'अगर आज के दौर में मैंने ऑटो-ट्यून का इस्तेमाल नहीं किया तो लोग समझेंगे मुझे गाना ही नहीं आता...', आधुनिक संगीत और नकली सुरों पर सोनू निगम का बड़ा बयान

'अगर आज के दौर में मैंने ऑटो-ट्यून का इस्तेमाल नहीं किया तो लोग समझेंगे मुझे गाना ही नहीं आता...', आधुनिक संगीत और नकली सुरों पर सोनू निगम का बड़ा बयान

भारतीय संगीत जगत में जब भी मधुर आवाज, असाधारण रेंज और शास्त्रीय गायकी के अनुशासन की बात होती है, तो पद्मश्री सोनू निगम का नाम सबसे पहली पंक्ति में आता है। 90 के दशक से लेकर आज के डिजिटल युग तक अपनी जादुई आवाज से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले सोनू निगम केवल अपने गानों के लिए ही नहीं, बल्कि संगीत की पवित्रता और इंडस्ट्री के मुद्दों पर अपने बेबाक बयानों के लिए भी जाने जाते हैं। हाल ही में एक इंटरव्यू और संगीत परिचर्चा के दौरान सोनू निगम ने आधुनिक दौर में गानों की रिकॉर्डिंग, अत्यधिक डिजिटल प्रोसेसिंग और 'ऑटो-ट्यून' के अंधाधुंध इस्तेमाल पर ऐसा तीखा व्यंग्य किया है जिसने पूरे संगीत उद्योग को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सोनू निगम ने तंज कसते हुए कहा कि आज के दौर में संगीत का पैमाना इतना कृत्रिम हो चुका है कि अगर कोई मंझा हुआ गायक पूरी तरह प्राकृतिक और बिना किसी सॉफ्टवेयर की मदद के गाए, तो शायद आज की डिजिटल पीढ़ी और कुछ निर्माता यह समझ बैठेंगे कि उसे ठीक से सुर लगाना ही नहीं आता।

ऑटो-ट्यून की अंधी दौड़ और सोनू निगम का तीखा तंज

सोनू निगम ने आधुनिक स्टूडियो रिकॉर्डिंग की कार्यप्रणाली पर खुलकर बात करते हुए बताया कि कैसे आज के समय में प्राकृतिक आवाज और सुरों की स्वाभाविक बारीकियों (माइक्रो-टोन्स) को सॉफ्टवेयर के जरिए जबरन 'परफेक्ट' बनाने की कोशिश की जाती है। जब कोई गायक पूरी शिद्दत और भावुकता के साथ गाता है, तो उसमें गले की स्वाभाविक हरकतें और सुरों का सूक्ष्म उतार-चढ़ाव होता है, जो गाने को मानवीय और जीवंत बनाता है।

सोनू निगम के अनुसार, आज के श्रोताओं और म्यूजिक प्रड्यूसर्स के कान कंप्यूटर जनित 'पिच-परफेक्ट' आवाज सुनने के इतने आदी हो चुके हैं कि उन्हें असली इंसानी आवाज में आने वाली हल्की सी स्वाभाविक थिरकन भी बेसुरी लगने लगती है। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि आज अगर वे अपने पूरे शास्त्रीय नियंत्रण के साथ बिना किसी पिच करेक्शन सॉफ्टवेयर के गाएं, तो लोग कहेंगे कि सुर भटक गया है। यह विडंबना दर्शाती है कि तकनीक ने हमारी सुनने की समझ को किस हद तक रोबोटिक और सतही बना दिया है।

वर्षों का कड़ा रियाज बनाम कंप्यूटर का चंद सेकंड का जादू

सोनू निगम ने उस दौर को याद किया जब प्लेबैक सिंगिंग में आने के लिए वर्षों तक उस्तादों के पास बैठकर सुबह के चार बजे से रियाज करना पड़ता था। मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, किशोर कुमार और मन्ना डे जैसे दिग्गजों के दौर में स्टूडियो में 100-100 म्यूजिशियन एक साथ लाइव रिकॉर्डिंग करते थे। अगर एक गायक या किसी साजिंदे से छोटी सी भी गलती हो जाती थी, तो पूरा गाना दोबारा शुरू से रिकॉर्ड करना पड़ता था। उस समय गायकी में गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती थी और वही लोग टिक पाते थे जिनके पास असली हुनर होता था।

आज के समय में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत हो चुकी है। आधुनिक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में अब किसी व्यक्ति को सुरीला होने की जरूरत नहीं रह गई है। कोई भी साधारण आवाज वाला व्यक्ति माइक के सामने कुछ पंक्तियां गुनगुना देता है, और फिर साउंड इंजीनियर ऑटो-ट्यून, मेलोडाइन और अन्य पिच-करेक्शन सॉफ्टवेयर्स की मदद से उसकी बेसुरी आवाज को बिल्कुल सटीक सुर में बदल देते हैं। सोनू निगम का मानना है कि इस शॉर्टकट ने संगीत की साधना और वर्षों के समर्पण के मोल को बहुत कम कर दिया है।

स्टूडियो की नकली चमक और लाइव कॉन्सर्ट में खुलती पोल

सोनू निगम ने इस बात को भी स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि स्टूडियो में सॉफ्टवेयर के दम पर रातों-रात 'स्टार सिंगर' बन जाने वाले कलाकारों की असली परीक्षा तब होती है जब उन्हें हजारों दर्शकों के सामने लाइव स्टेज पर बिना किसी प्री-रिकॉर्डेड ट्रैक के गाना पड़ता है। जब भारी भरकम कॉन्सर्ट्स में लाइव माइक पर गाना होता है, तो वहां कोई कंप्यूटर या ऑटो-ट्यून प्लग-इन मदद करने नहीं आता।

यही कारण है कि आज कई तथाकथित ट्रेंडिंग सिंगर्स लाइव शोज में गाने के बजाय सिर्फ लिप-सिंक (गाना बजने पर होंठ हिलाना) करते हैं या फिर बैकग्राउंड में चल रहे ट्रैक पर चिल्लाकर समां बांधने की कोशिश करते हैं। सोनू निगम जैसे गायक, जो आज भी तीन-तीन घंटे के लाइव कॉन्सर्ट में बिना रुके, हर सुर को शुद्धता के साथ गाते हैं, वे यह साबित करते हैं कि असली हुनर को कभी किसी मशीन की बैसाखी की आवश्यकता नहीं होती। लाइव मंच पर जो रूहानियत और कनेक्शन एक सच्चा गायक बना सकता है, वह कोई सॉफ्टवेयर कभी पैदा नहीं कर सकता।

क्या भारतीय संगीत से गायब हो रही है मेलोडी और मानवीय संवेदना?

सोनू निगम ने भारतीय संगीत के बदलते मिजाज पर चिंता जताते हुए कहा कि तकनीक का उद्देश्य संगीत को बेहतर बनाना होना चाहिए था, न कि संगीत की आत्मा को ही खत्म कर देना। पुराने गानों को जब आज भी सुना जाता है, तो आंखों में आंसू आ जाते हैं या दिल में एक अजीब सा सुकून मिलता है, क्योंकि उन गानों में गायकों का दर्द, खुशी और सच्ची भावनाएं रिकॉर्ड हुई थीं।

आजकल के गानों में सुर तो गणितीय रूप से एकदम सीधे और सपाट होते हैं, लेकिन उनमें दिल को छूने वाली संवेदना और दर्द गायब रहता है। जब आवाज को रोबोटिक बना दिया जाता है, तो वह कान को कुछ समय के लिए आकर्षक लग सकती है, लेकिन वह किसी के दिल में दशकों तक जिंदा नहीं रह सकती। सोनू निगम का मानना है कि जब तक संगीत में इंसानी अहसास और मौलिकता नहीं लौटेगी, तब तक आज के गाने अमर नहीं बन पाएंगे।

नई पीढ़ी के उभरते गायकों के लिए सोनू निगम का अहम संदेश

अपने इस बेबाक विश्लेषण के साथ ही सोनू निगम ने नई पीढ़ी के महत्वाकांक्षी गायकों को एक बहुत ही महत्वपूर्ण सलाह भी दी। उन्होंने कहा कि तकनीक से डरने या उसका विरोध करने की जरूरत नहीं है, तकनीक एक बेहतरीन साधन है, लेकिन उसे साध्य नहीं मानना चाहिए। युवाओं को यह नहीं सोचना चाहिए कि वे बिना रियाज और संगीत की तालीम लिए केवल सॉफ्टवेयर के भरोसे एक महान गायक बन सकते हैं।

सोनू निगम ने कहा कि यदि आप वास्तव में संगीत की दुनिया में एक लंबी और सम्मानित पारी खेलना चाहते हैं, तो शास्त्रीय संगीत की जड़ों को पकड़ें, रागों की समझ विकसित करें और अपने गले को तराशने में वक्त लगाएं। तकनीक आती-जाती रहेगी, नए सॉफ्टवेयर्स बदलते रहेंगे, लेकिन आपकी असली आवाज की ताकत और साधना हमेशा आपके साथ रहेगी। सोनू निगम का यह बयान भारतीय संगीत उद्योग के लिए एक आईने की तरह है, जो यह याद दिलाता है कि असली कला को किसी शॉर्टकट से नहीं, बल्कि केवल तपस्या से ही हासिल किया जा सकता है।