'स्कूलों के लिए नहीं है PM CARES फंड'; अभिजीत दीपके की मांग पर BJP का तीखा पलटवार, केजरीवाल पर कसा तंज

'स्कूलों के लिए नहीं है PM CARES फंड'; अभिजीत दीपके की मांग पर BJP का तीखा पलटवार, केजरीवाल पर कसा तंज

ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे और जरूरी सुविधाओं के अभाव का मुद्दा उठाकर चर्चा में आए 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके के एक बयान पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने कड़ा एतराज जताते हुए सीधा जवाब दिया है। दीपके ने हाल ही में मांग की थी कि प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और आपात स्थिति राहत कोष यानी पीएम केयर्स फंड (PM CARES Fund) में बिना इस्तेमाल के पड़े लगभग 8,500 करोड़ रुपये का उपयोग नए सरकारी स्कूल बनाने और जर्जर स्कूलों की मरम्मत में किया जाना चाहिए। इस मांग पर पलटवार करते हुए बीजेपी ने स्पष्ट किया है कि पीएम केयर्स फंड किसी नियमित बजटीय कार्य या स्कूलों के निर्माण के लिए नहीं, बल्कि केवल आपातकालीन परिस्थितियों और राष्ट्रीय आपदा राहत के लिए बनाया गया एक विशेष कोष है।

भाजपा ने इस मुद्दे को लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) और उसके संयोजक अरविंद केजरीवाल पर भी तीखा राजनीतिक हमला बोला है। बीजेपी की राज्य इकाई ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए कहा कि अरविंद केजरीवाल ने अपने लोगों को नौटंकी और ड्रामा करना तो बखूबी सिखा दिया, लेकिन वे उन्हें बुनियादी तथ्य और नियम सिखाना भूल गए। बीजेपी ने दीपके को चुनौती दी कि वे केंद्र सरकार पर निराधार सवाल उठाने के बजाय पंजाब के उन तथाकथित 'वर्ल्ड-क्लास' स्कूलों का दौरा करें, जहां की बदहाली से आम जनता परेशान हो चुकी है।

अभिजीत दीपके ने क्या उठाई थी मांग और क्या हैं आंकड़े

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब पीएम केयर्स फंड का ताजा ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक हुआ, जिसके अनुसार 31 मार्च 2025 तक इस फंड का कुल कॉर्पस बढ़कर 8,452.07 करोड़ रुपये हो गया है, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में करीब 17.8 प्रतिशत अधिक है। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, इस राशि का एक बहुत बड़ा हिस्सा बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट और बचत खातों में जमा है, जिससे मिलने वाले ब्याज से फंड में और वृद्धि हुई है।

अभिजीत दीपके ने अपने 'स्कूल ठीक करो' अभियान के तहत महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के ग्रामीण स्कूलों के जमीनी दौरे का हवाला देते हुए एक वीडियो जारी किया था। दीपके ने दावा किया कि गांवों के सरकारी स्कूलों में बच्चों के पास बैठने के लिए बेंच, पक्की छतें और पीने का साफ पानी तक उपलब्ध नहीं है। जब स्थानीय अधिकारियों से बात की जाती है तो वे फंड की कमी का रोना रोते हैं। दीपके ने तर्क दिया कि यदि 8 करोड़ रुपये की लागत से एक आधुनिक हाई-टेक मॉडल स्कूल तैयार होता है, तो पीएम केयर्स फंड में पड़ी 8,500 करोड़ रुपये की राशि से देश भर में 1,000 से अधिक विश्वस्तरीय स्कूल बनाए जा सकते हैं।

बीजेपी का दो टूक रुख: फंड के उद्देश्य और नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं

बीजेपी नेताओं और रणनीतिकारों ने दीपके के इस प्रस्ताव को पूरी तरह अव्यावहारिक और भ्रामक करार दिया है। पार्टी का कहना है कि पीएम केयर्स फंड का गठन मार्च 2020 में कोरोना महामारी जैसी अप्रत्याशित राष्ट्रीय आपदाओं और भविष्य की आपातकालीन स्वास्थ्य व मानवीय चुनौतियों से तत्काल निपटने के लिए किया गया था। इस फंड में जनता और कॉरपोरेट संस्थाओं द्वारा स्वेच्छा से दान दिया जाता है और इसे किसी मंत्रालय के नियमित वार्षिक बजट की तरह सामान्य विकास कार्यों में डाइवर्ट नहीं किया जा सकता।

शिक्षा और स्कूल अवसंरचना के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के पास समग्र शिक्षा अभियान और शिक्षा मंत्रालय का अलग वार्षिक बजट आवंटित होता है। इसलिए एक आपातकालीन संकट प्रबंधन फंड को स्कूल सुधार से जोड़ना केवल राजनीतिक सुर्खियां बटोरने और लोगों को गुमराह करने की साजिश है।

आंदोलन के पीछे राजनीतिक मंशा पर उठे सवाल

हाल के दिनों में छात्र आंदोलन और नीट परीक्षा विवाद के दौरान चर्चा में आए अभिजीत दीपके की राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर भी केंद्र सरकार के मंत्रियों ने सवाल खड़े किए हैं। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने हाल ही में एक बयान में कहा था कि युवाओं और छात्रों की चिंताएं अपनी जगह जायज हैं, लेकिन कुछ राजनीतिक दल छात्रों की आड़ में अपना छिपा हुआ राजनीतिक एजेंडा साधने की कोशिश कर रहे हैं। रिजिजू ने दावा किया था कि दीपके स्वतंत्र छात्र नेता होने के बजाय आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में काम कर रहे हैं।

बीजेपी का आरोप है कि जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों से लेकर अब स्कूलों के बहाने पीएम केयर्स फंड को निशाना बनाने तक, पूरी रणनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाने के मकसद से रची जा रही है। पार्टी ने साफ किया है कि केंद्र सरकार प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के आधुनिकीकरण के लिए पीएम-श्री (PM-SHRI) स्कूलों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पहले ही बड़े पैमाने पर काम कर रही है और इसके लिए किसी विशेष आपदा राहत फंड को छेड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है।

शिक्षा सुधार बनाम आपदा प्रबंधन फंड की नीतिगत बहस

इस राजनीतिक घमासान ने देश में सार्वजनिक नीतियों और विशेष फंड्स के इस्तेमाल पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ जहां नागरिक समाज और युवा कार्यकर्ता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सरकारी खजाने में बिना इस्तेमाल पड़े धन का तत्काल उपयोग बच्चों के बुनियादी अधिकारों और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने में होना चाहिए। वहीं दूसरी तरफ, सरकार और सत्तारूढ़ दल का स्पष्ट मानना है कि वित्तीय अनुशासन और फंड्स के कानूनी मैंडेट का पालन करना आवश्यक है ताकि भविष्य में किसी भी अचानक आई प्राकृतिक या मानवीय आपदा के समय देश के पास त्वरित राहत के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध रहें।

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