rights) नियुक्त किया गया। अपने 6 साल के कार्यकाल में उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्कों की ज्यादतियों पर सवाल उठाए। चाहे वह अमेरिका द्वारा ड्रोन हमलों में नागरिकों की मौत का मुद्दा हो, गाजा पट्टी में मानवाधिकारों का हनन हो, सीरिया का खूनी संघर्ष हो या श्रीलंका में युद्ध के अंतिम दिनों में तमिलों पर हुए अत्याचार—पिल्लई ने हर जगह बिना किसी राजनीतिक समझौते के जांच आयोग बैठाए। उन्होंने एलजीबीटीक्यू+ अधिकारों, नस्लीय समानता और महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता के लिए वैश्विक स्तर पर साहसिक अभियान चलाए।

शांति का नोबेल: गिरमिटिया मजदूरों के स्वाभिमान की अमर विजय

नवी पिल्लई को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है, बल्कि यह उन लाखों बेजुबान मजदूरों, प्रवासियों और रंगभेद के सताए हुए लोगों के सामूहिक संघर्ष की वैश्विक स्वीकृति है। एक साधारण बस ड्राइवर की बेटी, जिसके पुरखे कभी जहाज में बेड़ियों और बंधुआ अनुबंधों के साथ परदेस पहुंचे थे, आज उसी धरती पर खड़े होकर दुनिया को मानवाधिकारों और न्याय का पाठ पढ़ा रही है। नवी पिल्लई की यह जीवन यात्रा दुनिया भर की उन तमाम बेटियों और हाशिए पर खड़े युवाओं के लिए एक मशाल की तरह है, जो अपने हक और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं।