सीजेपी प्रोटेस्ट' पर बेजा दखल दे रहीं संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत को भारत ने दिखाया आईना

सीजेपी प्रोटेस्ट' पर बेजा दखल दे रहीं संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत को भारत ने दिखाया आईना

भारत ने अपने आंतरिक कानूनी मामलों और विरोध-प्रदर्शनों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों से आने वाली गैर-जरूरी व पक्षपाती टिप्पणियों पर एक बार फिर कड़ा राजनयिक रुख अपनाया है। 'सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (CJP) से जुड़े हालिया विरोध-प्रदर्शनों, कार्यकर्ताओं की कानूनी जवाबदेही और प्रदर्शन अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) की विशेष दूत (स्पेशल रैपोर्ट्योर) द्वारा जारी सार्वजनिक बयानों पर भारत के विदेश मंत्रालय और जेनेवा स्थित स्थायी मिशन ने कड़ा पलटवार किया है। भारत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि संयुक्त राष्ट्र के पद पर बैठे अधिकारियों को अपने अधिदेश (Mandate) की सीमाओं को समझना चाहिए और एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक व पारदर्शी न्यायिक व्यवस्था वाले देश पर एकतरफा राय थोपने से बचना चाहिए।

विशेष दूत का विवादास्पद बयान: भारत के कानूनी तंत्र पर खड़े किए थे सवाल

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार से जुड़ी विशेष दूत ने अपने सोशल मीडिया बयान और जारी की गई टिप्पणी में CJP कार्यकर्ताओं के खिलाफ स्थानीय स्तर पर की गई पुलिस व कानूनी कार्रवाइयों को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने इसे नागरिक अधिकारों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन की स्वतंत्रता का उल्लंघन करार देते हुए भारतीय अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग की थी।

विशेष दूत की इस टिप्पणी को भारत ने सीधे तौर पर न्यायिक संप्रभुता का उल्लंघन और बिना जमीनी तथ्यों की पड़ताल किए दी गई अपरिपक्व राय माना है।

भारत का तीखा जवाब: 'चुनिंदा और पक्षपाती एजेंडे पर आधारित बयान अस्वीकार्य'

भारतीय राजनयिक मिशन ने विशेष दूत की टिप्पणियों को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया:

  • लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान: भारत दुनिया का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र है, जहां संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध और अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता देता है। लेकिन यह अधिकार कानून-व्यवस्था के दायरे और सार्वजनिक शांति बनाए रखने की कानूनी सीमाओं के साथ आता है।

  • स्वतंत्र न्यायपालिका: किसी भी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ की गई कार्रवाई पूरी तरह से कानून के स्थापित नियमों (Due Process of Law) और अदालत की निगरानी में होती है। न्यायपालिका कार्यपालिका के प्रभाव से पूरी तरह स्वतंत्र होकर मामलों की सुनवाई करती है।

  • तथ्यों की अनदेखी: विशेष दूत ने वित्तीय अनियमितताओं, विदेशी फंडिंग (FCRA) और सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने से जुड़ी जांच की प्रकृति को समझे बिना केवल एक पक्षीय नैरेटिव के आधार पर बयान जारी किया, जो पद की गरिमा के खिलाफ है।

अंतरराष्ट्रीय दखलंदाजी पर पहले भी रहा है कड़ा रुख

यह पहला मौका नहीं है जब भारत ने मानवाधिकारों के नाम पर चुनिंदा सक्रियता दिखाने वाले विदेशी प्रतिनिधियों को आईना दिखाया हो। इससे पहले भी कश्मीर, संशोधित नागरिकता कानून (CAA), किसान आंदोलन और जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों के दौरान जब कभी विदेशी संस्थाओं या विशेष दूतों ने दखल देने की कोशिश की, भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता या नसीहत की भारत को जरूरत नहीं है।

भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों को संतुलित और निष्पक्ष रिपोर्टिंग के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए, न कि चुनिंदा एनजीओ के एकतरफा एजेंडे का लाउडस्पीकर बनना चाहिए।