भारत में हर साल 1.9 लाख कैंसर मामलों के पीछे छिपा है खतरनाक इन्फेक्शन; लैंसेट की चौंकाने वाली रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
विश्व के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट' (The Lancet) में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय शोध अध्ययन ने भारत में कैंसर के बढ़ते खतरे को लेकर एक बेहद चिंताजनक और आंखें खोल देने वाला सच सामने रखा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल दर्ज होने वाले कुल कैंसर मामलों में से लगभग 1.9 लाख मामले सीधे तौर पर विभिन्न प्रकार के संक्रामक रोगाणुओं—जैसे वायरस, बैक्टीरिया और पैरासाइट्स—के पुराने इन्फेक्शन से जुड़े हुए हैं। अब तक आम जनमानस में यही धारणा रही है कि कैंसर का मुख्य कारण केवल तंबाकू, धूम्रपान, खराब जीवनशैली, शराब या आनुवंशिक विकृतियां हैं। हालांकि, लैंसेट के इस व्यापक वैज्ञानिक विश्लेषण ने साबित कर दिया है कि शरीर में वर्षों तक अनसुलझे रहने वाले सूक्ष्म जीवाणु और विषाणु डीएनए को क्षतिग्रस्त कर कैंसर कोशिकाओं को जन्म देने में बहुत बड़ा रोल निभा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि विकासशील देशों, विशेष रूप से भारत जैसे घनी आबादी वाले देशों में, सार्वजनिक स्वच्छता की कमी, सुरक्षित पेयजल के अभाव, टीकाकरण को लेकर कम जागरूकता और नियमित स्वास्थ्य जांच न कराने की आदत के कारण ये संक्रामक तत्व शरीर में चुपचाप अपनी जड़ें जमा लेते हैं। कई मामलों में पीड़ित व्यक्ति को वर्षों तक किसी गंभीर लक्षण का अहसास ही नहीं होता, लेकिन भीतर ही भीतर चल रही क्रॉनिक सूजन (Chronic Inflammation) अंततः जानलेवा ट्यूमर का रूप धारण कर लेती है।
एचपीवी, हेपेटाइटिस और एच. पाइलोरी: कैंसर पैदा करने वाले प्रमुख संक्रामक कारक
लैंसेट के अध्ययन में उन प्रमुख रोगाणुओं की पहचान की गई है, जो देश में संक्रमण जनित कैंसर (Infection-Attributable Cancers) के लगभग 90 प्रतिशत से अधिक मामलों के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार पाए गए हैं। इनमें सबसे पहला और सबसे खतरनाक नाम ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) का है। भारत में महिलाओं में होने वाले सर्वाइकल कैंसर (गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर) के लगभग सभी मामलों के पीछे एचपीवी का हाई-रिस्क स्ट्रेन ही मुख्य कारण होता है। इसके अलावा, एचपीवी वायरस ओरल कैंसर, गले के कैंसर और गुदा मार्ग के कैंसर का भी एक बड़ा कारक बनता जा रहा है।
दूसरा सबसे बड़ा खतरा 'हेपेटाइटिस बी' और 'हेपेटाइटिस सी' (Hepatitis B & C) वायरस से उत्पन्न हो रहा है। दूषित सुइयों, असुरक्षित रक्ताधान या असुरक्षित शारीरिक संपर्क के जरिए फैलने वाले ये वायरस लिवर में पहुंचकर क्रॉनिक सिरोसिस पैदा करते हैं, जो आगे चलकर लिवर कैंसर (Hepatocellular Carcinoma) में बदल जाता है। तीसरे बड़े कारक के रूप में 'हेलिकोबैक्टर पाइलोरी' (Helicobacter pylori यानी H. pylori) बैक्टीरिया को चिन्हित किया गया है। यह बैक्टीरिया दूषित पानी और अधपके भोजन के जरिए आमाशय में प्रवेश करता है। यदि पेट में बार-बार एसिडिटी, अल्सर या गैस्ट्राइटिस की अनदेखी की जाए, तो एच. पाइलोरी समय के साथ पेट के कैंसर (Gastric Cancer) का प्राथमिक कारण बन जाता है। इसके अलावा एपस्टीन-बार वायरस (EBV) जैसे वायरस भी लिम्फोमा और नेसोफेरींजल कैंसर से जुड़े पाए गए हैं।
समय पर टीकाकरण और शुरुआती जांच से रोके जा सकते हैं लाखों कैंसर के मामले
लैंसेट की इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण और राहत देने वाला पहलू यह है कि संक्रमण से जुड़े कैंसर काफी हद तक रोके जा सकते हैं (Preventable Cancers)। चिकित्सा विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि देश में प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर मजबूत कदम उठाए जाएं, तो हर साल हजारों जिंदगियों को अकाल मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सकता है। सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए 9 से 14 वर्ष की किशोरियों को एचपीवी वैक्सीन (HPV Vaccination) लगाना एक अचूक सुरक्षा कवच साबित हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी व्यापक टीकाकरण की पुरजोर सिफारिश कर रहा है ताकि सर्वाइकल कैंसर का पूरी तरह उन्मूलन किया जा सके।
इसी तरह, नवजात शिशुओं को जन्म के तुरंत बाद हेपेटाइटिस बी का टीका लगवाना अनिवार्य होना चाहिए, जिससे लिवर संक्रमण का खतरा लगभग शून्य हो जाता है। वहीं वयस्कों के लिए हेपेटाइटिस सी की प्रभावी एंटीवायरल दवाएं अब बेहद किफायती दरों पर उपलब्ध हैं, जो वायरस को शरीर से पूरी तरह समाप्त कर लिवर कैंसर के जोखिम को खत्म कर देती हैं। पेट में लंबे समय से रहने वाले अल्सर या अपच के लक्षणों पर डॉक्टर की सलाह लेकर एच. पाइलोरी का साधारण एंटीबायोटिक कोर्स करवाना पेट के कैंसर को जन्म लेने से पहले ही रोक सकता है। महिलाओं के लिए 30 वर्ष की आयु के बाद नियमित 'पैप स्मीयर' (Pap Smear) या एचपीवी डीएनए टेस्ट कराना बीमारी को शुरुआती और पूरी तरह ठीक होने वाली अवस्था में पकड़ने के लिए सबसे कारगर माध्यम है।