Para Asian Games: निषाद कुमार ने दो गोल्ड जीतकर रचा इतिहास

Para Asian Games: निषाद कुमार ने दो गोल्ड जीतकर रचा इतिहास

जापान के नागोया में चल रहे पांचवें एशियाई पैरा खेलों के एथलेटिक्स ट्रैक एंड फील्ड में भारतीय पैरा एथलीटों ने अपने असाधारण पराक्रम और मजबूत हौसले से इतिहास के पन्नों में नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। भारत के स्टार पैरा जम्पर निषाद कुमार ने पुरुषों की ऊंची कूद (हाई जंप) टी47 स्पर्धा में नया गेम्स रिकॉर्ड कायम करते हुए ऐतिहासिक स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इस शानदार जीत के साथ ही निषाद एक ही एशियाई पैरा खेलों के एक ही संस्करण में दो अलग-अलग स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतने वाले भारत के तीसरे पैरा एथलीट बनकर विशिष्ट एलीट क्लब में शामिल हो गए हैं। इससे पहले सोमवार को उन्होंने पुरुषों की लंबी कूद (लॉन्ग जंप) टी47 स्पर्धा में भी अपनी जबर्दस्त छलांग के दम पर गोल्ड मेडल अपने नाम किया था। लगातार दो दिनों में दो स्वर्ण जीतकर निषाद ने न केवल तिरंगे का मान सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाया है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पैरा खेलों में भारत के दबदबे को भी मजबूती से स्थापित किया है।

2.04 मीटर की स्वर्णिम छलांग और नया गेम्स रिकॉर्ड: अंकुर धामा और शीतल देवी के एलीट क्लब में निषाद

नागोया के एथलेटिक्स स्टेडियम में मंगलवार की शाम दर्शकों के रोमांच से भरी रही, जहां पुरुषों की टी47 हाई जंप स्पर्धा के फाइनल में निषाद कुमार ने अपने अविश्वसनीय खेल से सभी प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। उन्होंने 2.04 मीटर से अधिक की ऊंचाई को सफलतापूर्वक पार करके एशियाई पैरा खेलों का नया रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज कराया। इस दोहरी स्वर्णिम कामयाबी के साथ निषाद ने उन महान भारतीय दिग्गजों की सूची में अपना नाम दर्ज करा लिया है, जिन्होंने एक ही एशियाई पैरा खेलों में दो गोल्ड मेडल जीते हैं। निषाद से पहले यह अद्वितीय कीर्तिमान धावक अंकुर धामा ने हांगझू 2023 एशियाई पैरा खेलों में पुरुषों की 5000 मीटर टी11 और 1500 मीटर टी11 स्पर्धाओं में बनाया था। वहीं विश्व प्रसिद्ध भुजाहीन तीरंदाज शीतल देवी ने भी हांगझू में ही महिलाओं की व्यक्तिगत कंपाउंड ओपन और मिश्रित टीम कंपाउंड ओपन में दो स्वर्ण जीतकर यह इतिहास रचा था। अब निषाद कुमार का नाम भी इस गौरवशाली क्लब में जुड़ गया है, जिसने देश को गौरवान्वित किया है।

6 साल की उम्र में खोया था दाहिना हाथ: टी47 श्रेणी के नियमों और संघर्ष की प्रेरणादायक दास्तान

पैरा एथलेटिक्स की टी47 (T47) श्रेणी उन असाधारण खिलाड़ियों के लिए निर्धारित होती है जिनके ऊपरी अंगों यानी बाजुओं, कलाई या कोहनी के नीचे शारीरिक अक्षमता या विकार होता है। निषाद कुमार की यह स्वर्णिम यात्रा किसी रोंगटे खड़े कर देने वाले सिनेमाई संघर्ष से कम नहीं है। जब निषाद महज छह वर्ष के बालक थे, तभी एक दर्दनाक कृषि दुर्घटना में चारा काटने वाली मशीन (घास काटने की मशीन) की चपेट में आने से उनका दाहिना हाथ कट गया था। बचपन में लगे इस असहनीय शारीरिक और मानसिक आघात के बावजूद निषाद ने कभी अपनी किस्मत को कोसने में समय व्यर्थ नहीं किया। उनके परिजनों और कोच ने उनकी मजबूत इच्छाशक्ति को खेलों की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने हाई जंप और लॉन्ग जंप में दिन-रात पसीना बहाकर अपने शरीर के संतुलन को फिर से साधा। एक हाथ न होने के बावजूद हवा में शरीर के गुरुत्वाकर्षण और गति को नियंत्रित करना बेहद कठिन माना जाता है, लेकिन निषाद ने अपनी कठिन साधना से इस बाधा को अपनी सबसे बड़ी ताकत में तब्दील कर दिया।

भाला फेंक में भारत का दोहरा जलवा: प्रदीप कुमार को रजत और आयुष वर्मा ने जीता कांस्य

नागोया के मैदान से भारत के लिए दोहरी खुशी केवल जंपिंग पिट तक सीमित नहीं रही, बल्कि थ्रोइंग एरीना में भी भारतीय पैरा भाला फेंक (जैवलिन थ्रो) एथलीटों ने पोडियम पर अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई। पुरुषों की भाला फेंक एफ53/एफ54 संयुक्त श्रेणी स्पर्धा में भारत के प्रदीप कुमार ने लगातार दूसरे एशियाई पैरा खेलों में रजत पदक जीतकर अपनी निरंतरता की मिसाल पेश की। प्रदीप ने एफ54 वर्ग में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ व्यक्तिगत प्रदर्शन (पर्सनल बेस्ट) दर्ज करते हुए 27.45 मीटर की दूरी तक भाला फेंका और दूसरे स्थान के साथ सिल्वर मेडल सुरक्षित किया। इसी रोमांचक स्पर्धा में भारत के एक और युवा एथलीट आयुष वर्मा ने एफ53 वर्ग में सटीक थ्रो करते हुए कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। एक ही स्पर्धा में दो भारतीय तिरंगों का एक साथ पोडियम पर फहराना भारतीय पैरा एथलेटिक्स के सुनहरे दौर को रेखांकित करता है।

एफ53 और एफ54 श्रेणियों का तकनीकी वर्गीकरण: शारीरिक सीमाओं के बीच शक्ति और संतुलन का महामुकाबला

पैरा खेलों में खिलाड़ियों की निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय पैरालंपिक समिति ने शारीरिक अक्षमता के स्तर के आधार पर विस्तृत वर्गीकरण तय किए हैं। एफ53 श्रेणी के अंतर्गत आने वाले एथलीटों की बाजुओं, कंधों और हाथों में आमतौर पर पूरी कार्यक्षमता और ताकत होती है, लेकिन उनकी पेट की कोर मांसपेशियों (एब्डोमिनल मसल्स) और रीढ़ के निचले हिस्से (लोअर स्पाइन) की मांसपेशियों में कोई सक्रिय गतिविधि या तंत्रिका नियंत्रण नहीं होता है। इसके कारण वे बिना किसी बाहरी सहारे या व्हीलचेयर सपोर्ट के स्वतंत्र रूप से बैठ नहीं सकते, जिससे सारा थ्रो केवल कंधे और बांह के झटके से करना होता है। दूसरी ओर एफ54 श्रेणी के एथलीटों की बाजुओं की मांसपेशियां पूरी तरह से मजबूत होती हैं और उनके ऊपरी धड़ की मांसपेशियों में भी आंशिक से लेकर पूरी शक्ति मौजूद रहती है। हालांकि, उनके धड़ के निचले हिस्से और पैरों की गतिशीलता (लोअर बॉडी मूवमेंट) काफी हद तक बाधित रहती है। ऐसे जटिल शारीरिक ढांचे के बावजूद 27 मीटर से अधिक दूर भाला फेंकना खिलाड़ियों के फौलादी संकल्प और अत्यधिक तकनीकी नियंत्रण को दर्शाता है। निषाद, प्रदीप और आयुष की ये ऐतिहासिक उपलब्धियां आगामी वैश्विक पैरा प्रतियोगिताओं के लिए भारतीय दल के आत्मविश्वास को नई बुलंदियों पर ले जा रही हैं।