कांग्रेस हारती तो सब गंवा देते सतीशन, वनवास का था ऐलान; पर ऐतिहासिक जीत ने बना दिया केरल का 'सुलतान'
केरल की राजनीति में सोमवार को एक नया इतिहास रच गया जब वडास्सेरी दामोदर मेनन सतीशन (वी डी सतीशन) ने राज्य के नए मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली। कोच्चि के एक साधारण वकील से सूबे के सबसे ऊंचे सियासी पद तक पहुंचने वाले सतीशन की यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। चुनाव से ठीक पहले अपनी ही साख को दांव पर लगाकर 'राजनीतिक वनवास' का खुला ऐलान करने वाले सतीशन ने अपने तीखे भाषणों, बेजोड़ रणनीतियों और कड़े अनुशासन के दम पर आखिरकार केरल में कांग्रेस को एक दशक बाद सत्ता के शिखर पर पहुंचा ही दिया। जो आलोचक कल तक उनकी कार्यशैली पर सवाल उठा रहे थे, आज वे भी उनके इस करिश्मे के आगे नतमस्तक हैं।
हारते तो खत्म हो जाता राजनीतिक करियर, दांव पर लगी थी साख
विधानसभा चुनाव के शंखनाद के दौरान वी डी सतीशन ने एक ऐसा बयान दिया था जिसने पूरी कांग्रेस आलाकमान की धड़कनें बढ़ा दी थीं। उन्होंने बेहद आक्रामक अंदाज में घोषणा की थी कि यदि कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) स्पष्ट बहुमत हासिल करने में नाकाम रहता है, तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे यानी सक्रिय राजनीति से हमेशा के लिए वनवास पर चले जाएंगे। सतीशन ने पूरे भरोसे के साथ दावा किया था कि यूडीएफ 100 से अधिक सीटें जीतेगा। चुनाव के नतीजों ने उनके इस दावे पर मुहर लगा दी और उनका यही आत्मविश्वास आज उन्हें केरल का निर्विवाद 'सुल्तान' बना चुका है।
राहुल गांधी का वो एक फैसला, जिसने पलट दी केरल कांग्रेस की किस्मत
केरल कांग्रेस के भीतर इस ऐतिहासिक जीत की नींव साल 2021 की करारी हार के बाद ही पड़ गई थी। उस कठिन दौर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बड़ा राजनीतिक जोखिम लेते हुए वरिष्ठ नेताओं की जगह वी डी सतीशन को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाने का पुरजोर समर्थन किया था। शुरुआत में जिसे पार्टी के भीतर एक जुआ माना जा रहा था, वह फैसला बाद में केरल कांग्रेस के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। विपक्ष के नेता के रूप में पिछले 5 सालों में सतीशन ने भाई-भतीजावाद, कथित वित्तीय अनियमितताओं और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर निवर्तमान मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की वामपंथी (LDF) सरकार को बैकफुट पर ला दिया।
बिना मंत्री रहे सीधे बने मुख्यमंत्री, दिग्गजों की कतार में हुए शामिल
61 वर्षीय वी डी सतीशन कोच्चि के पास परावुर विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके राजनीतिक सफर की सबसे दिलचस्प बात यह है कि वह अपने पूरे जीवन में इससे पहले कभी मंत्री नहीं रहे। बिना किसी प्रशासनिक अनुभव के सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालना उनकी असाधारण नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। इस चुनाव अभियान के दौरान वह केरल कांग्रेस के सर्वकालिक दिग्गज नेताओं जैसे के. करुणाकरण, ए. के. एंटनी और ओमन चांडी की लीग में शामिल होकर उभरे। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब आलाकमान द्वारा के. सी. वेणुगोपाल के नाम पर विचार करने की खबरें आईं, तो हजारों समर्थक सतीशन के समर्थन में सड़कों पर उतर आए थे।
तीखे तेवर और मीडिया की समझ, मगर अपनों की ही नाराजगी का भी सामना
अपने समर्थकों के बीच 'वीडी' या 'वीडीएस' के नाम से मशहूर सतीशन को एक अनुशासित और मीडिया की गहरी समझ रखने वाला व्यावहारिक नेता माना जाता है। उन्होंने छात्र राजनीति से निकलकर कानूनी समझ और राजनीतिक पैंतरेबाज़ी के अनोखे तालमेल से अपनी यह पहचान बनाई है। हालांकि, उनका यह सफर इतना आसान भी नहीं था। पार्टी के भीतर उनके आलोचक उनकी केंद्रीयकृत कार्यशैली (Centralized working style) से अक्सर नाराज रहते थे, जिससे गुटबाजी को हवा मिलती थी। इतना ही नहीं, चुनाव के दौरान उन्हें केरल के शक्तिशाली सामाजिक और जातीय संगठनों जैसे एझवा समुदाय के नेता वेल्लापल्ली नटेशन और एनएसएस के प्रमुख जी. सुकुमारन नायर के कड़े विरोध का भी सामना करना पड़ा, लेकिन सतीशन ने अपनी जमीनी रणनीति से सबको पछाड़ दिया।
केरल की जनता ने एक दशक बाद यूडीएफ को सत्ता की चाबी सौंपी है। अब मुख्यमंत्री सतीशन के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य के गंभीर वित्तीय संकट को दूर करने के साथ-साथ चुनाव के दौरान किए गए बड़े-बड़े कल्याणकारी वादों और राज्य के विकास के बीच एक सटीक संतुलन बनाने की होगी।