पुरुषों में भी चुपके से हड्डियां खोखली कर रहा साइलेंट किलर; मामूली झटके से फ्रैक्चर का खतरा
स्वास्थ्य और चिकित्सा जगत में हड्डियों की मजबूती को लेकर समाज में कई तरह के भ्रामक मिथक लंबे समय से चले आ रहे हैं। जब भी हड्डियों के कमजोर होने, ऑस्टियोपोरोसिस या हड्डियों के खोखलेपन की बात सामने आती है, तो आम धारणा यही बन जाती है कि यह बीमारी केवल महिलाओं की समस्या है, जो विशेष रूप से रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) के बाद हार्मोनल बदलावों के चलते पनपती है। लेकिन ऑर्थोपेडिक सर्जन और वरिष्ठ स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस सोच को पूरी तरह खारिज करते हुए पुरुषों के लिए गंभीर चेतावनी जारी की है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ऑस्टियोपोरोसिस पुरुषों को भी उतनी ही तेजी, क्रूरता और खामोशी से अपना शिकार बनाता है जितना कि महिलाओं को। पुरुषों में इस बीमारी को लेकर जागरूकता का भारी अभाव और लंबे समय तक इसकी अनदेखी करना जानलेवा साबित हो सकता है। यह बीमारी पुरुषों की हड्डियों के आंतरिक घनत्व यानी बोन मिनरल डेंसिटी (BMD) को धीरे-धीरे खत्म कर देती है, जिससे किसी भारी दुर्घटना के बिना भी, महज एक हल्के झटके, छींकने या साधारण फिसलने से कूल्हे, कलाई या रीढ़ की हड्डी में गंभीर फ्रैक्चर हो जाता है।
'साइलेंट किलर' क्यों कहलाती है यह बीमारी: बिना किसी दर्द के भीतर से खोखला हो जाता है कंकाल
ऑस्टियोपोरोसिस का सबसे खतरनाक और भयावह पहलू यह है कि यह शरीर के भीतर बेहद धीमी गति से पनपता है और इसके कोई प्रारंभिक लक्षण या दर्द के संकेत नहीं मिलते। यही कारण है कि चिकित्सा विशेषज्ञ इसे 'साइलेंट थीफ' या 'साइलेंट किलर' कहते हैं। अधिकांश पुरुषों को तब तक इस बात का तनिक भी अहसास नहीं होता कि उनकी हड्डियां कमजोर हो चुकी हैं, जब तक कि वे किसी दिन अचानक बिस्तर से उठते समय, सीढ़ियां उतरते वक्त या बाथरूम में मामूली पैर फिसलने से दर्दनाक फ्रैक्चर का शिकार नहीं हो जाते। जब तक अस्पताल में एक्स-रे और डेक्सा स्कैन (DEXA Scan) होता है, तब तक हड्डियों का एक बड़ा हिस्सा अपनी ताकत खो चुका होता है। पुरुषों में हड्डियों की संरचना प्राकृतिक रूप से थोड़ी चौड़ी और मजबूत होने के बावजूद, 50 की उम्र के बाद बोन लॉस की यह प्रक्रिया तेजी से सक्रिय हो जाती है, जिसे यदि समय रहते न पहचाना जाए तो व्यक्ति चलने-फिरने से लाचार हो सकता है।
पुरुषों में ऑस्टियोपोरोसिस की अनदेखी के पीछे की बड़ी वजहें: टेस्टोस्टेरोन और खराब लाइफस्टाइल का खेल
पुरुषों में इस लाइलाज कही जाने वाली समस्या के नजरअंदाज होने की सबसे बड़ी वजह यह सामाजिक भ्रम है कि पुरुषों का शरीर स्वभाव से ही मजबूत होता है और उन्हें हड्डियों की जांच की जरूरत नहीं होती। हालांकि, जीवविज्ञान के अनुसार 50 वर्ष की आयु के बाद पुरुषों के शरीर में प्राथमिक पुरुष हार्मोन 'टेस्टोस्टेरोन' (Testosterone) का स्तर प्राकृतिक रूप से गिरने लगता है। टेस्टोस्टेरोन हड्डियों की कोशिकाओं (ओस्टियोब्लास्ट्स) को मजबूत रखने में मुख्य भूमिका निभाता है, ऐसे में इसकी कमी होते ही हड्डियां अंदर से स्पंज की तरह भुरभुरी होने लगती हैं। इसके अलावा दैनिक खान-पान में कैल्शियम और विटामिन-डी की भारी कमी, धूप से दूरी, लगातार डेस्क जॉब के चलते शारीरिक निष्क्रियता, अत्यधिक धूम्रपान (स्मोकिंग) और शराब का नियमित सेवन पुरुषों की हड्डियों की सेहत को दीमक की तरह चाट जाता है। धूम्रपान शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को पूरी तरह बाधित कर देता है, जबकि अल्कोहल बोन फॉर्मेशन की क्षमता को सीधे तौर पर नष्ट करता है।
थायरॉइड, किडनी रोग और स्टेरॉयड दवाएं बढ़ा देती हैं जोखिम: 50 पार पुरुषों को रहना होगा सबसे ज्यादा सतर्क
जीवनशैली के अलावा कई पुरानी बीमारियां भी पुरुषों में समय से पहले ऑस्टियोपोरोसिस को जन्म देती हैं। जिन पुरुषों को लंबे समय से थायरॉइड विकार (हाइपरथायरायडिज्म), क्रोनिक किडनी डिजीज (गुर्दे की बीमारी), रूमेटाइड अर्थराइटिस या आंतों से जुड़ी पाचन समस्याएं हैं, उनके शरीर में खनिज तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है। इसके अलावा दमा (अस्थमा), त्वचा रोगों या ऑटोइम्यून समस्याओं के इलाज के लिए लंबे समय तक ली जाने वाली कॉर्टिकोस्टेरॉइड (Corticosteroid) दवाएं हड्डियों के घनत्व को तेजी से घोल देती हैं। ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों के अनुसार 50 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक पुरुष को अपनी हड्डियों की सेहत को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए। यदि परिवार में माता-पिता को हिप फ्रैक्चर का इतिहास रहा हो, या पहले कभी कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज चला हो, तो ऐसे पुरुषों में ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
बचाव ही है सबसे बड़ा सुरक्षा कवच: वेट बियरिंग एक्सरसाइज, सही डाइट और समय पर डेक्सा टेस्ट जरूरी
हड्डियों को जीवन भर फौलादी बनाए रखने और ऑस्टियोपोरोसिस के जानलेवा फ्रैक्चर से बचने के लिए बचाव और समय पर जांच ही सबसे कारगर उपाय है। सबसे पहले अपनी रोजमर्रा की डाइट में दूध, दही, पनीर, रागी, सोयाबीन, हरी पत्तेदार सब्जियां और नट्स जैसी कैल्शियम से भरपूर चीजों को अनिवार्य रूप से शामिल करें। शरीर में कैल्शियम तभी अवशोषित हो पाता है जब विटामिन-डी पर्याप्त मात्रा में हो, इसलिए सुबह की हल्की धूप में 15 से 20 मिनट जरूर बैठें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट्स लें। हड्डियों के घनत्व को बढ़ाने के लिए केवल चलना काफी नहीं है, बल्कि ब्रिस्क वॉक, सीढ़ियां चढ़ना, डंबल के साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और वेट बियरिंग एक्सरसाइज को अपने वर्कआउट का हिस्सा बनाएं। इसके साथ ही सिगरेट और शराब से पूरी तरह दूरी बनाएं। 50 की उम्र पार कर चुके पुरुषों को साल में एक बार अपनी हड्डियों की डेंसिटी जांचने के लिए 'डेक्सा स्कैन' (DEXA Bone Density Test) अवश्य कराना चाहिए, ताकि फ्रैक्चर का संकट आने से पहले ही हड्डियों को सही दवाओं और पोषण से मजबूत किया जा सके।