अमेरिका में मिड-टर्म इलेक्शन से पहले ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग रिकॉर्ड 31% तक लुढ़की
वाशिंगटन डीसी से इस वक्त की सबसे बड़ी राजनीतिक खबर सामने आ रही है, जिसने व्हाइट हाउस से लेकर अमेरिकी सियासी गलियारों तक में खलबली मचा दी है। आगामी 3 नवंबर को होने वाले अत्यंत महत्वपूर्ण अमेरिकी मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों से ठीक पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। प्रतिष्ठित वैश्विक सर्वेक्षण एजेंसी रॉयटर्स और इप्सोस (Reuters/Ipsos) द्वारा सोमवार को पूरे किए गए ताजा ओपिनियन पोल के नतीजों में ट्रंप की सार्वजनिक अप्रूवल रेटिंग गिरकर महज 31 प्रतिशत के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गई है। यह आंकड़ा उनके मौजूदा राष्ट्रपति कार्यकाल का अब तक का सबसे कमजोर सार्वजनिक समर्थन माना जा रहा है। मिडटर्म वोटिंग के कुछ ही दिन पहले सामने आए इन चौंकाने वाले आंकड़ों ने सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर गंभीर खतरे के बादल मंडरा दिए हैं, जबकि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ अभूतपूर्व रूप से मजबूत कर ली है।
रॉयटर्स/इप्सोस पोल का विस्फोटक खुलासा: डेमोक्रेट्स को 12 अंकों की ऐतिहासिक बढ़त
चार दिनों तक अमेरिकी मतदाताओं के बीच चले इस गहन और विस्तृत राष्ट्रीय सर्वेक्षण के आंकड़े दर्शाते हैं कि केवल पिछले दो हफ्तों के भीतर ही राष्ट्रपति की रेटिंग में 1 प्रतिशत अंक की सीधी गिरावट आई है। जब रजिस्टर्ड मतदाताओं से यह सीधा सवाल किया गया कि यदि आज ही प्रतिनिधि सभा और सीनेट के चुनाव करा लिए जाएं, तो वे किस पार्टी के उम्मीदवार को चुनेंगे, तो 47 प्रतिशत मतदाताओं ने डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में मतदान करने का स्पष्ट इरादा जताया। वहीं, दूसरी ओर सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी के पक्ष में केवल 35 प्रतिशत नागरिक ही खड़े नजर आए। इस प्रकार डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन्स पर पूरे 12 प्रतिशत अंकों की बहुत बड़ी बढ़त बना ली है, जो मौजूदा चुनावी मौसम में दोनों दलों के बीच दर्ज किया गया अब तक का सबसे बड़ा फासला है। इससे ठीक दो सप्ताह पहले कराए गए सर्वेक्षण में डेमोक्रेट्स 7 प्रतिशत अंकों से आगे थे, जहां उन्हें 44 प्रतिशत और रिपब्लिकन्स को 37 प्रतिशत समर्थन हासिल था, जिससे साफ जाहिर होता है कि मतदान की तारीख नजदीक आते-आते मतदाताओं का असंतोष रिपब्लिकन उम्मीदवारों के खिलाफ और अधिक मुखर होता जा रहा है।
महिला मतदाताओं में भारी नाराजगी, जेंडर गैप ने बढ़ाई रिपब्लिकन पार्टी की मुश्किलें
ताजा ओपिनियन पोल के जनसांख्यिकीय विश्लेषण से पता चलता है कि डेमोक्रेटिक पार्टी की इस तेज बढ़त की सबसे मुख्य धुरी देश की महिला मतदाता बनी हैं। आंकड़ों के अनुसार लगभग 50 प्रतिशत महिला मतदाताओं ने आगामी चुनाव में डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को वोट देने का खुला ऐलान किया है, जबकि इसके विपरीत केवल 32 प्रतिशत महिलाएं ही रिपब्लिकन पार्टी के साथ खड़ी दिख रही हैं। यह भारी अंतर इस बात का संकेत है कि घरेलू नीतियों, महंगाई और विदेश नीति के मोर्चों पर महिलाएं मौजूदा प्रशासन के फैसलों से सबसे ज्यादा आहत हुई हैं। हालांकि पुरुष मतदाताओं के वर्ग में भी डेमोक्रेट्स के प्रति झुकाव साफ देखा गया है, लेकिन वहां दोनों दलों के बीच मुकाबला अपेक्षाकृत थोड़ा कड़ा बना हुआ है। इसके बावजूद महिलाओं द्वारा एकतरफा तौर पर डेमोक्रेट्स के पक्ष में लामबंद होना स्विंग स्टेट्स यानी पेंसिल्वेनिया, विस्कॉन्सिन, मिशिगन और जॉर्जिया जैसे राज्यों में चुनाव नतीजों को पलटने के लिए काफी साबित हो सकता है।
ईरान युद्ध की लपटें और पेट्रोल की आसमान छूती कीमतों ने झोंका मंदी की आग में
राजनीतिक विश्लेषकों और आर्थिक जानकारों का स्पष्ट मानना है कि अमेरिकी जनता के इस जबर्दस्त गुस्से और ट्रंप की गिरती साख की सीधी जड़ें फरवरी में लिए गए एक बड़े सैन्य फैसले में छिपी हैं। फरवरी माह में राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका के करीबी सहयोगी इज़राइल के साथ मिलकर ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले का आदेश जारी किया था। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल और पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति को सीधे तौर पर बाधित कर दिया। इसके सीधे दुष्परिणाम के रूप में अमेरिका भर में गैसोलीन (पेट्रोल) की कीमतों में रिकॉर्ड तोड़ उछाल आया, जिसने आम अमेरिकी परिवारों के मासिक खर्च और बजट को पूरी तरह बेपटरी कर दिया। दैनिक जीवन की जरूरी वस्तुओं, किराना सामान और परिवहन लागत में हुई इस बेतहाशा बढ़ोतरी ने मध्यम वर्ग में भारी रोष भर दिया है।
आर्थिक प्रबंधन पर ट्रंप से 68% जनता असंतुष्ट, 37% रिपब्लिकन भी हुए बागी
सर्वेक्षण का सबसे हैरान करने वाला और सनसनीखेज पहलू देश की अर्थव्यवस्था के प्रबंधन से जुड़ा है। पोल के नतीजों के मुताबिक देश के 68 प्रतिशत नागरिक अमेरिकी अर्थव्यवस्था को संभालने के राष्ट्रपति ट्रंप के तौर-तरीकों से सीधे तौर पर नाखुश और असंतुष्ट हैं। सबसे बड़ा झटका यह है कि इस असंतुष्ट वर्ग में 37 प्रतिशत ऐसे मतदाता भी शामिल हैं जो पारंपरिक और वैचारिक रूप से खुद को कट्टर रिपब्लिकन समर्थक मानते हैं, यानी पार्टी का अपना पारंपरिक कोर वोटर भी आर्थिक मोर्चे पर सरकार की नीतियों से विमुख होता दिख रहा है। इसके साथ ही जब मतदाताओं के सामने यह विकल्प रखा गया कि वर्तमान आर्थिक संकट और मंदी के दबाव से देश को बाहर निकालने में कौन सा दल अधिक सक्षम साबित होगा, तो 40 प्रतिशत लोगों ने डेमोक्रेटिक पार्टी की नीतियों पर भरोसा जताया, जबकि रिपब्लिकन पार्टी पर भरोसा करने वालों की संख्या महज 33 प्रतिशत पर सिमट कर रह गई।
राज्य-स्तरीय सीनेट और जिला-स्तरीय प्रतिनिधि सभा सीटों पर नजर
यद्यपि राष्ट्रीय स्तर पर उभरे ये चुनावी रुझान डेमोक्रेट्स के पक्ष में एक बड़ी राजनीतिक लहर का संकेत दे रहे हैं, परंतु चुनाव विश्लेषक एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू की ओर भी ध्यान दिला रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय लोकप्रिय मत हमेशा जिला-स्तरीय प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और राज्य-स्तरीय सीनेट की सभी सीटों पर सीधे तौर पर लागू नहीं होता है। कई ग्रामीण और उपनगरीय जिलों में रिपब्लिकन पार्टी को दशकों से एक मजबूत संरचनात्मक लाभ और पारंपरिक वोट बैंक की स्थिरता हासिल है, जहां स्थानीय समीकरण राष्ट्रीय मूड से भिन्न हो सकते हैं। इसके बावजूद 31 प्रतिशत की ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम अप्रूवल रेटिंग किसी भी निवर्तमान राष्ट्रपति के लिए सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) का ऐसा भयंकर तूफान पैदा कर देती है, जिसे रोक पाना किसी भी दल के लिए चुनावी इतिहास में लगभग नामुमकिन रहा है।