सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति पर पूर्व हाईकोर्ट जज का बड़ा बयान
भारतीय न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच तालमेल, अधिकारों के संतुलन और न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया (Collegium System) को लेकर देश में समय-समय पर तीखी बहस होती रही है। इसी कड़ी में एक पूर्व उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा दिए गए एक ऐसे बयान ने पूरे देश के कानूनी और राजनीतिक गलियारों में सनसनी फैला दी है, जिसमें उन्होंने कहा है कि 'सुप्रीम कोर्ट में इस समय जितने भी 37 जज हैं, उन सभी की नियुक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ही हुई है, इसलिए वे अब आराम से बैठ सकते हैं।' इस बयान के सामने आते ही सुप्रीम कोर्ट की स्वायत्तता, कॉलेजियम प्रणाली की पारदर्शिता और सरकार तथा न्यायपालिका के आपसी संबंधों को लेकर एक बार फिर से जोरदार चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इस टिप्पणी ने न्यायपालिका के कामकाज और कार्यपालिका के प्रभाव को लेकर एक गहरे वैचारिक मंथन को फिर से हवा दे दी है।
आखिर क्या है जजों की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया और क्यों उठते रहे हैं सवाल?
भारत में वर्तमान समय में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति 'कॉलेजियम प्रणाली' के माध्यम से की जाती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठतम जजों का एक समूह उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश सरकार के पास भेजता है। सरकार इन नामों की जांच करने के बाद अंततः राष्ट्रपति की मुहर के साथ नियुक्ति को अंतिम रूप देती है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से सरकार और न्यायपालिका के बीच इस बात को लेकर खींचतान चलती रही है कि क्या न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका थोड़ी और अधिक होनी चाहिए या फिर कॉलेजियम सिस्टम ही सबसे सुरक्षित माध्यम है। पूर्व जज के इस बयान को इसी लंबी कसमसाहट और प्रशासनिक वार्ताओं के संदर्भ में देखा जा रहा है, जिसमें यह दर्शाने की कोशिश की गई है कि वर्तमान प्रशासनिक दौर में नियुक्तियों की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी हुई है।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) की चर्चा हुई तेज, पुराने विवादों की फिर से वापसी
इस बयान के बाद एक बार फिर से बहुचर्चित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointments Commission - NJAC) के उस पुराने कानून की यादें ताजा हो गई हैं, जिसे संसद ने सर्वसम्मति से पारित किया था, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में उसे संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ बताते हुए खारिज कर दिया था। जानकारों का कहना है कि कार्यपालिका हमेशा से यह चाहती रही है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए कोई वैकल्पिक और अधिक समावेशी तंत्र होना चाहिए, जबकि न्यायपालिका का तर्क है कि न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता को बचाने के लिए कॉलेजियम प्रणाली का होना अनिवार्य है। पूर्व जज के इस बयान ने एक बार फिर से इस बात को सतह पर ला दिया है कि क्या न्यायिक नियुक्तियों में राजनीतिक या कार्यकारी प्रभाव की कोई गुंजाइश बचती है या फिर पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से योग्यता और संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही संचालित होती है।
कानूनी विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों की तीखी प्रतिक्रियाएं
पूर्व हाईकोर्ट जज के इस बयान के सामने आने के बाद देश भर के वरिष्ठ वकीलों, कानूनी विशेषज्ञों और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक तरफ जहां कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी न्यायपालिका और सरकार के बीच के संवाद और संस्थागत नियुक्तियों की वास्तविक स्थिति को बयान करती है, वहीं दूसरी तरफ कई वरिष्ठ कानूनी जानकारों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि जजों की नियुक्ति कोई राजनीतिक चयन नहीं होता, बल्कि यह एक लंबी और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का परिणाम है जिसके तहत मेधावी और अनुभवी न्यायविदों को सर्वोच्च पद पर बिठाया जाता है। इस तरह के बयानों से न्यायपालिका की गरिमा पर अनावश्यक सवाल खड़े होते हैं, जबकि ज जज अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्पक्षता के साथ करते हैं।
आने वाले समय में न्यायिक सुधारों और कार्यपालिका के संबंधों पर क्या होगा असर?
यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में न्याय प्रणाली के आधुनिकीकरण, मुकदमों के लंबे बै बैकलॉग को खत्म करने और जजों की रिक्तियों को तेजी से भरने पर जोर दिया जा रहा है। सरकार और न्यायपालिका दोनों ही यह भली-भांति समझते हैं कि देश के आम नागरिकों को त्वरित और सुलभ न्याय दिलाने के लिए दोनों संस्थाओं का आपसी सहयोग बेहद जरूरी है। भले ही नियुक्तियों की प्रक्रिया को लेकर समय-समय पर वैचारिक मतभेद उभरते रहे हों, लेकिन भारतीय लोकतंत्र की ताकत इसी बात में निहित है कि तमाम बहसों और चर्चाओं के बावजूद न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता और संविधान के दायरे में रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करती है। यह बयान भले ही कुछ समय के लिए राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बन गया हो, लेकिन अंततः यह न्यायिक सुधारों की दिशा में एक और महत्वपूर्ण वैचारिक बहस को जन्म दे गया है।