साउथ सिनेमा के विजनरी डायरेक्टर का 94 वर्ष की उम्र में निधन, 1991 में 'आदित्य 369' बनाकर भारतीय पर्दे पर रचा था टाइम ट्रैवल का इतिहास

साउथ सिनेमा के विजनरी डायरेक्टर का 94 वर्ष की उम्र में निधन, 1991 में 'आदित्य 369' बनाकर भारतीय पर्दे पर रचा था टाइम ट्रैवल का इतिहास

भारतीय सिनेमा ने अपने सबसे प्रयोगधर्मी, साहसी और दूरदर्शी रचनाकारों में से एक को हमेशा के लिए खो दिया है। साउथ सिनेमा के दिग्गज फिल्ममेकर का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं के चलते उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके जाने की खबर सामने आते ही हैदराबाद के फिल्म नगर से लेकर चेन्नई के कोडंबक्कम और मुंबई के बॉलीवुड गलियारों तक सन्नाटा छा गया है। सिनेमा जगत के अभिनेता, निर्देशक, लेखक और करोड़ों सिनेप्रेमी सोशल मीडिया पर अपनी भीगी पलकों के साथ इस महान कला साधक को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। वे केवल एक निर्देशक नहीं थे, बल्कि सिनेमाई भाषा की सीमाएं तोड़ने वाले एक वैज्ञानिक की तरह थे, जिन्होंने उस दौर में कैमरे के पीछे खड़े होकर ऐसे करिश्मे किए जिसकी कल्पना भी उस समय का आम दर्शक नहीं कर सकता था।

उनके पूरे सफर पर नजर डालें तो वे उन चुनिंदा निर्देशकों में शुमार रहे जिन्होंने कभी खुद को किसी एक भाषा, विधा या दायरे में कैद नहीं रखा। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और हिंदी हर प्रमुख भाषा में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले इस उस्ताद ने दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। उनका जाना सिनेमा की उस विचारशील पीढ़ी का विदा होना है जो तकनीक से पहले कहानी की आत्मा और रचनात्मक जोखिम को सबसे बड़ा हथियार मानती थी।

1991 में जब दुनिया देखती रह गई 'आदित्य 369' का टाइम मशीन चमत्कार

आज के आधुनिक दौर में जब करोड़ों रुपये का वीएफएक्स बजट और हॉलीवुड की तकनीक हाथ में होती है, तब भी टाइम ट्रैवल जैसी जटिल अवधारणा पर फिल्म बनाना आसान नहीं माना जाता। जरा सोचिए, आज से तीन दशक से भी पहले साल 1991 में उन्होंने 'आदित्य 369' जैसी ऐतिहासिक फिल्म बनाई थी। नंदमुरी बालकृष्ण अभिनीत यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में टाइम ट्रैवल विधा पर बनी पहली मुकम्मल और ब्लॉकबस्टर साइंस-फिक्शन फिल्म मानी जाती है। उस जमाने में बिना किसी आधुनिक कंप्यूटर ग्राफिक्स के केवल व्यावहारिक इफेक्ट्स, सटीक वैज्ञानिक तर्क, कालखंडों के शानदार सेट डिजाइन और अद्वितीय पटकथा के दम पर उन्होंने दर्शकों को भूतकाल के विजयनगर साम्राज्य से लेकर सुदूर भविष्य की एक काल्पनिक दुनिया तक की रोमांचक यात्रा करा दी थी।

यह उनकी बुद्धिमत्ता का ही प्रमाण था कि एक ओर जहां फिल्म में विज्ञान का गहरा आधार था, वहीं दूसरी ओर आम भारतीय दर्शक की भावनाओं और मनोरंजन का संतुलन भी अद्भुत था। 'आदित्य 369' केवल दक्षिण भारत ही नहीं, बल्कि समूचे भारतीय फिल्म इतिहास में एक मील का पत्थर बन गई। आज जब नई पीढ़ी के युवा निर्देशक टाइम लूप और मल्टीवर्स की बातें करते हैं, तो वे गर्व से इस 1991 की कालजयी कृति का उदाहरण देते हैं कि कैसे हमारे सिनेमा ने दशकों पहले ही समय के पहिए को पर्दे पर घुमा दिया था।

'पुष्पक' की मूक क्रांति से लेकर 'अप्पू राजा' के बौने किरदार का हैरतअंगेज जादू

उनकी प्रतिभा का फलक केवल साइंस फिक्शन तक सीमित नहीं था। वे एक ऐसे फिल्मकार थे जो प्रयोग करने से कभी नहीं हिचकिचाते थे। साल 1987 में रिलीज हुई उनकी ब्लैक कॉमेडी फिल्म 'पुष्पक' (पुष्पक विमानम) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सवाक सिनेमा के आने के दशकों बाद उन्होंने बिना किसी संवाद वाली एक मूक फिल्म बनाई, जिसमें कमल हासन और अमला ने अभिनय किया था। बिना एक भी शब्द बोले पूरी फिल्म दर्शकों को हंसाती रही, रुलाती रही और समाज की कड़वी सच्चाइयों का आईना दिखाती रही। यह अपने आप में एक वैश्विक स्तर का साहसिक कदम था, जिसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में अपार सराहना मिली।

कमल हासन के साथ उनकी जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को ऐसे रत्न दिए जिनकी मिसाल आज भी दी जाती है। 1989 की क्लासिक फिल्म 'अपूर्व सगोधरर्गल' (हिंदी में 'अप्पू राजा') में जब कमल हासन ने एक सर्कस के बौने जोकर का किरदार निभाया, तो उस समय कोई डिजिटल एडिटिंग तकनीक उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने व्यावहारिक लेंस ट्रिक्स, जमीन में गड्ढे खोदने और विशेष कोणों से शूटिंग करने जैसी विशुद्ध कैमरा तकनीकों का इस्तेमाल करके उस किरदार को स्क्रीन पर जीवंत बना दिया था। दर्शक हैरान रह गए थे कि एक सामान्य कद का अभिनेता स्क्रीन पर पूरी स्वाभाविकता के साथ बौना कैसे दिखाई दे रहा है। इसके अलावा 'माइकल मदना कामा राजन' जैसी कॉमेडी ऑफ एरर्स और सुधा चंद्रन के वास्तविक जीवन संघर्ष पर आधारित 'मयूरी' जैसी प्रेरणादायक फिल्म उनके निर्देशन की असीम गहराई को बयां करती हैं।

चेन्नई से हैदराबाद तक शोक की लहर और सिनेमाई हस्तियों के नमन

जैसे ही उनके निधन का समाचार प्रसारित हुआ, दक्षिण भारत के तमाम बड़े प्रोडक्शन हाउस और कलाकारों के बीच मातम पसर गया। हैदराबाद और चेन्नई के स्टूडियोज में काम कर रहे तकनीशियन और निर्देशक स्तब्ध रह गए। चिरंजीवी, कमल हासन, रजनीकांत, बालकृष्ण, जूनियर एनटीआर और नागार्जुन समेत कई शीर्ष अभिनेताओं ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय सिनेमा ने अपना एक पथप्रदर्शक खो दिया है। वे नए निर्देशकों के लिए एक चलते-फिरते विश्वविद्यालय की तरह थे, जिनसे मिलने पर हमेशा सिनेमा की तकनीकी बारीकियों और कहानी कहने के नए अंदाज का ज्ञान मिलता था।

लोकल फिल्म चैंबर और आर्टिस्ट एसोसिएशनों ने उनकी स्मृति में विशेष सभाएं आयोजित करने की घोषणा की है। चेन्नई में उनके अंतिम दर्शन के लिए कला जगत के गणमान्य लोगों का तांता लगा हुआ है। उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि उस अनूठे स्कूल ऑफ सिनेमा का मौन हो जाना है जहां बजट की कमी को कभी सोच की कमी नहीं बनने दिया जाता था।

आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ गए कभी न मिटने वाली विरासत

94 वर्ष की एक भरी-पूरी और सार्थक उम्र जीने के बाद यह विजनरी फिल्ममेकर भले ही दुनिया को अलविदा कह गए हों, लेकिन उनकी रची हुई कहानियां, उनके कैमरे के प्रयोग और उनकी रचनात्मक सोच हमेशा जीवित रहेगी। उन्होंने यह साबित किया कि भारतीय कहानियों में वह दम है जो हॉलीवुड की बड़ी से बड़ी कल्पनाओं को अपनी देसी मिट्टी के साथ टक्कर दे सकती हैं। उनकी 'आदित्य 369' आज भी ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और यूट्यूब पर युवा पीढ़ी द्वारा उतनी ही उत्सुकता से देखी जाती है जितनी वह रिलीज के दिन देखी गई थी।

सिनेमा के इतिहास में जब भी भारतीय साइंस फिक्शन, साइलेंट ब्लैक कॉमेडी या तकनीकी नवाचारों का जिक्र होगा, उनका नाम सबसे पहले स्वर्णिम अक्षरों में लिया जाएगा। उनका जीवन हर उस युवा फिल्ममेकर के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा जो सीमित संसाधनों में भी आसमान छूने वाले सपने देखने की हिम्मत रखता है। भारतीय सिनेमा अपने इस महान शिल्पी को हमेशा कृतज्ञता और असीम सम्मान के साथ याद रखेगा।