बंगाल में महाराष्ट्र जैसा बड़ा खेला, ममता बनर्जी से छिन सकता है TMC का नाम और चुनाव चिह्न, 50 विधायकों के टूटने की अटकलें तेज
पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में इस वक्त एक ऐसा जबरदस्त भूचाल आया हुआ है, जिसने देश भर के राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक बहुत बड़ी बगावत की सुगबुगाहट तेज हो गई है। सियासी हलकों में यह अटकलें बेहद तेज हैं कि ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के करीब 50 विधायक एक साथ टूट सकते हैं, जिससे पार्टी में ऐतिहासिक विभाजन (टूट) हो सकता है। अगर ये अटकलें हकीकत में बदलती हैं, तो पश्चिम बंगाल में भी महाराष्ट्र की राजनीति जैसा ही एक बड़ा रीकैप देखने को मिल सकता है, जहां मूल पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दोनों ही हाथ से निकल गए थे। इस पूरे घटनाक्रम ने ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
ममता बनर्जी का बड़ा ऐक्शन, दो बागी विधायकों को पार्टी से निकाला
टीएमसी के भीतर मचे इस घमासान के बीच पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी ने सोमवार को एक बड़ा कदम उठाते हुए दो मौजूदा विधायकों को प्राथमिक सदस्यता से तत्काल प्रभाव से निष्कासित कर दिया है। जिन दो विधायकों पर यह गाज गिरी है, उनमें हावड़ा की उलुबेरिया पूर्व सीट से चुनाव जीतने वाले रीताब्रत बनर्जी और मध्य कोलकाता की एंटाली सीट से विधायक संदीपन साहा शामिल हैं। यह बड़ी कार्रवाई ऐसे समय में की गई है जब पार्टी के कई पार्षद लगातार अपने पदों से इस्तीफा दे रहे हैं और टीएमसी के आधिकारिक कार्यक्रमों से पार्टी के बड़े और दिग्गज नेता लगातार दूरी बनाते हुए नजर आ रहे हैं। इस निष्कासन के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा में टीएमसी के विधायकों की संख्या घटकर महज 78 रह गई है।
क्या बंगाल में दोहराया जाएगा उद्धव ठाकरे और शरद पवार वाला इतिहास
'संघवाद प्रतिदिन' की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा की अगुवाई में टीएमसी के बागी गुट द्वारा एक 'नई तृणमूल कांग्रेस' के गठन की अंदरूनी तैयारी चल रही है। अगर यह गुट 50 विधायकों के साथ अलग होता है, तो बंगाल का हाल भी महाराष्ट्र जैसा हो सकता है। याद दिला दें कि महाराष्ट्र में जब उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली अविभाजित शिवसेना से एकनाथ शिंदे भारी संख्या में विधायकों को लेकर अलग हुए थे, तो चुनाव आयोग के फैसले के बाद उद्धव ठाकरे को अपनी ही पार्टी का नाम और 'तीर-कमान' का चिह्न गंवाना पड़ा था। ऐसा ही कुछ दिग्गज नेता शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के साथ भी हुआ था, जब अजीत पवार ने बगावत की थी। अब ठीक वैसी ही तलवार ममता बनर्जी की टीएमसी पर लटकती दिख रही है।
आखिर क्यों गिरी इन दो दिग्गज विधायकों पर गाज? जानिए अंदरूनी कहानी
पार्टी उपाध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य के हस्ताक्षर से दोनों बागी विधायकों को भेजे गए निष्कासन पत्र में बेहद गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पत्र में स्पष्ट तौर पर कहा गया है, "अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के संज्ञान में यह बात आई है कि पार्टी के टिकट पर निर्वाचित होने के बावजूद आप दोनों लगातार अधिकृत नेतृत्व द्वारा बुलाई गई महत्वपूर्ण बैठकों से गायब रहे हैं। इसके अलावा, आप दोनों लगातार ऐसी गतिविधियों और बयानों में शामिल रहे हैं जो सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के हितों के खिलाफ (पार्टी विरोधी) हैं।" इसी वजह से सक्षम प्राधिकारी ने दोनों को तत्काल प्रभाव से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के इस बड़े खुलासे से खुली टीएमसी की पोल
इस पूरे सियासी ड्रामे के बीच पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के एक बयान ने आग में घी का काम किया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बताया कि यह पूरी जांच भाजपा या नई सरकार द्वारा शुरू नहीं की गई थी, बल्कि खुद टीएमसी के इन दो विधायकों ने 27 मई को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष एक लिखित शिकायत दर्ज कराई थी। विधायकों का आरोप था कि 6 मई को हुई टीएमसी विधायक दल की बैठक में विपक्ष के नेता के चयन को लेकर कोई वैध प्रस्ताव पास ही नहीं हुआ था। उन्होंने सनसनीखेज दावा किया कि 70 विधायकों के हस्ताक्षर वाला जो समर्थन पत्र शोभनदेब चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने के लिए सौंपा गया था, वह पूरी तरह से फर्जी और मनगढ़ंत है, जिसमें 14 विधायकों के दस्तखत बड़े अक्षरों (कैपिटल लेटर्स) में जाली तरीके से किए गए थे। इसी शिकायत के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की है।