घाव भरने के लिए शहद और जंगलों में आयुर्वेदिक इलाज: सुरक्षा एजेंसियों के डोजियर में आतंकी जाकिर मूसा के तौर-तरीकों का बड़ा खुलासा
जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों के हाथों मारे जा चुके दुर्दांत आतंकी और अल-कायदा से जुड़े संगठन 'अंसार गजवात-उल-हिंद' के पूर्व कमांडर जाकिर मूसा (Zakir Musa) को लेकर सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया डोजियर से एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। मुठभेड़ों और जंगलों में छिपने के दौरान गोलियों या छर्रों से घायल होने पर मूसा किसी अस्पताल, नर्सिंग होम या मेडिकल स्टोर का रुख नहीं करता था, बल्कि वह घावों को भरने के लिए शुद्ध शहद और पारंपरिक देसी/आयुर्वेदिक तरीकों का सहारा लेता था।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, यह रणनीति उसने आधुनिक सर्विलांस, स्थानीय मुखबिरों और सुरक्षा बलों के रडार से बचने के लिए अपनाई थी।
अस्पताल जाने से क्यों बचता था मूसा?
घाटी में जब भी किसी मुठभेड़ में कोई आतंकी घायल होता है, तो सुरक्षा एजेंसियां और पुलिस तुरंत स्थानीय मेडिकल स्टोर्स, क्लिनिकों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) पर नजरें गड़ा देती हैं।
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पकड़े जाने का डर: एंटीबायोटिक्स, पेनकिलर्स या सर्जिकल बैंडेज की खरीद से अक्सर आतंकियों की लोकेशन ट्रेस हो जाती है।
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अंडरग्राउंड नेटवर्क का इस्तेमाल: जाकिर मूसा इस बात को भली-भांति जानता था। इसलिए उसने अपने ओवरग्राउंड वर्कर्स (OGWs) को सख्त निर्देश दे रखे थे कि उसके लिए एलोपैथिक दवाएं जुटाने के बजाय जंगल और स्थानीय गांवों से प्राकृतिक चीजें एकत्र की जाएं।
शहद और जड़ी-बूटियों से कैसे करता था घावों की मरहम-पट्टी?
खुफिया सूत्रों और पकड़े गए आतंकियों से पूछताछ में सामने आई डायरियों व बयानों के मुताबिक:
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शहद का एंटीसेप्टिक इस्तेमाल: मुठभेड़ के दौरान लगे कटने, छिलने या गोलियों के छर्रों से हुए घावों पर मूसा सीधे शहद लगाता था। आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में शहद को उसके प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल और टिश्यू-हीलिंग (घाव भरने वाले) गुणों के लिए जाना जाता है। शहद घाव पर एक सुरक्षात्मक परत बना देता था, जिससे संक्रमण (Infection) नहीं फैलता था।
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जंगली पत्ते और काढ़ा: दक्षिण कश्मीर के घने जंगलों (खासकर त्राल और शोपियां के पहाड़ी इलाकों) में छिपने के दौरान वह स्थानीय वनस्पतियों, नीम की छाल, हल्दी और देसी जड़ी-बूटियों के लेप का इस्तेमाल करता था। अंदरूनी दर्द और बुखार से निपटने के लिए वह पारंपरिक काढ़े का सेवन करता था।
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स्थानीय हकीमों से परोक्ष मदद: कई मामलों में उसने पकड़े जाने के डर से हकीमों या पारंपरिक वैद्यों से सीधे मिलने के बजाय अपने संदेशवाहकों के जरिए देसी नुस्खों की जानकारी मंगवाई थी।
खुद को बताता था 'कठोर मुजाहिद', तकनीक से रहता था दूर
जाकिर मूसा (मूल नाम जाकिर रशीद भट), जिसने हिजबुल मुजाहिद्दीन से अलग होकर कश्मीर में अल-कायदा की विचारधारा पर आधारित अंसार गजवात-उल-हिंद की नींव रखी थी, अपनी सुरक्षा को लेकर बेहद सनकी था:
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स्मार्टफोन से परहेज: वह लंबे समय तक किसी भी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट, सिम कार्ड या फोन के इस्तेमाल से बचता था ताकि उसकी इलेक्ट्रॉनिक लोकेशन ट्रैक न हो सके।
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जंगलों में प्राकृतिक जीवनशैली: वह महीनों तक पहाड़ों में बनी प्राकृतिक गुफाओं और ठिकानों में रहता था और पूरी तरह से सूखी खाद्य सामग्री और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहता था।
हालांकि, देसी इलाज और तकनीकी दूरी की यह चालाकी भी उसे ज्यादा दिन तक सुरक्षा बलों की नजरों से नहीं बचा सकी। मई 2019 में त्राल के डडसरा गांव में सुरक्षा बलों ने एक सटीक ऑपरेशन में उसे घेरकर मार गिराया था। अब सुरक्षा एजेंसियों द्वारा आतंकी तौर-तरीकों पर संकलित केस स्टडीज में मूसा के इस सर्वाइवल मॉडल और पारंपरिक उपचार के इस्तेमाल का ब्योरा एक बार फिर सुरक्षा विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बना है।