जब सलमान खान से 9 साल छोटी एक्ट्रेस ने निभाया उनकी मां का किरदार, बोलीं- 'रोल के लिए बेहद झिझक रही थी'
हिंदी सिनेमा में उम्र के फासले और किरदारों के चुनाव को लेकर हमेशा से दिलचस्प और हैरान करने वाले किस्से सामने आते रहे हैं। बड़े पर्दे पर अक्सर देखा गया है कि जहां लीड एक्टर्स अपनी असल उम्र से काफी छोटे किरदारों को आसानी से निभा लेते हैं, वहीं महिला कलाकारों को अपने समकालीन या अपने से बड़े अभिनेताओं की मां या भाभी का किरदार निभाने की अजीबोगरीब स्थिति का सामना करना पड़ता है। ऐसा ही एक अविश्वसनीय और चर्चित वाकया बॉलीवुड के 'दबंग' सलमान खान और मंझी हुई अदाकारा शेफाली शाह से जुड़ा है। आज डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सिनेमाघरों में अपनी गंभीर अदाकारी का डंका बजाने वाली शेफाली शाह जब अपने करियर के शुरुआती दौर में थीं, तब उन्होंने सलमान खान से उम्र में 9 साल छोटी होने के बावजूद पर्दे पर उनकी सौतेली मां का रोल निभाया था। हाल ही में इस फैसले को याद करते हुए अभिनेत्री ने खुद खुलासा किया कि वह इस किरदार को स्वीकार करने में कितनी असहज और झिझक महसूस कर रही थीं।
सलमान से 9 साल छोटी शेफाली और फिल्म का वो अजीब संयोग
यह दिलचस्प वाकया साल 1998 में आई निर्देशक सोहेल खान की सुपरहिट रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म 'जब प्यार किया तो डरना क्या' या फिर निर्देशक विपुल शाह की फिल्म 'वक्त' जैसे दौर के इर्द-गिर्द का है, जहां शेफाली ने सलमान और अक्षय कुमार जैसे बड़े अभिनेताओं के साथ उम्र के इस अजीब गणित का सामना किया था। असल जिंदगी में सलमान खान का जन्म 1965 में हुआ था, जबकि शेफाली शाह का जन्म जुलाई 1973 में हुआ। यानी शेफाली उम्र में सलमान खान से लगभग 9 साल छोटी हैं। इसके बावजूद पर्दे पर कहानी की मांग और कास्टिंग के अजीब फैसलों के चलते शेफाली को सलमान खान की मां के रूप में पेश किया गया। जब यह रोल पहली बार उनके सामने आया, तो वह खुद अपनी हंसी और हैरानी नहीं रोक पाई थीं। उस समय वह अपने करियर को एक दिशा देने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन बॉलीवुड के टाइपकास्टिंग ढर्रे ने उन्हें अपने से बड़े हीरो की मां बनाने में जरा भी देर नहीं लगाई।
'मैं बहुत ज्यादा झिझक रही थी'- शेफाली शाह ने बयां किया अपना दर्द
अपने एक साक्षात्कार में इस अजीबोगरीब अनुभव को साझा करते हुए शेफाली शाह ने बेहद ईमानदारी से अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि जब उन्हें यह किरदार ऑफर हुआ था, तो उनके मन में बहुत बड़ा द्वंद्व चल रहा था। शेफाली ने कहा, "ईमानदारी से कहूं तो मैं उस वक्त बहुत ज्यादा झिझक रही थी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपने से उम्र में काफी बड़े अभिनेता की मां का रोल कैसे स्वीकार कर सकती हूं। उस वक्त इंडस्ट्री में एक बार अगर आपने किसी बड़े हीरो की मां का किरदार निभा लिया, तो लोग आपको हमेशा के लिए उसी सांचे में ढाल देते थे। मेरे अंदर यह डर समाया हुआ था कि कहीं मेरा पूरा करियर सिर्फ मां और चाची के किरदारों तक ही सीमित होकर न रह जाए।" शेफाली ने बताया कि काफी सोच-विचार और स्क्रिप्ट की गहराई को देखने के बाद उन्होंने आखिरकार भारी मन और झिझक के साथ उस चुनौती को स्वीकार किया था।
बॉलीवुड में फीमेल एक्टर्स की टाइपकास्टिंग और उम्र का दोहरा मापदंड
शेफाली शाह का यह किस्सा केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बॉलीवुड इंडस्ट्री में दशकों से चले आ रहे उस गहरे पूर्वाग्रह को भी उजागर करता है जहां अभिनेत्रियों की उम्र को लेकर दोहरा पैमाना अपनाया जाता रहा है। एक तरफ जहां 50 और 60 की उम्र पार कर चुके मेल सुपरस्टार्स अपने से आधी उम्र की युवा अभिनेत्रियों के साथ रोमांस करते नजर आते हैं, वहीं दूसरी तरफ 20 और 30 साल की प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों को मां, बड़ी बहन या भाभी के सांचे में कैद कर दिया जाता था। शेफाली शाह के साथ भी यही हुआ; 2005 की फिल्म 'वक्त: द रेस अगेंस्ट टाइम' में भी उन्होंने अक्षय कुमार की मां का रोल निभाया था, जबकि अक्षय कुमार भी उनसे उम्र में कई साल बड़े थे। अमिताभ बच्चन के अपोजिट पत्नी और अक्षय की मां बनने वाली शेफाली उस समय महज 32-33 साल की थीं, जो इस बात का बड़ा सुबूत था कि इंडस्ट्री किरदारों की कास्टिंग में कितनी गैर-जिम्मेदाराना रही है।
ओटीटी ने बदला दौर, अब शेफाली को मिला उनका असली हक
वक्त का पहिया घूमा और सिनेमाई दुनिया में जब डिजिटल माध्यमों यानी ओटीटी का आगमन हुआ, तब जाकर शेफाली शाह जैसी सशक्त अभिनेत्रियों को उनकी प्रतिभा के अनुरूप लीड और दमदार रोल्स मिलने शुरू हुए। 'दिल्ली क्राइम' की डीसीपी वर्तिका चतुर्वेदी बनकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एमी अवॉर्ड जीतकर दुनिया भर में भारत का मान बढ़ाया। इसके अलावा 'डार्लिंग्स', 'जलसा' और 'ह्युमन' जैसे प्रोजेक्ट्स में उन्होंने यह साबित कर दिया कि उम्र और ग्लैमर के बजाय जब कहानी और अभिनय को तरजीह दी जाती है, तो जादू पैदा होता है। आज जब शेफाली शाह अपने पुराने किरदारों और सलमान खान की मां बनने के उस दौर को मुड़कर देखती हैं, तो वह इसे एक सीख और अनुभव मानती हैं। उनका मानना है कि अब का भारतीय सिनेमा बहुत बदल चुका है और आज की अभिनेत्रियों को ऐसे असहज समझौतों का शिकार नहीं होना पड़ता।