प्रेग्नेंसी में इन 4 लापरवाहियों से बढ़ सकता है बच्चे में ऑटिज्म का खतरा, नई स्टडी में बड़ा खुलासा
गर्भावस्था के नौ महीने मां और होने वाले शिशु दोनों के लिए बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। इस दौरान मां का आहार, मानसिक स्थिति और शारीरिक स्वास्थ्य सीधे तौर पर गर्भ में पल रहे बच्चे के न्यूरोलॉजिकल यानी दिमागी विकास को प्रभावित करते हैं। स्वीडन के करोलिंस्का इंस्टीट्यूट और जामा पीडियाट्रिक्स (JAMA Pediatrics) सहित कई प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों की हालिया रिसर्च में यह खुलासा हुआ है कि गर्भावस्था के दौरान कुछ गंभीर इन्फेक्शन, वायु प्रदूषण, हार्मोनल असंतुलन और बिना डॉक्टर की सलाह के ली गई दवाएं नवजात शिशु में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (Autism Spectrum Disorder - ASD) के खतरे को कई गुना बढ़ा सकती हैं। हालांकि ऑटिज्म में जेनेटिक्स (आनुवंशिकी) की प्राथमिक भूमिका होती है, लेकिन कई गर्भावधि कारक भी इसके जोखिम को ट्रिगर कर सकते हैं।
चिकित्सकों के अनुसार, भ्रूण के मस्तिष्क का न्यूरल सर्किट पहली और दूसरी तिमाही में तेजी से आकार लेता है। ऐसे में यदि मां का शरीर किसी गंभीर सूजन (इन्फ्लेमेशन) या विषाक्त पदार्थों के संपर्क में आता है, तो बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास में बाधा उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है।
1. गर्भावस्था में गंभीर वायरल इन्फेक्शन (TORCH Infections)
हालिया मेडिकल स्टडीज में यह पाया गया है कि प्रेगनेंसी के दौरान होने वाले कुछ दुर्लभ और गंभीर इन्फेक्शन—जिन्हें मेडिकल भाषा में TORCH इन्फेक्शन (जैसे साइटोमेगालोवायरस, रूबेला, टॉक्सोप्लाज्मोसिस और हर्पीज) कहा जाता है—का सीधा संबंध बच्चे के न्यूरोडेवलपमेंटल विकारों से है। जब मां इन वायरसों से संक्रमित होती है और संक्रमण प्लेसेंटा के जरिए भ्रूण तक पहुंच जाता है, तो बच्चे में ऑटिज्म का खतरा लगभग तीन गुना और बौद्धिक विकलांगता (Intellectual Disability) का जोखिम कई गुना तक बढ़ जाता है। समय पर वैक्सीनेशन और इन्फेक्शन की शुरुआती स्क्रीनिंग इस जोखिम को टालने में सबसे अहम भूमिका निभाती है।
2. अत्यधिक मानसिक तनाव और डिप्रेशन
गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक मानसिक तनाव (क्रॉनिक स्ट्रेस) या अनियंत्रित डिप्रेशन सिर्फ मां की सेहत को ही नहीं, बल्कि भ्रूण के दिमाग को भी प्रभावित करता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार, प्रसव पूर्व गंभीर मनोवैज्ञानिक तनाव से मां के शरीर में कोर्टिसोल और अन्य स्ट्रेस हार्मोन्स का स्तर लगातार बढ़ा रहता है। यह हार्मोनल असंतुलन प्लेसेंटा के रक्त संचार को प्रभावित कर भ्रूण के विकसित होते मस्तिष्क में न्यूरोकेमिकल बदलाव पैदा कर सकता है, जिससे भविष्य में बच्चे के व्यवहार और सामाजिक समझ (Social Interaction) में विचलन का जोखिम बढ़ जाता है।
3. पोषक तत्वों की कमी और पर्यावरण प्रदूषण का असर
अध्ययनों में विटामिन डी (Vitamin D), आयरन और फोलिक एसिड (Folate) की गंभीर कमी को भी ऑटिज्म के बढ़ते मामलों से जोड़कर देखा गया है। गर्भधारण के शुरुआती हफ्तों में फोलिक एसिड की कमी से जहां न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट्स का खतरा रहता है, वहीं विटामिन डी की अत्यधिक कमी भ्रूण के मस्तिष्क की सामान्य कोशिकाओं के विकास को बाधित कर सकती है। इसके अलावा, अत्यधिक वायु प्रदूषण (विशेष रूप से PM2.5 कणों) और कीटनाशकों (Pesticides) के सीधे संपर्क में रहने वाली गर्भवती महिलाओं में भी ऑटिज्म से ग्रसित बच्चों को जन्म देने की संभावना अधिक पाई गई है, क्योंकि ये सूक्ष्म कण शरीर में क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन को बढ़ावा देते हैं।
4. बिना डॉक्टरी सलाह के दवाओं का सेवन
प्रेग्नेंसी के दौरान बिना विशेषज्ञ की सलाह के ली जाने वाली दवाएं (Self-Medication) बच्चे के लिए घातक साबित हो सकती हैं। न्यूरोलॉजिकल रिसर्च के अनुसार, मिर्गी और मूड डिसऑर्डर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं जैसे वालप्रोइक एसिड (Valproic Acid) और कुछ अन्य एंटी-सीजर दवाएं गर्भावस्था के दौरान भ्रूण के दिमागी विकास को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए गर्भवती महिलाओं को सिरदर्द, बुखार या एलर्जी तक की सामान्य दवाएं भी बिना स्त्री रोग विशेषज्ञ की अनुमति के बिल्कुल नहीं लेनी चाहिए।