विदेशी फंडिंग के आरोपों पर हरीश साल्वे को अभिजीत दीपके की दो टूक चुनौती: बोले- 'अगर सबूत हैं तो अमित शाह को सौंपें
देश की राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों और नागरिक आंदोलनों को लेकर छिड़ी सियासी जंग अब कानूनी दिग्गजों और आंदोलनकारी नेताओं के बीच सीधे टकराव में बदल गई है। भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे द्वारा विदेशी फंडिंग और बाहरी दखल के लगाए गए आरोपों पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सार्वजनिक रूप से कड़ा जवाब दिया है। नागपुर से दिल्ली रवाना होने से पहले मीडिया से बातचीत करते हुए दीपके ने हरीश साल्वे के दावों को पूरी तरह बेबुनियाद करार दिया और उन्हें खुली चुनौती दी। दीपके ने कहा कि यदि साल्वे के पास इस बात का रत्ती भर भी प्रमाण है कि उनके आंदोलन को विदेश से आर्थिक मदद मिल रही है, तो वे उन सबूतों को टेलीविजन स्टूडियो या बयानों में रखने के बजाय सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मेज पर सौंप दें।
'अमित शाह के पास सबूत नहीं, तो साल्वे गृह मंत्रालय को सौंपें दस्तावेज': दीपके का तीखा तंज
अभिजीत दीपके ने केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश का गृह मंत्रालय और तमाम जांच एजेंसियां लंबे समय से जांच में जुटी हैं, लेकिन गृह मंत्री अमित शाह अब तक ऐसा कोई साक्ष्य सार्वजनिक या अदालती पटल पर साबित नहीं कर पाए हैं जिससे यह सिद्ध हो सके कि उन्हें कोई विदेशी फंडिंग मिल रही है। दीपके ने तीखे अंदाज में कहा कि जब देश की शीर्ष जांच एजेंसियों को कुछ नहीं मिल पा रहा है, तो लंदन में बैठकर हरीश साल्वे को ऐसे गोपनीय इनपुट कहां से मिल रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि सरकार केवल आरोपों की आड़ में आंदोलनकारियों को बदनाम करने का प्रयास कर रही है। दीपके ने चुनौती भरे लहजे में यह भी कहा कि यदि सरकार लोकतांत्रिक असहमति को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है, तो खुलकर देश में आपातकाल लागू करने की घोषणा करे, न कि कानूनी विशेषज्ञों के जरिए ऐसे काल्पनिक नैरेटिव गढ़े।
हरीश साल्वे ने क्या लगाए थे आरोप? अमेरिका, बांग्लादेश और पड़ोसी देशों का दिया था हवाला
इस पूरे विवाद की शुरुआत वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे के उस साक्षात्कार से हुई, जिसमें उन्होंने भारत में हो रहे सिलसिलेवार विरोध प्रदर्शनों के पीछे किसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश और विदेशी फंडिंग की आशंका जताई थी। साल्वे ने स्पष्ट रूप से कहा था कि कुछ विदेशी देश, विशेषकर अमेरिका, भारत की स्वतंत्र नीतियों और आर्थिक मजबूती से नाखुश हैं। उन्होंने दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय हालात का उदाहरण देते हुए सवाल उठाया था कि श्रीलंका, नेपाल और बांग्लादेश में अचानक पैदा हुई राजनीतिक अस्थिरता के पीछे कौन सी ताकतें सक्रिय थीं। साल्वे का कहना था कि वही बाहरी ताकतें अब भारत में भी अराजकता का माहौल बनाने की फिराक में हैं। उन्होंने आंदोलन में शामिल अभिजीत दीपके, सौरभ दास और अन्य डिजिटल एक्टिविस्टों का नाम लेते हुए पूछा था कि रातों-रात बड़े प्रदर्शनों के आयोजन के लिए इतना भारी फंड कहां से जुटाया जा रहा है, क्योंकि किसी भी विरोध प्रदर्शन के संचालन में बड़े पैमाने पर धन खर्च होता है।
तकनीकी संप्रभुता और मोदी सरकार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय लॉबी की बेचैनी: साल्वे का दावा
हरीश साल्वे ने अपने वक्तव्य में यह भी रेखांकित किया था कि पिछले छह से आठ महीनों के दौरान एक सुनियोजित पैटर्न देखने को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार जब होर्मुज संकट, घरेलू विकास दर, आर्थिक संप्रभुता और अंतरिक्ष क्षेत्र में स्वदेशी उपग्रहों की तकनीक को बढ़ावा देने में जुटी है, तब विदेशी कॉरपोरेट और राजनीतिक लॉबी में भारी बेचैनी है। साल्वे के मुताबिक, कुछ विदेशी ताकतें चाहती हैं कि भारत अपनी शर्तों पर आगे बढ़ने के बजाय उनके दबाव में काम करे और जब सरकार झुकने से इनकार कर देती है, तो घरेलू स्तर पर अस्थिरता पैदा करने के लिए ऐसे आंदोलनों को ईंधन दिया जाता है। उन्होंने मांग की थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में सरकार को इन प्रदर्शनों के वित्तीय स्रोतों की निष्पक्ष और गहन जांच करानी चाहिए।
मैरी मिलबेन की एंट्री और भाजपा-कांग्रेस में राजनीतिक घमासान
यह विवाद केवल साल्वे और दीपके तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन के बयानों ने आग में घी डालने का काम किया। मिलबेन ने सोशल मीडिया पर सार्वजनिक दावा किया कि अभिजीत दीपके और कॉकरोच जनता पार्टी को अमेरिका स्थित उन डोनर्स से वित्तीय सहायता मिल रही है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों के विरोधी हैं। इस पर दीपके ने पलटवार करते हुए पूछा था कि किसी विदेशी नागरिक को भारत के घरेलू मामलों और नागरिकों पर टिप्पणी करने का अधिकार किसने दिया। इस बयानबाजी के बाद भारतीय जनता पार्टी ने जहां विदेशी फंडिंग के आरोपों को देश को अस्थिर करने का टूलकिट बताया, वहीं कांग्रेस पार्टी ने इसे असहमति की आवाजों को दबाने और वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने की भाजपा की पुरानी रणनीति करार दिया।
तिहाड़ जेल से लेकर SC/ST एक्ट तक: CJP नेताओं की बढ़ती कानूनी मुश्किलें
एक तरफ जहां वैचारिक और फंडिंग को लेकर वाकयुद्ध तेज है, वहीं जमीनी स्तर पर कॉकरोच जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं की कानूनी मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। शांति भंग करने के मुचलके के उल्लंघन और प्रदर्शनों के दौरान नियमों की अनदेखी के मामले में पार्टी से जुड़े आशुतोष रांका और सौरभ दास पहले से ही न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल में बंद हैं। इसके अतिरिक्त, हाल ही में दीपके, रांका और दास के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) के तहत भी एक नया मामला दर्ज हुआ है। दीपके ने दिल्ली पहुंचते ही स्पष्ट किया है कि वे पुलिस और प्रशासनिक दबाव से डरने वाले नहीं हैं और चाहे उन पर यूएपीए (UAPA) लगे या रासुका (NSA), वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और आगामी प्रदर्शनों को लेकर पीछे नहीं हटेंगे।