'जेब में थे सिर्फ 20 पैसे, 3 दिन तक पिया सिर्फ नल का पानी!' जावेद अख्तर ने याद किए बॉम्बे के वो खौफनाक दिन; फुटपाथ पर सोने से लेकर बॉलीवुड के शहंशाह बनने की रोंगटे खड़े करने वाली दास्तान

'जेब में थे सिर्फ 20 पैसे, 3 दिन तक पिया सिर्फ नल का पानी!' जावेद अख्तर ने याद किए बॉम्बे के वो खौफनाक दिन; फुटपाथ पर सोने से लेकर बॉलीवुड के शहंशाह बनने की रोंगटे खड़े करने वाली दास्तान

भारतीय सिनेमा में संवादों, कहानियों और गीतों को अपनी कलम से नई रूह बख्शने वाले दिग्गज लेखक और गीतकार जावेद अख्तर आज शोहरत और दौलत के जिस मुकाम पर हैं, वहां पहुंचना हर किसी का ख्वाब होता है। पद्म भूषण, पद्म श्री और पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित इस फनकार ने हाल ही में अपने शुरुआती दिनों के उस अंधकारमय और दर्दनाक दौर को याद किया है जिसे सुनकर किसी की भी आंखें भर आएं। जावेद अख्तर ने साझा किया कि जब वे 4 अक्टूबर 1964 को मायानगरी बॉम्बे (अब मुंबई) की सरजमीं पर उतरे थे, तब उनके पास न तो सिर छिपाने के लिए कोई छत थी, न कोई सहारा और जेब में बचे थे महज 20 पैसे।

ग्वालियर, लखनऊ और भोपाल की साहित्यिक गलियों से निकलकर मुंबई के रेलवे स्टेशन पर कदम रखने वाले उस 19 साल के नौजवान के पास सिवाय आंखों में तैरते बड़े सपनों और सीने में सुलगती जिद्द के कुछ नहीं था। जावेद अख्तर ने बताया कि सफलता की चकाचौंध के पीछे कितनी रातें भूखे पेट, फुटपाथों और अंधेरे कमरों में सिसकते हुए कटी हैं, इसका अंदाजा बाहर से लगाना नामुमकिन है। यह कहानी केवल एक लेखक के संघर्ष की नहीं, बल्कि उस असीम जिजीविषा की है जो इंसान को राख से उठाकर अर्श तक पहुंचा देती है।

जब लगातार 3 दिनों तक नहीं मिला खाने का एक निवाला

जावेद अख्तर ने अपने सबसे खौफनाक अनुभव को बयां करते हुए बताया कि मुंबई के शुरुआती दिनों में एक ऐसा वक्त भी आया जब वे लगातार तीन दिनों तक एक दाने के लिए तरसते रहे। जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी और मांगने के लिए कोई अपना नहीं था। भूख की तड़प जब बर्दाश्त से बाहर हो जाती थी, तो वे दादर, माहिम और बांद्रा की सड़कों पर भटकते हुए सार्वजनिक नलों से पानी पीकर अपना पेट भरते थे ताकि किसी तरह होश में रह सकें।

उन्होंने याद करते हुए कहा कि भूख इंसान के आत्मसम्मान और चेतना को इस कदर तोड़ देती है कि सामने रखे खाने के टुकड़े के अलावा दुनिया की हर चीज बेमानी लगने लगती है। तीसरे दिन जब भूख के मारे उनके पैर कांपने लगे और चक्कर आने लगे, तो उन्हें लगा कि शायद वे इसी शहर की किसी गुमनाम सड़क पर दम तोड़ देंगे। उसी दौरान किस्मत से एक पुराने परिचित से मुलाकात हुई, जिसने उन्हें भरपेट खाना खिलाया। जावेद साहब आज भी कहते हैं कि उस दिन उस रोटी का जो स्वाद था, उसने उन्हें जिंदगी भर भूख की कीमत और अन्न का सम्मान करना सिखाया।

कमानी कॉरिडोर और स्टूडियो के स्टोर रूम में कटीं बेघर रातें

मायानगरी मुंबई अपने सपनों के लिए जितनी खूबसूरत है, अपनों के बिना यह उतनी ही बेरहम और अजनबी साबित होती है। जावेद अख्तर के पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था। कई हफ्तों तक वे दादर के पास कमानी कॉरिडोर के खुले बरामदों, बस स्टॉप के बेंचों और उपनगरीय रेलवे स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर अखबार बिछाकर सोते रहे। बारिश और ठंड के मौसम में जब पुलिस वाले या चौकीदार वहां से भगा देते थे, तो वे रात-रात भर जागकर सड़कों पर पैदल चलते रहते थे।

इसके बाद उन्हें फिल्म सिटी और उपनगरीय स्टूडियोज के चक्कर काटते हुए किसी तरह कमाल अमरोही के 'कमालस्तान स्टूडियो' और 'रूप तारा स्टूडियो' में छोटी-मोटी नौकरियां मिलीं। वहां वे क्लैप बॉय और असिस्टेंट के रूप में 50 से 100 रुपये महीने पर काम करने लगे। उनके पास सोने की जगह नहीं थी, इसलिए वे स्टूडियो के उस स्टोर रूम में सो जाया करते थे जहां कॉस्ट्यूम, पुरानी तलवारें और झाड़ू-पोछे रखे जाते थे। उस तंग और सीलन भरे कमरे में जब रात को लाइट चली जाती थी, तो वे खिड़की से आने वाली शहर की रोशनी को देखकर अपनी डायरी में कविताएं और कहानियां लिखा करते थे।

'सरहदी लुटेरा' के सेट पर सलीम खान से मुलाकात और सिनेमाई क्रांति

अंधेरी रातों के इसी दौर में जावेद अख्तर की मुलाकात अभिनेता और लेखक सलीम खान से फिल्म 'सरहदी लुटेरा' के सेट पर हुई। सलीम खान उस समय अभिनय कर रहे थे और संवाद लेखन में भी रुचि रखते थे, जबकि जावेद अख्तर वहां बतौर सहायक संवाद ठीक करने का काम कर रहे थे। दोनों ने महसूस किया कि उनके विचारों की धार और सिनेमा को देखने का नजरिया बिल्कुल एक जैसा है। यहीं से भारतीय सिनेमा के सबसे ताकतवर और सफल लेखक-द्वय 'सलीम-जावेद' की नींव पड़ी।

सलीम-जावेद की जोड़ी ने 1970 के दशक में हिंदी सिनेमा का व्याकरण ही बदल कर रख दिया। उन्होंने उस दौर के समाज में पनप रहे आक्रोश, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को पहचानते हुए 'एंग्री यंग मैन' का एक ऐसा अमर किरदार गढ़ा, जिसने अमिताभ बच्चन को सदी का महानायक बना दिया। 'जंजीर', 'दीवार', 'शोले', 'डॉन', 'त्रिशूल', 'काला पत्थर' और 'यादों की बारात' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया।

यह सलीम-जावेद की ही जिद थी जिसने भारतीय सिनेमा में पहली बार लेखकों को पोस्टर पर हीरो जितना बड़ा नाम और अभिनेताओं से भी ज्यादा पारिश्रमिक दिलाने का क्रांतिकारी काम किया। जिस लेखक को कभी 20 पैसे के लिए तरसना पड़ा था, वही लेखक एक फिल्म की पटकथा के लिए लाखों रुपये फीस लेने वाला देश का पहला स्टार राइटर बन गया।

ग्वालियर और लखनऊ की नफासत से मुंबई के तख्त तक की प्रेरणा

जावेद अख्तर का ताल्लुक एक बेहद समृद्ध साहित्यिक घराने से रहा है। उनके पिता जां निसार अख्तर और दादा मुजतर खैराबादी उर्दू शायरी के बड़े स्तंभ थे। हालांकि, पारिवारिक विवादों और अपनी शर्तों पर जीने की जिद के कारण उन्होंने किसी की सिफारिश या आर्थिक मदद लेने से साफ मना कर दिया था। वे अपनी पहचान अपने दम पर बनाना चाहते थे।

आज जब जावेद अख्तर मुंबई के जुहू स्थित अपने आलीशान बंगले में बैठकर उन 20 पैसों के दिनों को याद करते हैं, तो उनके चेहरे पर कोई कड़वाहट नहीं, बल्कि एक गहरी कृतज्ञता नजर आती है। वे मानते हैं कि उन संघर्षों, उस भूख और फुटपाथ की उस तपन ने ही उनकी कलम को वो धार दी जिससे वे 'दीवार' का 'विजय' और 'शोले' का 'गब्बर' लिख सके।

जावेद अख्तर की यह जीवन यात्रा देश के लाखों-करोड़ों उन नौजवानों के लिए एक जलती हुई मशाल है जो छोटे शहरों और गांवों से जेब में चंद रुपये और आंखों में बड़े सपने लेकर महानगरों में संघर्ष करने आते हैं। उनका यह बेबाक संस्मरण यह सिखाता है कि चाहे हालात कितने भी बदतर क्यों न हों, यदि इंसान अपनी प्रतिभा और ईमानदारी से समझौता न करे, तो वक्त का बड़े से बड़ा पहिया भी उसके कदमों में झुकने पर मजबूर हो जाता है।