शांति दूत बनने चले पाकिस्तान की तेहरान में भारी फजीहत: ईरान ने मारा तीखा तंज, खुद के घर के हालात संभालने की दी दो टूक नसीहत
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर खुद को मुस्लिम जगत का बड़ा रहनुमा और निष्पक्ष मध्यस्थ साबित करने की कोशिश में जुटे पाकिस्तान को एक बार फिर भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते तनाव और ईरान के साथ विभिन्न देशों के टकराव के बीच इस्लामाबाद ने शांति वार्ता और सुलह कराने की पहल करने का प्रस्ताव रखा था। पाकिस्तानी हुकूमत को उम्मीद थी कि इस कूटनीतिक चाल से वैश्विक स्तर पर उसकी छवि एक जिम्मेदार और बड़े देश के रूप में उभरेगी। हालांकि, तेहरान से जो प्रतिक्रिया सामने आई, उसने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया। ईरानी कूटनीतिक हलकों की ओर से आए तीखे और चुभने वाले बयानों ने पाकिस्तान की इस पहल को सिरे से खारिज करते हुए उसकी अंतरराष्ट्रीय स्थिति को असहज बना दिया है।
'पहले अपना घर संभालें': ईरान के कड़े बयानों ने किया पानी-पानी
ईरान की ओर से आए बयानों में सीधे तौर पर यह संकेत दिया गया कि जो मुल्क खुद आर्थिक कंगाली, राजनीतिक अस्थिरता और बेलगाम आंतरिक आतंकवाद से जूझ रहा है, उसे दूसरों के मामलों में उपदेश देने या मध्यस्थ बनने की जरूरत नहीं है। ईरानी अधिकारियों ने बेहद सधे लेकिन तल्ख लहजे में कहा कि किसी भी देश को दूसरों के आंगन में सुलह कराने से पहले अपने घर के भीतर लगी आग को बुझाना चाहिए। तेहरान के इस कूटनीतिक तंज का सीधा इशारा पाकिस्तान में आए दिन होने वाले आतंकी हमलों, अशांत खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के बदहाल सुरक्षा हालात की तरफ था। ईरान ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उसे अपने सुरक्षा फैसले लेने और दुश्मनों से निपटने के लिए किसी ऐसे कमजोर मुल्क के सहारे की आवश्यकता नहीं है जो खुद विदेशी कर्जों और आईएमएफ की शर्तों पर सांसें ले रहा हो।
बलूचिस्तान सीमा विवाद और दोनों देशों के बीच पुरानी अविश्वास की खाई
पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते ऊपर से जितने सामान्य दिखते हैं, अंदरूनी तौर पर उनमें हमेशा भारी तनाव और गहरा अविश्वास बना रहा है। दोनों देशों के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा बलूचिस्तान और सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत से होकर गुजरती है। ईरान लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि 'जैश अल-अदल' जैसे सुन्नी चरमपंथी संगठन पाकिस्तानी सीमा के भीतर सुरक्षित पनाहगाह बनाकर ईरानी सुरक्षा बलों पर खूनी हमले करते हैं और फिर वापस पाकिस्तान में छिप जाते हैं। कुछ ही समय पहले दोनों देशों के बीच एक-दूसरे की सीमाओं में मिसाइल और ड्रोन स्ट्राइक तक की नौबत आ गई थी। ऐसे कड़वे इतिहास के बावजूद जब इस्लामाबाद ने खुद को शांति का पैरोकार बनाकर पेश करने की कोशिश की, तो तेहरान का बिफरना तय माना जा रहा था। ईरानी मीडिया और नीति विशेषज्ञों ने साफ कहा कि जो देश अपनी सीमा से आतंकियों की घुसपैठ नहीं रोक पा रहा, वह क्षेत्रीय शांति की गारंटी कैसे दे सकता है।
सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उड़ी खिल्ली
ईरान का यह कड़ा रुख सामने आते ही सोशल मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में पाकिस्तान की खूब खिल्ली उड़ाई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की विदेश नीति पूरी तरह दिशाहीन हो चुकी है। एक तरफ वह अमेरिकी खेमे को खुश करने के लिए सौदेबाजी करता है, दूसरी तरफ चीन और सऊदी अरब की मदद पर निर्भर रहता है, और फिर अचानक ईरान के साथ मध्यस्थता की मेज सजाने की कोशिश करने लगता है। इसी दोहरे रवैये के चलते तेहरान कभी भी इस्लामाबाद पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर पाया। इंटरनेट यूजर्स भी इस वाकये पर जमकर मजे ले रहे हैं और लिख रहे हैं कि पाकिस्तान को अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था, बिजली कटौती और खाली खजाने को दुरुस्त करने पर ध्यान लगाना चाहिए, न कि दुनिया का पंच बनने का नाटक करना चाहिए।
विफल विदेश नीति और पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक सबक
यह पूरा घटनाक्रम पाकिस्तान के लिए एक बड़ा सबक बनकर सामने आया है। कूटनीति में कद केवल परमाणु शक्ति होने या बड़ी-बड़ी बातें करने से नहीं बढ़ता, बल्कि मजबूत अर्थव्यवस्था, आंतरिक स्थिरता और विश्वसनीयता से तय होता है। जब किसी देश की अपनी संसद, चुनी हुई सरकारें और प्रांतीय ढांचे संकट में हों, तो कोई भी संप्रभु मुल्क उसकी मध्यस्थता को गंभीरता से नहीं लेता। ईरान द्वारा दिखाए गए इस आईने ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि घरेलू मोर्चे पर कमजोर देश जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी हैसियत से बड़ा किरदार निभाने की कोशिश करता है, तो उसे सम्मान के बजाय इसी तरह के अपमानजनक तंज का सामना करना पड़ता है।