"तो क्या कसाब और हाफिज सईद जैसों को भी जमानत दे देंगे?" ट्रायल में देरी पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने दागा सबसे तीखा सवाल

देश के सबसे कड़े आतंकवाद निरोधी कानून 'UAPA' (गैर-कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के तहत जमानत के नियमों को लेकर इन दिनों देश की सबसे बड़ी अदालत में एक बेहद गंभीर और ऐतिहासिक बहस छिड़ गई है। केंद्र सरकार ने देश की सुरक्षा और न्याय प्रणाली को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने एक ऐसा कड़ा सवाल उठाया है जिसने कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है। सरकार की तरफ से पूछा गया है कि 'क्या सिर्फ मुकदमे (Trial) में देरी होने के आधार पर अजमल कसाब या हाफिज सईद जैसे खूंखार आतंकवादियों को भी जमानत पर रिहा किया जा सकता है?' इस बड़े मामले का सीधा और गहरा असर भारत की आंतरिक सुरक्षा, न्याय व्यवस्था और जेलों में बंद उन सैकड़ों विचाराधीन कैदियों पर पड़ने वाला है जो सालों से यूएपीए कानून के तहत जेलों में बंद हैं। यह पूरी बहस अब राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों के बीच एक नई लकीर खींचती दिख रही है।

आखिर क्यों खड़ा हुआ यह विवाद और कोर्ट में केंद्र ने क्या दी दलील?

दरअसल, यह पूरा कानूनी टकराव तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट की ही दो अलग-अलग बेंचों ने यूएपीए (UAPA) के आरोपियों की जमानत को लेकर बिल्कुल विपरीत और विरोधाभासी राय रख दी। हाल ही में एक बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि अगर किसी मुकदमे की सुनवाई में बहुत लंबी देरी हो रही है, तो आरोपी को जमानत का अधिकार मिलना चाहिए। केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से पक्ष रख रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट के इसी निष्कर्ष पर बेहद कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने शीर्ष अदालत में तर्क दिया कि सिर्फ ट्रायल में देरी के चश्मे से हर अपराधी को एक समान नहीं देखा जा सकता।

अदालत के सामने अपनी बात रखते हुए एएसजी एसवी राजू ने कहा, "2008 के मुंबई आतंकी हमले के दोषी अजमल कसाब के मामले में गवाहों की संख्या बहुत बड़ी थी, जिसकी वजह से स्वाभाविक रूप से ट्रायल में लंबी देरी हुई। तो क्या ऐसी स्थिति में महज देरी को आधार बनाकर उसे जमानत दे दी जाती? या फिर अगर कल को मोस्ट वांटेड आतंकी हाफिज सईद को पाकिस्तान से भारत लाया जाए और उसके खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाने व गवाहियां दर्ज करने के चक्कर में ट्रायल पूरे होने में 5 साल का समय लग जाए, तो क्या उसे भी सिर्फ समय बीतने के आधार पर जमानत पर छोड़ दिया जाएगा?"

अपराध की गंभीरता और आरोपी की भूमिका देखना बेहद जरूरी

सरकार की तरफ से जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच के सामने यह पूरी तरह स्पष्ट किया गया कि अदालत द्वारा किसी भी आरोपी को जमानत देते समय अपराध की भयावहता, उसकी गंभीरता और उस पूरे षड्यंत्र में आरोपी की वास्तविक भूमिका (Role) को मुख्य आधार बनाया जाना चाहिए।

इस दौरान एएसजी राजू ने साल 2020 के बहुचर्चित दिल्ली दंगा मामले का सीधा उदाहरण भी कोर्ट के सामने रखा। उन्होंने याद दिलाया कि इसी अदालत ने उस दंगा मामले में 5 आरोपियों को जमानत दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे मुख्य आरोपियों को उनकी गंभीर और संवेदनशील भूमिका को देखते हुए कोई राहत नहीं दी थी। इसलिए जमानत देने या न देने के फैसले को महज एक गणितीय फॉर्मूले (Mathematical Formula) की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि जेल में इतना समय बीत गया तो अब बेल मिलनी ही चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की दो बेंचों में मतभेद: समझिए दोनों फैसलों का टकराव

UAPA कानून के तहत बेल के इस संवेदनशील मुद्दे पर देश की सर्वोच्च अदालत की दो अलग-अलग पीठ के फैसले आपस में टकरा रहे हैं, जिसकी वजह से देश की निचली अदालतों में भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इस बड़े कानूनी विरोधाभास को आप इस तालिका के जरिए आसानी से समझ सकते हैं:

अदालत की बेंच (माननीय न्यायाधीश) संबंधित कानूनी मामला कोर्ट की मुख्य और अहम टिप्पणी
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां सैयद इफ्तिखार अंद्राबी केस (मई 2026) ट्रायल में बहुत लंबी देरी होना और आरोपी द्वारा जेल में लंबा वक्त बिताना जमानत का एक बेहद मजबूत आधार है। 'जेल एक अपवाद है और बेल एक सामान्य नियम है' का मूल सिद्धांत यहां भी लागू होना चाहिए।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले दिल्ली दंगा केस / उमर खालिद (जनवरी 2026) जेल में केवल लंबी कैद काटने को जमानत पाने का कोई 'गणितीय फॉर्मूला' नहीं माना जा सकता। बेल देने से पहले देश की सुरक्षा, आरोपी की भूमिका और अपराध की गंभीरता को देखना कोर्ट के लिए अनिवार्य है।

अब सुप्रीम कोर्ट की 'बड़ी बेंच' करेगी इस महा-विवाद का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट की दो पिठों के बीच पैदा हुए इस बड़े और गंभीर कानूनी मतभेद को हमेशा-हमेशा के लिए सुलझाने के लिए जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने 22 मई 2026 को एक बड़ा कदम उठाया। कोर्ट ने इस पूरे कानूनी सवाल को अंतिम और स्पष्ट फैसले के लिए सुप्रीम कोर्ट की एक 'बड़ी बेंच' (Larger Bench) के पास रेफर कर दिया है।

अब देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) इस जटिल कानूनी सवाल की व्याख्या करने के लिए एक विशेष बड़ी बेंच का गठन करेंगे, जिसका निर्णय पूरे देश के लिए सर्वोपरि होगा। हालांकि, इस बड़ी बेंच के गठन के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक मानवीय और अंतरिम कदम उठाते हुए 2020 दिल्ली दंगों के दो अन्य आरोपियों (तस्लीम अहमद और खालिद सैफी) को इस पूरे मामले का अंतिम निपटारा होने तक 6 महीने की अंतरिम जमानत की राहत जरूर दे दी है।

पिछले कुछ वर्षों में UAPA मामलों की क्या रही है टाइमलाइन?

इस पूरे कानूनी और सुरक्षा विवाद की जड़ें पिछले कुछ सालों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए कुछ बहुत बड़े और ऐतिहासिक फैसलों से सीधे जुड़ी हुई हैं:

  • साल 2021 (ऐतिहासिक केए नजीब केस): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने एक नजीर पेश करते हुए फैसला दिया था कि यदि UAPA के तहत चल रहे मुकदमे में बिना किसी ठोस वजह के बहुत ज्यादा देरी हो रही है, तो संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत आरोपी को जमानत दी जा सकती है।

  • जनवरी 2026: दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाओं को अदालत ने इसी आधार पर खारिज कर दिया कि देश के खिलाफ किया गया उनका अपराध बेहद गंभीर श्रेणी का था और केवल जेल में वक्त बीतने के आधार पर उन्हें राहत नहीं दी जा सकती।

  • मई 2026 (अंद्राबी केस): सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच ने सुनवाई में देरी को जमानत का मजबूत हक माना, जिससे वर्तमान में यह बड़ा कानूनी विरोधाभास खड़ा हो गया।

  • 22 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे विषय को देश की सुरक्षा और नागरिकों के अधिकारों के लिहाज से बेहद संवेदनशील मानते हुए 'लार्जर बेंच' के सुपुर्द कर दिया है, जहां अब इसका अंतिम फैसला होगा।

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