'महिला अपनी मर्जी से यह काम करे तो वह जगह कोठा नहीं', वेश्यावृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट का 298 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला
देश की सर्वोच्च अदालत ने वेश्यावृत्ति (Prostitution) को लेकर एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने करीब 70 साल पुराने 'अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम' (ITPA) का गहन विश्लेषण करते हुए 298 पन्नों का एक विस्तृत फैसला जारी किया है। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ शब्दों में कहा है कि इस कानून का असली उद्देश्य देश से वेश्यावृत्ति को पूरी तरह खत्म करना या इसे एक आपराधिक कृत्य बनाना नहीं है, बल्कि इसका मुख्य मकसद वेश्यावृत्ति के नाम पर होने वाले व्यावसायिक शोषण और मानव तस्करी पर लगाम लगाना है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा, "हम इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं कि वेश्यावृत्ति को जड़ से खत्म करना इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य नहीं है। कानून का असल मकसद इसे आजीविका के एक संगठित माध्यम यानी बिजनेस के रूप में इस्तेमाल करने और इसके व्यावसायीकरण को रोकना है।"
कानून के नाम में 'अनैतिक' शब्द जुड़ने के पीछे की असली कहानी
दरअसल, यह पूरा मामला वेश्यालयों (Brothels) से रेस्क्यू की गई महिलाओं के पुनर्वास और उनके अधिकारों से जुड़ा हुआ था। इसी मुद्दे पर सुनवाई के दौरान पीठ ने साल 1956 के इस पुराने अधिनियम के इतिहास को खंगाला। अदालत ने बताया कि 20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं और बच्चियों को जबरन वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेलने के लिए बड़े पैमाने पर तस्करी की जाती थी। उस दौर के समाज में इसे अत्यंत अनैतिक माना जाता था, यही वजह रही कि ब्रिटिश काल और उसके बाद बने इस कानून के नाम के साथ 'अनैतिक' (Immoral) शब्द हमेशा के लिए जुड़ गया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कानून मुख्य रूप से उन अपराधियों, दलालों और तस्करों को कड़ी सजा देने के लिए बनाया गया था जो महिलाओं का सौदा करते हैं। इस कानून का मकसद उन बेबस महिलाओं को दंडित करना बिल्कुल नहीं है जो इस दलदल में फंसी हुई हैं।
इन दो परिस्थितियों में अपराध माना जाएगा वेश्यावृत्ति का व्यक्तिगत कृत्य
जस्टिस पारदीवाला द्वारा लिखे गए इस ऐतिहासिक फैसले में अधिनियम की धारा 7 और धारा 8 का भी विशेष जिक्र किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि व्यक्तिगत तौर पर वेश्यावृत्ति पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन कानून की ये दो धाराएं इसके अपवाद हैं। कानून की धारा 7 के तहत अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थानों, धार्मिक स्थलों या शैक्षणिक संस्थानों के आसपास वेश्यावृत्ति की गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है, तो उसे दंडित किया जाएगा।
वहीं, धारा 8 के मुताबिक सार्वजनिक स्थानों पर खड़े होकर ग्राहकों को इशारे करना, उन्हें रिझाना या बुलाना एक दंडनीय अपराध माना जाएगा। पीठ ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सार्वजनिक शालीनता, सामाजिक नैतिकता और आम जनता की सुविधा को बनाए रखने के लिए सार्वजनिक क्षेत्रों में ऐसे दृश्यों पर रोक लगाना बेहद जरूरी है।
अकेले काम करने वाली महिला का घर 'वेश्यागृह' नहीं, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी व्याख्या
अदालत ने देश में वेश्यावृत्ति को लेकर बनी कानूनी अस्पष्टता पर भी खुलकर बात की। कोर्ट ने कहा कि हम यहां न तो वेश्यावृत्ति को पूरी तरह से अपराध मुक्त करने की वकालत कर रहे हैं और न ही इसे बिना किसी नियम के खुला छोड़ने की बात कह रहे हैं। कानून की परिभाषा में कुछ अस्पष्टता जरूर है क्योंकि इसे हमेशा केवल शोषण और अपमान के रूप में ही देखा जाता रहा है।
इसी अस्पष्टता को दूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम की धारा 2 में दर्ज 'वेश्यागृह' (Brothel) शब्द की एक नई और क्रांतिकारी व्याख्या की है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा, "अगर कोई अकेली महिला अपनी आजीविका चलाने के लिए अपने ही घर या निवास स्थान में वेश्यावृत्ति का सहारा लेती है, बशर्ते उसमें कोई दूसरी महिला शामिल न हो और न ही उस घर के रखरखाव या कमाई में किसी बिचौलिए, दलाल या बाहरी व्यक्ति का कोई हाथ हो, तो कानून की नजर में उस महिला के निवास स्थान को वेश्यागृह या कोठा नहीं माना जा सकता और न ही उस पर इस धारा के तहत कार्रवाई की जा सकती है।" सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में यौन कर्मियों के अधिकारों और कानून की व्याख्या में एक मील का पत्थर साबित होगा।