UPI Payment Charges Update: यूपीआई पर शुल्क वसूलने की तैयारी में सरकार! बड़े व्यापारियों और ₹2,000 से अधिक के ट्रांजैक्शन पर लग सकता है MDR, जानें पूरा प्लान
मोदी सरकार की बेहद लोकप्रिय डिजिटल भुगतान प्रणाली यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। सरकार ने यूपीआई सिस्टम पर व्यापारियों से शुल्क वसूलने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाते हुए संसद में भुगतान कानूनों में प्रस्तावित संशोधन पेश किए हैं। हालांकि यह नया शुल्क सीधे तौर पर ग्राहकों पर नहीं बल्कि व्यापारियों पर लगाया जाएगा, फिर भी इस बदलाव का असर देश के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम पर पड़ सकता है। आइए जानते हैं कि सरकार के इस नए प्रस्ताव के क्या मायने हैं और यह किस तरह लागू हो सकता है।
क्या हैं सरकार के दो बड़े विकल्प? (नीति निर्माताओं की योजना)
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, नीति निर्माता फिलहाल दो प्रमुख विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं:
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पहला विकल्प: एक निश्चित सीमा या राशि से अधिक के लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाया जाए।
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दूसरा विकल्प: व्यापारी के वार्षिक कारोबार (Annual Turnover) के आधार पर यह शुल्क तय किया जाए।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, एक प्रमुख प्रस्ताव के तहत केवल बड़े व्यापारियों से ही शुल्क लिया जाएगा, जबकि आम उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों के लिए यूपीआई भुगतान पूरी तरह से मुफ्त बना रहेगा।
कितना लग सकता है चार्ज? (विस्तृत आंकड़े)
सरकारी सूत्रों के हवाले से सामने आए प्रस्ताव के मुताबिक, 1.5 करोड़ रुपये से अधिक का सालाना कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 0.3% से 0.5% तक का MDR लगाया जा सकता है।
जेफरीज (Jefferies) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन कुल यूपीआई लेनदेन संख्या का मात्र 4% हैं, लेकिन कुल लेनदेन मूल्य (Total Transaction Value) का लगभग 67% हिस्सा इन्हीं बड़े ट्रांजैक्शन से आता है। यही कारण है कि इस दायरे को शुल्क के दायरे में लाने पर विचार किया जा रहा है।
संसद में पेश हुआ संशोधन विधेयक
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में 'भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम' (Payment and Settlement Systems Act) में संशोधन विधेयक पेश किया है। उद्योग और नियामक जानकारों का मानना है कि इस संशोधन के जरिए ही डिजिटल पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने का मजबूत कानूनी आधार तैयार होगा। हालांकि, अभी यह आधिकारिक रूप से तय नहीं हुआ है कि शुल्क की अंतिम दर क्या होगी और यह सटीक रूप से किन-किन लेनदेन श्रेणियों पर लागू किया जाएगा। वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) की तरफ से इस पर अंतिम दिशा-निर्देश आने बाकी हैं।
क्यों पड़ रही है फ्री UPI पर बदलाव की जरूरत?
इंडस्ट्री के जानकारों और अधिकारियों का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर (जैसे फोनपे, गूगल पे आदि) को कोई शुल्क नहीं मिलने के कारण डिजिटल पेमेंट में लंबी अवधि की ग्रोथ और इनोवेशन को बनाए रखना मुश्किल हो रहा है। शून्य शुल्क मॉडल के कारण कंपनियों की तकनीक और सुरक्षा बुनियादी ढांचे में निवेश करने की क्षमता सीमित होती जा रही है। गौरतलब है कि यूपीआई दुनिया के सबसे बड़े रियल-टाइम पेमेंट नेटवर्कों में शुमार है, जहां अकेले जुलाई महीने में 23.6 अरब लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य 29.9 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।
आखिर MDR क्या होता है? (सरल शब्दों में समझें)
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परिभाषा: MDR (Merchant Discount Rate) वह शुल्क है जो व्यापारी डिजिटल ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करने के एवज में बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को चुकाते हैं।
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तुलना: भारत में क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल पर आमतौर पर लगभग 1.5% तक का MDR लगता है, जबकि डेबिट कार्ड पर यह शुल्क 0.9% तक होता है। हालांकि, अब तक यूपीआई लेनदेन पूरी तरह से मुफ्त रखे गए थे और व्यापारियों से कोई MDR नहीं लिया जाता था।