एशियाई पैरा खेल: नागोया में प्रवीण कुमार की स्वर्णिम छलांग
जापान के आईची-नागोया में आयोजित हो रहे पांचवें एशियाई पैरा खेलों में भारतीय पैरा एथलीटों ने अपने अदम्य साहस, असाधारण प्रतिभा और अटूट जीवटता के दम पर तिरंगे का परचम लहरा दिया है। पुरुषों की हाई जंप (ऊंची कूद) स्पर्धा में भारत के स्टार पैरा एथलीट प्रवीण कुमार ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बार फिर अपनी बादशाहत साबित करते हुए स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाया। उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर स्थित जेवर के गोविंदगढ़ गांव से निकलकर वैश्विक खेल जगत में अपनी पहचान बनाने वाले प्रवीण ने इस महामुकाबले में 2.05 मीटर की रिकॉर्ड ऊंचाई को पार कर नया कीर्तिमान स्थापित किया। इस ऐतिहासिक स्पर्धा की सबसे गौरवशाली बात यह रही कि शीर्ष दोनों पायदानों पर भारतीय खिलाड़ियों का कब्जा रहा। भारत के ही प्रतिभावान पैरा जम्पर बंटी ने 1.92 मीटर की शानदार छलांग लगाकर दूसरे स्थान के साथ रजत पदक अपने नाम किया और देश को स्वर्णिम दोहरी सफलता दिलाई।
नागोया में गूंजा राष्ट्रगान: 2.05 मीटर की ऊंचाई लांघकर प्रवीण कुमार ने रचा नया इतिहास
आईची-नागोया के आधुनिक एथलेटिक्स स्टेडियम में जब हाई जंप स्पर्धा का फाइनल मुकाबला शुरू हुआ, तो सभी की निगाहें भारत के स्टार जम्पर प्रवीण कुमार पर टिकी थीं। प्रवीण ने अपने शुरुआती प्रयासों से ही जबर्दस्त लय और तकनीकी संतुलन का प्रदर्शन किया। जैसे-जैसे बार की ऊंचाई बढ़ती गई, कई देशों के दिग्गज प्रतियोगी बाहर होते चले गए। अंत में प्रवीण ने 2.05 मीटर के चुनौतीपूर्ण मार्क को बड़ी सहजता और सटीकता के साथ पार करते हुए न केवल स्वर्ण पदक पक्का किया, बल्कि खेलों के इस संस्करण में एक नया रिकॉर्ड भी अपने नाम दर्ज करा लिया। दूसरे छोर पर भारत के ही बंटी ने भी कड़ा संघर्ष दिखाते हुए 1.92 मीटर का आंकड़ा पार किया और सिल्वर मेडल जीतकर पोडियम पर भारत का दबदबा पूरी तरह सुनिश्चित कर दिया। जब पदक वितरण समारोह में नागोया के मैदान में भारत का राष्ट्रगान गूंजा और दोनों भारतीय तिरंगे एक साथ ऊपर उठे, तो पूरा स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
टोक्यो में रजत और पेरिस में स्वर्ण: पैरा खेलों में लगातार स्वर्णिम इतिहास लिख रहे हैं प्रवीण
प्रवीण कुमार का यह प्रदर्शन कोई आकस्मिक सफलता नहीं है, बल्कि यह उनकी अनवरत साधना, मजबूत इच्छाशक्ति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार बढ़ते दबदबे का जीवंत प्रमाण है। प्रवीण इससे पहले विश्व के सबसे बड़े खेल मंच पैरालंपिक में भी भारत का नाम रोशन कर चुके हैं। पेरिस पैरालंपिक 2024 में उन्होंने 2.08 मीटर की जादुई छलांग लगाकर एशियाई रिकॉर्ड के साथ स्वर्ण पदक जीता था और देश के खेल इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराया था। इससे पहले टोक्यो पैरालंपिक 2020 में भी उन्होंने मात्र 18 वर्ष की आयु में 2.06 मीटर की शानदार कूद लगाते हुए रजत पदक अपने नाम किया था। टोक्यो में सिल्वर, पेरिस में गोल्ड और अब नागोया एशियाई पैरा खेलों में 2.05 मीटर के साथ गोल्ड मेडल जीतकर प्रवीण ने साबित कर दिया है कि वे आधुनिक दौर के सबसे निरंतर और भरोसेमंद पैरा एथलीटों में शीर्ष स्थान पर हैं।
जेवर के गोविंदगढ़ की मिट्टी से निकला हीरा: अभावों और शारीरिक सीमाओं को मात देकर बने चैंपियन
गौतमबुद्ध नगर जिले के जेवर क्षेत्र के छोटे से गांव गोविंदगढ़ में जन्मे और पले-बढ़े प्रवीण कुमार की यह यात्रा आसान नहीं रही। जन्म से ही एक पैर में विकार होने के बावजूद प्रवीण ने कभी अपनी शारीरिक कमजोरी को अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया। ग्रामीण पृष्ठभूमि में संसाधनों की भारी कमी के बीच उन्होंने स्कूल के दिनों से ही ऊंची कूद का कड़ा अभ्यास शुरू किया था। शुरुआत में सामान्य बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए उन्होंने अपनी तकनीक और पैरों की ताकत को फौलादी बनाया। आज जब गोविंदगढ़ का यह लाल जापान के नागोया में भारत का मान बढ़ा रहा है, तो पूरे जेवर, ग्रेटर नोएडा और उत्तर प्रदेश में जश्न का माहौल है। परिजनों और ग्रामीणों ने मिठाई बांटकर और ढोल-नगाड़ों की थाप पर नाचकर प्रवीण की इस स्वर्णिम छलांग का भव्य स्वागत किया। स्थानीय युवाओं के लिए प्रवीण एक ऐसे रोल मॉडल बन चुके हैं जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि अगर हौसले बुलंद हों तो कोई भी शारीरिक या आर्थिक बाधा मंजिल के रास्ते को नहीं रोक सकती।
एशियाई पैरा खेलों में भारतीय दल का दबदबा: पेरिस के बाद नागोया में भी लहराया परचम
प्रवीण कुमार के स्वर्ण और बंटी के रजत पदक ने नागोया में चल रहे पांचवें एशियाई पैरा खेलों में भारत की पदक तालिका को जबरदस्त मजबूती प्रदान की है। हाल के वर्षों में भारतीय पैरा खेलों के बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षण शिविरों, विदेशी कोचों और टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) जैसी सरकारी योजनाओं ने एथलीटों के मनोबल को सातवें आसमान पर पहुंचाया है। प्रवीण और बंटी की यह दोहरी उपलब्धि इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत अब पैरा एथलेटिक्स में केवल प्रतिभागी बनकर नहीं जा रहा, बल्कि दुनिया भर के दिग्गजों को पछाड़कर पोडियम पर राज कर रहा है। प्रवीण की यह ऐतिहासिक कामयाबी न केवल आने वाले अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों के लिए भारतीय खेल दल में नई ऊर्जा भरेगी, बल्कि देश के लाखों दिव्यांग युवाओं को खेलों को एक गरिमापूर्ण करियर और जीवन का लक्ष्य बनाने के लिए सदैव प्रेरित करती रहेगी।