'पूर्ण बैन से आहत होंगी भावनाएं, 24 घंटे पटाखे फोड़ने की भी छूट नहीं': दिवाली पर पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
आगामी दिवाली और त्योहारों के सीजन से पहले पटाखों के निर्माण, बिक्री और इस्तेमाल को लेकर छिड़ी लंबी कानूनी जंग में देश की सर्वोच्च अदालत से बेहद महत्वपूर्ण संकेत सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने त्योहारों के दौरान पटाखों के इस्तेमाल को लेकर एक संतुलित और व्यावहारिक रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि वह पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध (Total Ban) लगाने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से दिवाली का पावन पर्व मनाने वाले करोड़ों लोगों की धार्मिक व सांस्कृतिक भावनाएं आहत हो सकती हैं।
हालांकि, इसके साथ ही अदालत ने यह भी दो टूक शब्दों में साफ कर दिया कि वह लोगों को दिन-रात यानी 24 घंटे पटाखे फोड़ने की खुली छूट भी कतई नहीं दे सकती, क्योंकि इसका सीधा और घातक असर बुजुर्गों, बीमार लोगों, नन्हें बच्चों और पर्यावरण के अन्य मूक जीवों पर पड़ता है। कोर्ट ने संकेत दिया कि दोनों पक्षों के बीच संतुलन साधने के लिए एक तय समय-सीमा (Time Slot) और अनुमत पटाखों का फॉर्मूला निकाला जा सकता है।
'न पूरी तरह बैन करेंगे, न 24 घंटे की छूट देंगे': जस्टिस एम.एम. सुंदरेश की बेंच का रुख
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा (पी.बी. वराले) की खंडपीठ के समक्ष जब पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने और प्रदूषण नियंत्रण को लेकर याचिकाएं सुनवाई के लिए आईं, तो पीठ ने बहुत ही स्पष्ट और संतुलित दृष्टिकोण रखा।
अदालत ने सुनवाई के दौरान सख्त लहजे में कहा:
"हम इस मुद्दे को बिल्कुल साफ कर देना चाहते हैं। न तो हम आपकी इस मांग से सहमत होने जा रहे हैं कि पटाखों पर पूरी तरह से बैन लगा दिया जाए, और न ही हम लोगों को 24 घंटे पटाखे फोड़ने की इजाजत देने वाले हैं। पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से लोगों की भावनाएं आहत होंगी। वहीं दूसरी तरफ, अगर दिन-रात लगातार आतिशबाजी करने दी गई, तो उसका समाज के हर जीवित प्राणी—चाहे वे बुजुर्ग हों, बीमार मरीज हों या छोटे बच्चे—पर बेहद गंभीर और प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसलिए हमें एक ऐसा व्यावहारिक समाधान निकालना होगा, जिसके तहत पटाखे फोड़ने के लिए एक निश्चित और सीमित समय तय किया जा सके।""
पराली और वायु प्रदूषण पर वकीलों ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान प्रदूषण नियंत्रण के पक्षधरों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों ने आगामी सर्दियों के महीनों में दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत में जहरीली हवा और स्मॉग का मुद्दा उठाया। वकीलों ने दलील दी कि दिवाली के आसपास पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने (Stubble Burning) की घटनाएं भी चरम पर होती हैं। ऐसे में पराली के धुएं और पटाखों से निकलने वाले भारी रसायनों का मिश्रण आबोहवा को जानलेवा बना देता है।
इसके जवाब में केंद्र और पटाखा निर्माताओं की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने संयुक्त पटाखों (लड़ी/बेरियम वाले पटाखे) और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित 'ग्रीन क्रैकर्स' (हरित पटाखे) को लेकर तकनीकी आंकड़े और सुझाव प्रस्तुत किए। कोर्ट ने संकेत दिया कि वह सुरक्षित और कम उत्सर्जन वाले पटाखों के नियमों को लेकर दिए गए तार्किक सुझावों को स्वीकार करने के पक्ष में है।
तय समय और ग्रीन क्रैकर्स के बीच रास्ता निकालने की तैयारी
सर्वोच्च न्यायालय की इन मौखिक टिप्पणियों से यह साफ हो गया है कि अदालत इस बार अतिवादी फैसलों के बजाय बीच का रास्ता (Middle Path) चुनने की तैयारी में है:
-
तय समय सीमा (Fixed Timings): पूर्व के वर्षों की तरह इस बार भी रात के समय 2 से 3 घंटे की एक सख्त समयावधि तय की जा सकती है, जिसके भीतर ही लोग त्योहार की खुशियां मनाने के लिए आतिशबाजी कर सकेंगे।
-
प्रतिबंधित केमिकल पर सख्ती: बेरियम नाइट्रेट और भारी धातुओं से बने जहरीले पारंपरिक पटाखों पर रोक बरकरार रहेगी, जबकि काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR-NEERI) द्वारा प्रमाणित केवल ग्रीन पटाखों को ही बाजार में अनुमति मिल सकती है।
-
एकल पीठ में सुनवाई: मामले के व्यापक दायरे और एमसी मेहता प्रदूषण केस से जुड़े अन्य पहलुओं को देखते हुए पीठ ने निर्देश दिया कि इस विषय से जुड़ी सभी अर्जियों को एक ही उपयुक्त बेंच के समक्ष एक साथ सुना जाए।
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से उन करोड़ों परिवारों और दुकानदारों को बड़ी राहत मिली है, जो त्योहार की रौनक पर पूर्ण प्रतिबंध के डर से आशंकित थे, साथ ही पर्यावरण और स्वास्थ्य सुरक्षा की चिंताओं को भी अदालत ने अपनी प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा है।