तीन हफ्ते से ज्यादा पुरानी खांसी को न करें नजरंदाज! हो सकता है फेफड़ों के कैंसर का खतरा; जानें डॉक्टर की चेतावनी

तीन हफ्ते से ज्यादा पुरानी खांसी को न करें नजरंदाज! हो सकता है फेफड़ों के कैंसर का खतरा; जानें डॉक्टर की चेतावनी

अक्सर खांसी होने पर लोग इसे सामान्य सर्दी-जुकाम या एलर्जी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं और घरेलू नुस्खों या मामूली दवाओं से काम चला लेते हैं। ज्यादातर मामलों में खांसी कुछ दिनों या हफ्तेभर में ठीक भी हो जाती है, लेकिन तब क्या हो जब यह समस्या लंबे समय तक बनी रहे? क्या कई हफ्तों तक ठीक न होने वाली खांसी किसी गंभीर या जानलेवा बीमारी का संकेत हो सकती है? इन9 सभी सवालों के जवाब देते हुए मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के पल्मोनोलॉजी और ट्रांसप्लांट फिजिशियन निदेशक डॉ. अपार जिंदल ने फेफड़ों के कैंसर (Lung Cancer) के शुरुआती लक्षणों और इसके कारणों के बारे में अहम जानकारियां साझा की हैं।

फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षण और पहचान

डॉ. अपार जिंदल के अनुसार, फेफड़ों का कैंसर बहुत ही खामोशी से यानी धीरे-धीरे पनपता है। शुरुआती दिनों में इसके कोई स्पष्ट लक्षण नजर नहीं आते। अक्सर हल्की खांसी को लोग आम इन्फेक्शन, स्मोकिंग का असर या प्रदूषण मानकर छोड़ देते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर मामलों में इस बीमारी का पता तब चलता है, जब यह काफी आगे बढ़ चुकी होती है।

डॉ. जिंदल के मुताबिक, निम्नलिखित लक्षणों को भूलकर भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए:

  • तीन हफ्ते से ज्यादा पुरानी खांसी: यदि खांसी ठीक होने का नाम न ले और उसका तरीका या आवाज बदल जाए।

  • बलगम में खून आना: यह फेफड़ों की गंभीर समस्या का स्पष्ट संकेत हो सकता है।

  • सांस फूलना: सामान्य गतिविधियों के दौरान भी सांस का ज्यादा फूलना।

  • सीने में दर्द: छाती में लगातार या रुक-रुक कर दर्द रहना।

  • बार-बार इन्फेक्शन: फेफड़ों में बार-बार संक्रमण होना।

  • सांस लेते समय घरघराहट: सांस छोड़ते या लेते समय सीटी जैसी आवाज आना।

  • अन्य लक्षण: बिना किसी स्पष्ट वजह के तेजी से वजन घटना, भूख न लगना, हर वक्त अत्यधिक थकान महसूस होना या आवाज बैठ जाना।

डॉक्टर का कहना है कि ये लक्षण होने का मतलब हमेशा फेफड़ों का कैंसर ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है; यह टीबी, आईएलडी (ILD) या फेफड़ों की अन्य गंभीर बीमारियों का इशारा भी हो सकता है। इसलिए किसी भी स्थिति में डॉक्टर से विस्तृत जांच करवाना बेहद आवश्यक है।

क्या सिर्फ स्मोकर्स को होता है फेफड़ों का कैंसर?

आम तौर पर समाज में यह धारणा है कि फेफड़ों का कैंसर केवल सिगरेट या बीड़ी पीने वालों को ही होता है। हालांकि, डॉ. अपार जिंदल इस बात को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि तंबाकू इसका सबसे बड़ा कारण जरूर है, लेकिन ऐसे कई मरीज सामने आते हैं जिन्होंने कभी जीवन में धूम्रपान नहीं किया होता (Non-Smokers)।

बिना स्मोकिंग के भी फेफड़ों का कैंसर होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • पैसिव स्मोकिंग: दूसरों द्वारा छोड़े गए सिगरेट के धुएं के संपर्क में आना।

  • पर्यावरण प्रदूषण: हवा में फैला भारी प्रदूषण, फैक्ट्रियों की धूल और जहरीले केमिकल्स।

  • खतरनाक गैसें: कार्यस्थल पर जहरीली गैसों या रेडॉन के संपर्क में आना।

  • आनुवंशिक कारण: परिवार में पहले किसी को कैंसर का इतिहास होना (Genetics)।

एडवांस तकनीक से संभव है इलाज

डॉ. अपार जिंदल ने बताया कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और नई तकनीकों के कारण अब फेफड़ों के कैंसर का शुरुआती दौर में ही पता लगाना संभव हो गया है। डॉक्टर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर चेस्ट एक्स-रे और सीटी स्कैन करते हैं। यदि कोई असामान्यता दिखती है, तो ब्रोंकोस्कोपी (Bronchoscopy) या बायोप्सी के जरिए इसकी पुष्टि की जाती है।

इसके अलावा, आज के समय में जेनेटिक जांच भी उपलब्ध है, जिससे हर मरीज की स्थिति के अनुसार सटीक और व्यक्तिगत इलाज (Personalized Treatment) तय किया जाता है। कैंसर के इलाज में अब बिना बड़े चीर-फाड़ की सर्जरी, एडवांस रेडिएशन, कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी जैसी आधुनिक पद्धतियां आ चुकी हैं। यदि इस बीमारी का पता शुरुआती स्टेज में ही चल जाए, तो इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।