रूस से दोस्ती की भारी कीमत! अमेरिका ने भारत और चीन पर 100% टैरिफ वाले बिल को दी शुरुआती मंजूरी

रूस से दोस्ती की भारी कीमत! अमेरिका ने भारत और चीन पर 100% टैरिफ वाले बिल को दी शुरुआती मंजूरी

रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। अमेरिकी सीनेट ने एक सख्त बिल को शुरुआती मंजूरी दे दी है, जिसके कानून बनने के बाद अमेरिका रूस से ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर 100% तक भारी-भरकम आयात शुल्क (टैरिफ) लगा सकता है। इस संभावित फैसले की चपेट में भारत और चीन जैसे बड़े देश भी आ सकते हैं।

86 सीनेटरों का मिला समर्थन और बिल का मुख्य उद्देश्य

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के मद्देनजर अमेरिकी संसद में यह बड़ा कदम उठाया गया है। इस नए विधायी प्रस्ताव के पक्ष में भारी बहुमत यानी 86 सीनेटरों ने अपना वोट दिया है, जबकि इसके विरोध में मात्र 12 वोट पड़े। दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा तैयार किए गए इस बिल का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई को पूरी तरह रोकना और युद्ध रोकने के लिए मॉस्को पर आर्थिक दबाव बनाना है।

क्या भारत पर तुरंत लग जाएगा 100% टैरिफ?

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी सीनेट की इस शुरुआती मंजूरी का यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि भारत या अन्य देशों पर तुरंत ही 100% टैरिफ लग जाएगा। यह बिल केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ऐसा कड़ा कदम उठाने का असीमित कानूनी अधिकार देगा। राष्ट्रपति को यह तय करना होगा कि टैरिफ लगाना है या नहीं और उसकी दर कितनी होगी। फिलहाल यह मामला अमेरिका में शुरुआती विधायी प्रक्रिया के दौर में है।

कानून बनने की प्रक्रिया और घरेलू स्तर पर छिड़ी तीखी बहस

यह प्रस्ताव अभी सीनेट की कुछ अन्य प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) में जाएगा। वहां से पास होने और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अंतिम हस्ताक्षर के बाद ही यह आधिकारिक कानून का रूप लेगा। इस बीच, अमेरिका के भीतर ही इस बिल को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ गई है। कुछ डेमोक्रेट नेताओं का तर्क है कि इस तरह के कड़े प्रावधानों से अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है, जबकि समर्थकों का मानना है कि यह यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए जरूरी कदम है।

भारत के लिए कैसी है मौजूदा स्थिति?

भारत अपनी ऊर्जा और ईंधन की जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से भारी मात्रा में रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदता रहा है। अमेरिकी संसद के इस कदम से अभी भारत को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन भारत सरकार पूरी स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए है। यदि भविष्य में यह प्रस्ताव कानून बनता है और अमेरिकी प्रशासन सख्त रुख अपनाता है, तो यह भारत-अमेरिका के व्यापारिक संबंधों को प्रभावित कर सकता है।

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