ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात पर टिकी दुनिया की नजरें: अमेरिका-चीन में अगर सुलझी तकरार

ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात पर टिकी दुनिया की नजरें: अमेरिका-चीन में अगर सुलझी तकरार

वैश्विक भू-राजनीति (Geopolitics) में जब भी दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों— अमेरिका और चीन— के शीर्ष नेताओं के बीच बातचीत या समझौते की सुगबुगाहट होती है, तो उसका असर केवल वॉशिंगटन और बीजिंग तक सीमित नहीं रहता। खासकर डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच रणनीतिक संबंधों के उतार-चढ़ाव पर भारत की नजरें हमेशा सबसे ज्यादा टिकी रहती हैं।

ट्रंप अपने आक्रामक 'अमेरिका फर्स्ट' और टैरिफ आधारित रुख के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल में चीन के खिलाफ ऐतिहासिक ट्रेड वॉर (Trade War) छेड़ा था, जिससे भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में एक बड़े विकल्प के रूप में उभरने का मौका मिला था। लेकिन अगर ट्रंप की 'डील-मेकिंग' कूटनीति के तहत अमेरिका और चीन के बीच तल्खी कम होती है और दोनों देश किसी नए रणनीतिक समझौते पर पहुंचते हैं, तो नई दिल्ली के लिए इसके मायने क्या होंगे?

आइए समझते हैं कि यदि वॉशिंगटन और बीजिंग के रिश्ते सुधरते हैं या सामान्य होते हैं, तो भारत के लिए फायदे और नुकसान के क्या समीकरण बनेंगे।

भारत के लिए कहां हो सकता है बड़ा नुकसान?

1. 'चाइना प्लस वन' (China+1) रणनीति की रफ्तार पड़ सकती है धीमी

अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर का सबसे बड़ा आर्थिक फायदा भारत को मिला था। एप्पल, फॉक्सकॉन और दुनिया की तमाम दिग्गज टेक कंपनियां चीन पर अपनी निर्भरता घटाकर भारत और वियतनाम जैसे देशों में मैन्युफैक्चरिंग प्लांट लगा रही हैं।

  • यदि ट्रंप और जिनपिंग के बीच कोई बड़ा ट्रेड पैक्ट हो जाता है और अमेरिकी टैरिफ में भारी रियायतें दी जाती हैं, तो पश्चिमी कंपनियों के लिए चीन छोड़कर निकलने की मजबूरी खत्म हो सकती है।

  • इससे भारत के 'मेक इन इंडिया' और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम को मिलने वाली वैश्विक गति प्रभावित हो सकती है।

2. क्वाड (QUAD) और इंडो-पैसिफिक की आक्रामकता में नरमी

भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का 'क्वाड' संगठन मूल रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते सैन्य और समुद्री विस्तार को संतुलित करने के लिए सक्रिय हुआ है।

  • यदि अमेरिका चीन के साथ अपने द्विपक्षीय आर्थिक हितों को साधने के लिए एक समझ पर पहुंचता है, तो क्वाड का भू-रणनीतिक दबाव कम हो सकता है।

  • चीन अगर अमेरिका से यह वादा लेने में सफल रहता है कि वह ताइवान या दक्षिण चीन सागर में सीधा टकराव नहीं बढ़ाएगा, तो एशिया में चीन का दबदबा बढ़ सकता है, जिसका सीधा दबाव वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भारत को झेलना पड़ सकता है।

3. 'G-2' का उभार और भारत की बारगेनिंग पावर

कूटनीतिक विशेषज्ञों को हमेशा इस बात की आशंका रही है कि अमेरिका और चीन कहीं मिलकर दुनिया को दो हिस्सों में बांटने वाली 'G-2' (Group of Two) जैसी व्यवस्था न बना लें। यदि दोनों महाशक्तियां वैश्विक व्यापार और सुरक्षा के नियम आपस में तय करने लगेंगी, तो ग्लोबल साउथ और उभरती अर्थव्यवस्थाओं (जैसे भारत) की स्वतंत्र विदेश नीति और कूटनीतिक सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) पर असर पड़ सकता है।

भारत के लिए कहां खुलेंगे फायदे के रास्ते?

1. वैश्विक आर्थिक स्थिरता और शेयर बाजारों को राहत

अमेरिका और चीन के बीच अनिश्चितता और टैरिफ की लड़ाई ने दुनिया भर में महंगाई, सप्लाई चेन रुकावट और मुद्रा के उतार-चढ़ाव को जन्म दिया है।

  • यदि दोनों देश व्यापारिक संतुलन बनाते हैं, तो वैश्विक विकास दर (Global GDP) को सहारा मिलेगा।

  • अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों में स्थिरता आएगी और भारतीय शेयर बाजार तथा विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के प्रवाह को एक सुरक्षित माहौल मिलेगा।

  • क्रूड ऑयल और कमोडिटी के दामों में स्थिरता आने से भारत का आयात बिल नियंत्रित रह सकता है।

2. LAC और क्षेत्रीय मोर्चे पर चीन का नरम रुख

चीन हमेशा दो मोर्चों पर एक साथ टकराव से बचता है। यदि अमेरिका और चीन के संबंध 'वर्किंग रिलेशनशिप' में बदलते हैं, तो बीजिंग भारत के साथ भी अपने सीमा विवाद और कूटनीतिक तनाव को कम करने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।

  • हाल के महीनों में ब्रिक्स और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत-चीन के बीच सीमा पर गश्त और सामान्यीकरण को लेकर जो प्रगति देखी गई है, वह प्रक्रिया और तेज हो सकती है।

  • चीन की ओर से भारत में आने वाले गैर-रणनीतिक निवेश और वीजा नियमों में ढील मिल सकती है, जिससे दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार की लागत घटेगी।

3. अमेरिका-भारत रिश्तों की अपनी स्वतंत्र नींव

भारत और अमेरिका की रणनीतिक साझेदारी अब किसी एक पार्टी या नेता पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह द्विदलीय (Bipartisan) सहमति पर आधारित है।

  • रक्षा सहयोग (जैसे जेट इंजन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, MQ-9B ड्रोन डील) और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी (iCET) जैसे क्षेत्रों में भारत और अमेरिका के संबंध इतने गहरे हो चुके हैं कि ट्रंप-जिनपिंग की कोई भी डील इसे पूरी तरह कमजोर नहीं कर सकती।

  • ट्रंप के पिछले कार्यकाल में भी भारत के साथ रक्षा और सामरिक तालमेल लगातार मजबूत ही हुआ था।

ट्रंप की अनिश्चित कूटनीति और भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता'

डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति में सबसे बड़ा कारक उनकी 'अनप्रेडिक्टेबिलिटी' (अप्रत्याशित फैसले) है। वह एक दिन चीन पर 60% टैरिफ लगाने की धमकी दे सकते हैं और अगले ही दिन जिनपिंग को अपना 'शानदार दोस्त' बताकर बड़ी डील की घोषणा कर सकते हैं।

भारत के लिए इस स्थिति में सबसे बेहतर रणनीति अपनी 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) को बनाए रखना ही है। भारत न तो आंख मूंदकर किसी एक खेमे में शामिल हुआ है और न ही आगे होगा। अमेरिका और चीन के बीच रिश्तों में चाहे गर्माहट आए या नई जंग छिड़े, भारत अपने राष्ट्रीय हितों, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था और मजबूत घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के दम पर ही अपनी वैश्विक स्थिति को मजबूत बनाए रखेगा।